चित्तौड़गढ़। राजस्थान की ऐतिहासिक धरा चित्तौड़गढ़ के बोहेड़ा क्षेत्र में आयोजित श्रीमद्भागवत कथा के दौरान आध्यात्मिक चेतना का एक अनूठा संगम देखने को मिला। विख्यात संत दिग्विजय राम ने कथा व्यास पीठ से श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए भक्ति के उस गूढ़ रहस्य को उजागर किया, जहाँ भक्त और भगवान के बीच का संबंध किसी सौदेबाजी पर नहीं, बल्कि 'अहेतु की' यानी निस्वार्थ प्रेम पर टिका होता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि जीवन में सुख और दुख, धूप और छांव की तरह आते-जाते रहते हैं, किंतु एक सच्चे साधक का अटूट विश्वास अपने इष्ट के प्रति कभी डगमगाना नहीं चाहिए। संत ने समाज को यह संदेश दिया कि ईश्वर की भक्ति केवल व्यक्तिगत स्वार्थ की सिद्धि का साधन नहीं होनी चाहिए, बल्कि यह कर्म और निष्ठा का वह मार्ग है जहाँ प्रतिफल की चिंता किए बिना समर्पण सर्वोपरि होता है।

कथा के मार्मिक प्रसंगों को साझा करते हुए संत दिग्विजय राम ने भारतीय संस्कृति के वास्तविक नायकों—खेतों में पसीना बहाते किसान और सीमाओं पर मुस्तैद जवान—को नमन किया। उन्होंने कहा कि आज यदि हम चैन की नींद सो पा रहे हैं, तो इसका श्रेय उन वीर जवानों को जाता है। भक्ति की पराकाष्ठा का उदाहरण देते हुए उन्होंने शबरी और भक्त नरसी मेहता के जीवन चरित्र पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि जिस प्रकार शबरी ने अपने गुरु मतंग ऋषि के वचनों पर सत्तर वर्षों तक विश्वास कर भगवान राम की प्रतीक्षा की, और अंततः स्वयं प्रभु को उनके द्वार पर आना पड़ा, वही अटूट विश्वास आज के युग में भी आवश्यक है। उन्होंने नरसी जी के प्रसंग के माध्यम से बताया कि जब एक भक्त अपनी लाज भगवान के चरणों में सौंप देता है, तो सांवरा सेठ स्वयं 56 करोड़ का मायरा भरने के लिए धरती पर उतर आते हैं।

संत ने भारतीय परंपराओं के वैज्ञानिक पक्ष को भी मजबूती से प्रस्तुत किया। उन्होंने बताया कि माथे पर चंदन का तिलक मस्तिष्क को शीतलता प्रदान करता है, तो वहीं आरती की ऊष्मा नेत्र ज्योति को बढ़ाने में सहायक होती है। उन्होंने वैष्णव परंपरा के अनुसार भगवान को भोग लगाकर प्रसाद ग्रहण करने की महत्ता पर जोर देते हुए कहा कि जो व्यक्ति बिना ईश्वर को याद किए भोजन करता है, उसका जीवन पशु समान है। कथा के दौरान जब बेटी की विदाई और पिता के दर्द का प्रसंग आया, तो उपस्थित जनसमूह की आंखें नम हो गईं। उन्होंने कहा कि पिता और पुत्री का रिश्ता संवेदनाओं की वह पराकाष्ठा है जिसे केवल अनुभव किया जा सकता है। कार्यक्रम के समापन पर काबरा परिवार द्वारा उपस्थित समस्त श्रद्धालुओं एवं अतिथियों का आभार व्यक्त किया गया, जिससे यह आध्यात्मिक आयोजन सामुदायिक सौहार्द की एक नई मिसाल बनकर उभरा।

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