चित्तौड़गढ़ जिले के बड़ी सादड़ी स्थित रामद्वारा में आयोजित शिव पुराण कथा के दौरान संत दिग्विजय राम ने श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए कहा कि राम नाम का आश्रय लेने से महादेव की अति कृपा प्राप्त होती है। उन्होंने कहा कि व्यक्ति को नाम का आश्रय अवश्य लेना चाहिए, क्योंकि इसी के माध्यम से भवसागर से मुक्ति मिल सकती है। उन्होंने बताया कि शिव पुराण को प्रणाम करने मात्र से सभी देवताओं की पूजा का फल प्राप्त होता है।



संत दिग्विजय राम ने कहा कि संसार में सुख का मिलना हरि कृपा है, लेकिन प्रभु के नाम का स्मरण अति हरि कृपा का स्वरूप है। उन्होंने कहा कि भगवान का सत्संग और कथा सुनना भी अति हरि कृपा है, क्योंकि हरि कृपा के बिना व्यक्ति सत्संग सुनने या प्रभु का एक नाम भी नहीं ले सकता। उन्होंने कहा कि मनुष्य शरीर से मानव हो सकता है, लेकिन यदि उसमें भक्ति नहीं है तो वह चार पैर वाले प्राणी के समान प्रतीत होता है।

उन्होंने कहा कि शिव पुराण ज्ञान, भक्ति और वैराग्य प्रदान करता है। शिव तत्व की प्राप्ति ही साध्य है और उस साध्य तक पहुंचने के लिए मानव शरीर ही सबसे बड़ा साधन है। शास्त्रों का उल्लेख करते हुए उन्होंने बताया कि साधन तीन प्रकार के होते हैं—श्रवण, कीर्तन और मनन। हरि कृपा से व्यक्ति सत्संग का श्रवण करता है, कीर्तन में तन मस्त हो जाता है और जो सुना है उसे अपने हृदय में उतार लेता है, यही मनन की अवस्था है। उन्होंने कहा कि इन तीनों की उपलब्धता भी हरि कृपा से ही संभव होती है।

संत दिग्विजय राम ने आगे कहा कि शास्त्रों में भक्ति का मंगलाचरण भी श्रवण भक्ति से माना गया है। भक्ति के नौ प्रकार बताए गए हैं, जिनमें प्रथम स्थान श्रवण भक्ति का है। उन्होंने कहा कि भगवान की महिमा को केवल कानों से नहीं, बल्कि चित्त लगाकर सुनना चाहिए, तभी उसका वांछित फल प्राप्त होता है। सुनने के लिए आशक्ति आवश्यक है और यही आशक्ति श्रवण भक्ति को मजबूत करती है।

उन्होंने बताया कि श्रवण कानों से, कीर्तन पांव से और मनन मन से सिद्ध होता है, लेकिन ये तीनों महादेव की कृपा से ही प्राप्त होते हैं। यदि व्यक्ति इस मार्ग पर चल पड़े तो उसका लोक और परलोक दोनों सुधर जाते हैं। उन्होंने कहा कि यदि कोई व्यक्ति शारीरिक कारणों से इन तीनों उपायों का पालन नहीं कर पाता तो महादेव की मूर्ति स्थापित कर श्रद्धापूर्वक पूजा करने से भी भवसागर पार कर सकता है। हालांकि इसके लिए मन में राग, द्वेष, ईर्ष्या, छल और कपट का अभाव होना आवश्यक है।

संत दिग्विजय राम ने कहा कि भगवान शंकर की पूजा दो प्रकार से की जाती है—शिवलिंग की स्थापना कर तथा मूर्ति पूजा के माध्यम से। उन्होंने कहा कि भगवान शिव साकार और निराकार दोनों स्वरूपों में विराजमान हैं। इसलिए निराकार स्वरूप की उपासना शिवलिंग के रूप में तथा साकार स्वरूप की पूजा शिव मूर्ति के रूप में करना उपयुक्त बताया गया है।

Pradeep Vaishnav, Chittorgarh

Pradeep Vaishnav, Chittorgarh

नाम: प्रदीप वैष्णव

वर्तमान पद: रिपोर्टर

कार्यक्षेत्र: बड़ी सादड़ी तहसील

अनुभव: 26 साल (सन 2000 से 'प्रातःकाल' के साथ कार्यरत)

परिचय 

प्रदीप वैष्णव बड़ी सादड़ी तहसील क्षेत्र के एक अनुभवी पत्रकार हैं। वह स्थानीय समाचारों, सामाजिक गतिविधियों, शिक्षा और क्राइम रिपोर्टिंग के क्षेत्रों में मुख्य रूप से सक्रिय हैं। वह सामाजिक, शैक्षणिक एवं स्थानीय मुद्दों से जुड़े विषयों में विशेष रुचि रखते हैं। तथ्यात्मक और सरल रिपोर्टिंग को प्राथमिकता देना तथा जनहित से संबंधित विषयों को निष्पक्ष रूप से प्रस्तुत करना उनकी कार्यशैली का हिस्सा है।

बीट और विशेषज्ञता 

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  • शिक्षा: शैक्षणिक गतिविधियां, विद्यार्थियों से जुड़े विषय और शिक्षा संबंधी समाचार।

शैक्षणिक योग्यता (Education)

B.A. जर्नलिज्म (पत्रकारिता में स्नातक)

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