मारवाड़ के चरवाहों की वतन वापसी शुरू, आकोला से गुज़रा पशुपालकों का जत्था
मानसून की पहली फुहारें पड़ते ही मालवा और चित्तौड़गढ़ से पाली, जोधपुर और बाड़मेर जिलों की सूनी ढाणियों की ओर लौटने लगे पारंपरिक रेबारी चरवाहे।

चित्तौड़गढ़ के आकोला क्षेत्र में मानसून की आहट के बाद हरी घास और पानी की तलाश से वापस मारवाड़ की सीमाओं में लौटते पारंपरिक वेशभूषा में सजे रेबारी चरवाहे और उनकी भेड़-बकरियों का जत्था।
आसमान में काले बादलों की उमड़ती आवाजाही और मानसून की पहली फुहारों के गिरते ही मारवाड़ के पारंपरिक चरवाहों के कदम अपनी मातृभूमि की ओर वापस मुड़ गए हैं। पिछले 7 से 8 महीनों से हरी घास और पानी की घोर तलाश में मालवा व चित्तौड़गढ़ क्षेत्र के कई गांवों में भटक रहे इन मूल निवासी पशुपालकों (गडरियों/रेबारियों) के विशाल जत्थे (मरेड़े) अब मारवाड़ की सीमाओं में प्रवेश करने लगे हैं। इसी क्रम में आज आकोला क्षेत्र से हजारों की संख्या में भेड़-बकरियों के जत्थे गुजरे। बरसात का मौसम शुरू होते ही अपनी लाखों भेड़-बकरियों और ऊंटों के साथ इन दृढ़ संकल्पी चरवाहों की घर वापसी का यह अभूतपूर्व नजारा मारवाड़ की समृद्ध संस्कृति और उनके जीवन के कठिन संघर्ष की एक अनूठी व जीवंत दास्तां को बयां करता है।
पिछले वर्ष दीपावली का त्योहार बीतने के बाद जब मारवाड़ के अंचल में चारा और पानी का भीषण संकट गहराने लगा था, तब ये पारंपरिक चरवाहे अपने पैतृक गांवों और ढाणियों से सैकड़ों किलोमीटर दूर अज्ञात रास्तों पर निकल गए थे। कड़कती ठंड की रातें और फिर झुलसा देने वाली भीषण गर्मी में खुले आसमान के नीचे कठिन समय गुजारने के बाद, अब इन्हें अपनी ढोल-मिट्टी की सोंधी खुशबू अपनी ओर खींच रही है। इस भावुक सफर को साझा करते हुए बुजुर्ग पशुपालक भूराराम रेबारी भावुक मन से बताते हैं कि हमारे लिए सावन भगवान का सबसे बड़ा आशीर्वाद बनकर आता है और जैसे ही मारवाड़ में बारिश की पहली खबर मिलती है, हमारी भेड़ें भी मानो स्वयं अपने घर का रास्ता पहचान जाती हैं; अब बस हृदय में जल्दी से जल्दी अपनी ढाणी पहुँचने की तीव्र चाह है।
सैकड़ों किलोमीटर लंबी इस पैदल यात्रा के दौरान इन गडरियों को पग-पग पर भीषण चुनौतियों और मुश्किलों का सामना करना पड़ता है। दुर्गम रास्तों में जंगली जानवरों का निरंतर डर, चोर-उच्चकों का खौफ और आसमान से बरसती तेज धूप के बावजूद ये जांबाज चरवाहे अपने पूरे कुनबे और मवेशियों को पूरी तरह सुरक्षित लेकर लौट रहे हैं। अपनी पारंपरिक वेशभूषा—सफेद धोती-कुर्ता, सिर पर बंधा लाल साफा और हाथ में मजबूत लाठी थामे इन चरवाहों के जीवंत जत्थों से समय हाईवे और ग्रामीण रास्ते पूरी तरह गुलजार नजर आ रहे हैं।
इन गडरियों की वतन वापसी से मारवाड़ के पाली, जोधपुर, बाड़मेर, जालोर और नागौर जिलों की वे तमाम ढाणियां जो पिछले कई महीनों से पूरी तरह सूनी और वीरान पड़ी थीं, अब फिर से चहक उठेंगी और वहां रौनक लौट आएगी। इन प्रवासियों के आगमन पर गांवों में महिलाओं और बच्चों द्वारा बेहद अनूठे और पारंपरिक तरीके से इनका आत्मीय स्वागत सत्कार किया जा रहा है, जो इस लोक संस्कृति की जीवंतता को पुनर्स्थापित करता है।

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