निंबाहेड़ा में धनतेरस पर 100 साल पुरानी परंपरा, महिलाओं ने की मिट्टी पूजा
धनतेरस पर निंबाहेड़ा की महिलाओं ने पारंपरिक लोकगीत गाकर लाल-पीली मिट्टी एकत्रित की, जिसका उपयोग दीपावली पर घरों की लिपाई-पुताई और शुद्धि के लिए किया जाएगा।

धनतेरस पर निंबाहेड़ा में महिलाओं ने सौ साल पुरानी परंपरा के तहत लोकगीत गाकर मिट्टी एकत्रित की।
निम्बाहेड़ा। धनतेरस पर सोना-चांदी और नए बर्तन खरीदने की परंपरा के बीच निम्बाहेड़ा में मेवाड़ की सौ साल से अधिक पुरानी लोकपरंपरा ने एक बार फिर अपनी विशिष्ट पहचान दर्ज कराई। यहां महिलाएं धनतेरस की सुबह पारंपरिक लोकगीत गाते हुए लाल और पीली मिट्टी एकत्रित करने निकलीं। प्रकृति, संस्कृति और लोक आस्था से जुड़ी यह परंपरा आधुनिकता के दौर में भी पीढ़ी-दर-पीढ़ी सहेजी जा रही है।
दीपावली के पांच दिवसीय महापर्व की शुरुआत धनतेरस के साथ ही क्षेत्र में इस परंपरा का निर्वहन किया गया। सुबह विभिन्न स्थानों पर महिलाओं के समूह पारंपरिक उत्साह और श्रद्धा के साथ मिट्टी एकत्रित करते नजर आए। महिलाओं ने सामूहिक रूप से मिट्टी खोदी और उसे घर ले जाने के लिए एकत्र किया। इस दौरान पारंपरिक लोकगीतों की गूंज से वातावरण में लोकसंस्कृति और उत्सव का रंग दिखाई दिया। मिट्टी लेने से पहले महिलाओं ने विधि-विधान से उसका पूजन किया और पारंपरिक रीति-रिवाजों के अनुसार उसे घर लेकर पहुंचीं।
दीपावली पर घर-आंगन और चूल्हे की होगी लिपाई-पुताई
क्षेत्रीय मान्यताओं के अनुसार, धनतेरस पर एकत्रित की जाने वाली इस मिट्टी का धार्मिक और पारंपरिक महत्व है। दीपावली के अवसर पर इसी मिट्टी से घरों के आंगन, मुख्य द्वार, चूल्हे और अन्य स्थानों की लिपाई-पुताई की जाती है। मान्यता है कि मिट्टी से घर की शुद्धि और पवित्रता होती है। इसके माध्यम से दीपावली पर माता लक्ष्मी के स्वागत के लिए घर-आंगन तैयार किए जाते हैं। यह परंपरा केवल घर की साफ-सफाई तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें प्रकृति के प्रति सम्मान और पारंपरिक जीवनशैली की भावना भी जुड़ी हुई है।
बुजुर्गों की विरासत को नई पीढ़ी तक पहुंचा रही महिलाएं
निम्बाहेड़ा की यह परंपरा दर्शाती है कि आधुनिकता और बदलते सामाजिक परिवेश के बावजूद लोकजीवन से जुड़ी मान्यताएं आज भी अपना महत्व बनाए हुए हैं। बुजुर्गों से मिली इस विरासत को महिलाएं निरंतर आगे बढ़ाते हुए नई पीढ़ी तक पहुंचा रही हैं। सामूहिक रूप से मिट्टी लेने जाना, पारंपरिक गीत गाना और श्रद्धापूर्वक मिट्टी का पूजन करना इस आयोजन को महज एक रस्म नहीं रहने देता, बल्कि यह सामाजिक मेलजोल और सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक बन जाता है।
धनतेरस पर जहां सोना-चांदी की खरीदारी को भौतिक समृद्धि का प्रतीक माना जाता है, वहीं निम्बाहेड़ा की यह परंपरा धरती से जुड़ी माटी के महत्व को सामने लाती है। महिलाएं मिट्टी को जीवन, पवित्रता और समृद्धि का आधार मानते हुए सौ साल से अधिक पुरानी इस परंपरा को आज भी पूरी श्रद्धा के साथ निभा रही हैं। बदलते समय के बीच जीवित यह लोकपरंपरा मेवाड़ की सांस्कृतिक पहचान और अपनी जड़ों से जुड़े रहने की विरासत को आगे बढ़ा रही है।

