चित्तौड़गढ़/बड़ी सादड़ी। धर्म शास्त्र मनुष्य को जीवन जीने की सही दिशा प्रदान करते हैं। शास्त्रों में जल का प्रयोग मितव्ययिता के साथ करने और इसके दुरुपयोग से बचने की बात कही गई है। भगवान शिव को श्रावण मास अत्यंत प्रिय है और जो भक्त पूरे भाव के साथ शिव प्रसाद ग्रहण करता है, उसे करोड़ों पुण्य प्राप्त होते हैं।

रामद्वारा में चातुर्मासिक सत्संग के तहत आयोजित शिव पुराण कथा वाचन में संत दिग्विजय राम महाराज ने यह बात कही। उन्होंने भगवान शिव के प्रसाद के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि जो भक्त पवित्रता के साथ शिवलिंग पर चढ़ाया गया प्रसाद ग्रहण करता है, उसे शिव लोक की प्राप्ति होती है। प्रसाद का आधा कण भी सुख देने वाला और सभी प्रकार के विघ्न हरने वाला होता है। प्रसाद के साथ भक्ति का भाव जुड़ा होता है और प्रसाद कभी अकेले नहीं खाना चाहिए। भक्ति से भाव परिवर्तित हो जाते हैं।



संत दिग्विजय राम महाराज ने कहा कि भगवान के अभिषेक में काम लिया गया जल चरणामृत बन जाता है। भगवान शिव के अभिषेक का चरणामृत जो तीन बार भक्ति भाव के साथ ग्रहण करता है, उसके पाप नष्ट हो जाते हैं। जिस घर में नैवेद्य प्रसाद के रूप में आता है, वह घर पवित्र हो जाता है। प्रसाद का तिरस्कार करने वाला महापाप का भागी बन जाता है।

उन्होंने कहा कि बिल्व पत्र को महादेव का स्वरूप माना गया है। उन्होंने ही बिल्व पत्र को स्थापित किया था। सभी तीर्थ बिल्व पत्र के मूल में निवास करते हैं। जो साधक बिल्व वृक्ष के मूल में प्रणाम करके पार्थिव शिवलिंग का पूजन करता है, उसे सभी तीर्थों का फल मिलता है। बिल्व वृक्ष के मूल में दीप प्रज्वलित कर उसका पूजन करने वाले को शिव लोक की प्राप्ति होती है और उसकी संतान सुखी रहती है।

संत ने कहा कि बिल्व वृक्ष के नीचे शिव भक्त को भोजन करवाने वाले को करोड़ों लोगों को भोजन कराने का फल प्राप्त होता है। उन्होंने यह भी कहा कि भस्म, त्रिपुण्ड, रुद्राक्ष और बिल्व पत्र के बिना शिवलिंग का पूजन नहीं करना चाहिए।

शिव पुराण का उल्लेख करते हुए संत दिग्विजय राम महाराज ने बताया कि विद्या प्राप्ति की कामना के लिए एक हजार पार्थिव शिवलिंग, धन प्राप्ति के लिए आठ सौ, पुत्र की कामना के लिए डेढ़ हजार पार्थिव शिवलिंग, मोक्ष के लिए एक करोड़ और दरिद्रता समाप्त करने के लिए पांच हजार पार्थिव शिवलिंग का पूजन करना चाहिए। ऐसा करने से वांछित मनोकामनाएं पूरी होती हैं। पार्थिव शिवलिंग का पूजन सर्व दान, व्रत और तीर्थ के समान फल देने वाला होता है।

उन्होंने बताया कि शिवलिंग तीन प्रकार के होते हैं—उत्तम, मध्यम और अधम। चार अंगुल ऊंचा और देखने में सुंदर शिवलिंग उत्तम कहा गया है। इससे आधा मध्यम और इससे भी आधा अधम कहा गया है।

शिव पुराण कथा श्रवण के लिए रामद्वारा में प्रतिदिन बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंच रहे हैं। चातुर्मासिक सत्संग के तहत कथा में भगवान शिव के प्रसाद, बिल्व पत्र और पार्थिव शिवलिंग पूजन के महत्व पर श्रद्धालुओं को विस्तार से जानकारी दी जा रही है।

Pratahkal Newsroom

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