नर्मदा परिक्रमा: बेगू के पंडित अखिलेश औदीच्य ने 3500 किमी की यात्रा पूर्ण की
पंडित अखिलेश ने ओंकारेश्वर से शुरू कर तीन राज्यों की पैदल यात्रा की, मौन व्रत के साथ एक करोड़ शिव मंत्रों का जाप और सन्यास भाव से साधना पूरी की।

ओंकारेश्वर में नर्मदा परिक्रमा की सफल पूर्णाहुति के बाद धार्मिक अनुष्ठान करते पंडित अखिलेश औदीच्य, जिन्होंने एक वर्ष तक कठिन आध्यात्मिक नियमों का पालन किया।
बेगू निवासी पंडित अखिलेश औदीच्य ने सन्यास भाव के साथ लगभग 3500 किलोमीटर की पवित्र नर्मदा परिक्रमा सफलतापूर्वक पूर्ण की।
परिक्रमा का शुभारंभ और परंपरा
यह परिक्रमा शास्त्रीय परंपराओं के अनुसार देवउठनी एकादशी से प्रारंभिक की। पंडित अखिलेश ने इस वर्ष परिक्रमा का शुभारंभ 1 नवंबर, देवउठनी एकादशी को ओंकारेश्वर से किया। परिक्रमा का आरंभ ओंकारेश्वर में पितरों के तर्पण, पार्थिव शिवलिंग पूजन, हवन एवं कन्या पूजन के साथ किया गया।
तीन राज्यों का विस्तार और कठिन मार्ग
- यह नर्मदा परिक्रमा मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र एवं गुजरात—तीन राज्यों से होकर संपन्न हुई।
- यात्रा मार्ग में शूलपाणी पर्वत, भरूच, अरब सागर तट, महेश्वर, खप्परमाल पर्वत, नेमावर, सीतामाता जंगल, लक्कड़कोट जंगल, अमरकंटक, जबलपुर, बरमान घाट एवं नर्मदापुरम जैसे प्रमुख धार्मिक व प्राकृतिक स्थलों से होकर गुजरना पड़ा।
- अंततः पुनः ओंकारेश्वर पहुंचकर परिक्रमा पूर्ण हुई।
दैनिक दिनचर्या और आध्यात्मिक नियम
पंडित अखिलेश प्रतिदिन सूर्योदय से सूर्यास्त तक लगभग 40 किलोमीटर पैदल चलते थे। वे प्रतिदिन सुबह 3 से 4 बजे उठकर स्नान, नित्य पाठ एवं पूजन के पश्चात यात्रा प्रारंभ करते थे।
"परिक्रमा के दौरान उन्होंने सफेद वस्त्र धारण कर संत वेश में जीवन व्यतीत किया। उन्होंने अपने भोजन भिक्षा द्वारा लिया एवं जीवन यापन किया तथा मार्ग में स्थित आश्रमों एवं मंदिरों में ही भोजन एवं रात्रि विश्राम किया। पूरे मार्ग में मौन व्रत का पालन करते हुए उन्होंने एक करोड़ शिव मंत्र जप पूर्ण किए।"
चुनौतियां और अटूट संकल्प
लगभग एक वर्ष तक चली इस कठिन पदयात्रा में उन्हें पैरों में छाले, कमर व घुटनों में दर्द जैसी शारीरिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा, किंतु अटूट श्रद्धा और दृढ़ संकल्प के साथ उन्होंने यात्रा को पूर्ण किया। इस दौरान उन्हें सुनसान जंगलों, पर्वतों, नदियों, गांवों, कस्बों तथा भीड़भाड़ वाले शहरों से होकर गुजरना पड़ा।
पौराणिक मान्यता और संदेश
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, समुद्र मंथन के उपरांत भगवान शिव ने विषपान किया था। विष के प्रभाव से उत्पन्न तप को शांत करने हेतु भगवान शिव ने अमरकंटक जैसी शीतल भूमि पर तपस्या की। तपस्या के दौरान उत्पन्न पसीने से मां नर्मदा का उद्भव हुआ—ऐसी मान्यता है।
नर्मदा परिक्रमा को सन्यास भाव से की जाने वाली एक कठोर आध्यात्मिक साधना माना जाता है। पंडित अखिलेश औदीच्य ने इस परंपरा का पूर्ण निष्ठा के साथ पालन कर समाज के लिए एक प्रेरणादायी उदाहरण प्रस्तुत किया है।

Ruturaj Ravan
यह प्रातःकाल मल्टीमीडिया में वेबसाइट मैनेजर और सोशल मीडिया एक्जीक्यूटिव के रूप में कार्यरत हैं, और पिछले तीन वर्षों से पत्रकारिता व डिजिटल मीडिया में सक्रिय हैं। इससे पूर्व उन्होंने दैनिक प्रहार में वेबसाइट प्रबंधन और सोशल मीडिया के लिए रचनात्मक कंटेंट निर्माण और रणनीतियों में अनुभव अर्जित किया। इन्होंने कोल्हापुर के छत्रपति शिवाजी महाराज विश्वविद्यालय से स्नातक और हैदराबाद के सत्या इंस्टीट्यूट से उच्च शिक्षा पूरी की। इन्हें SEO मैनेजमेंट, सोशल मीडिया और उससे संबंधित रणनीतियाँ तैयार करने में व्यापक अनुभव है।
