चिकारड़ा। मेवाड़ अंचल के चिकारड़ा क्षेत्र में कुदरत के दोहरे प्रहार ने जनजीवन को पूरी तरह अस्त-व्यस्त कर दिया है। सोमवार रात से शुरू हुआ घने कोहरे और हाड़ कपा देने वाली शीतलहर का तांडव मंगलवार को भी जारी रहा, जिससे न केवल आम जनजीवन ठहर सा गया, बल्कि अन्नदाता के माथे पर भी चिंता की लकीरें गहरी हो गई हैं। सोमवार रात्रि करीब 10:00 बजे से ही वातावरण में कोहरे ने अपनी चादर बिछाना शुरू कर दिया था। देखते ही देखते कोहरे के गुबार इस कदर हावी हुए कि सड़क पर चलने वाले वाहन चालकों के लिए आगे का रास्ता देख पाना मुहाल हो गया। धुंध की सघनता इतनी अधिक थी कि मंगलवार सुबह 50 मीटर की दूरी तक भी दृश्यता (विजिबिलिटी) शून्य के करीब पहुंच गई, जिसके कारण वाहन रेंगते हुए नजर आए।

कड़ाके की ठंड और शीतलहर ने ग्रामीणों को गर्म कपड़ों में लिपटने और घरों में दुबकने पर मजबूर कर दिया है। पिछले तीन दिनों से लगातार चल रही बर्फीली हवाओं ने चने, अफीम और मौसमी सब्जियों की फसलों को भारी नुकसान पहुंचाया है। पाला गिरने के कारण लहलहाती फसलें जलकर राख होने की कगार पर हैं, जिससे किसानों की मेहनत पर पानी फिरता नजर आ रहा है। खेतों की सुरक्षा में जुटे किसान दलीचंद ने दर्द बयां करते हुए कहा कि किसान की जिंदगी पूरी तरह प्रकृति की इनायत पर निर्भर है; कुदरत चाहे तो तार दे और चाहे तो मार दे। इस समय प्रकृति की मार से बचना असंभव प्रतीत हो रहा है।

ठंड का आलम यह था कि ग्रामीण और किसान खेतों की मेड़ों पर अलाव जलाकर खुद को बचाने का जतन करते दिखे। इंसानों के साथ-साथ पशु-पक्षी भी इस कड़ाके की सर्दी से बेहाल नजर आए। मंगलवार को आसमान में कोहरे के साथ-साथ ओस की बूंदों की हल्की बौछारें भी गिरती रहीं, जिसने ठिठुरन को और अधिक बढ़ा दिया। लंबे इंतजार के बाद सुबह 11:00 बजे सूर्य देव के दर्शन हुए, लेकिन तीखी धूप निकलने के बावजूद बर्फीली हवाओं के झोंकों ने राहत नहीं मिलने दी। हालांकि, दोपहर में धूप खिलने के बाद ग्रामीणों ने थोड़ी चैन की सांस ली, लेकिन फसलों को हुए नुकसान और आगामी रातों की ठंड को लेकर क्षेत्र में डर का माहौल बना हुआ है।

Pratahkal Bureau

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