कांकरवा में मकर संक्रांति की धूम: आस्था के सैलाब के बीच जीवित हुई सितोलिया और गिल्ली-डंडा की परंपरा
कांकरवा और आसपास के ग्रामीण अंचलों फलासिया खालसा, सदीपुरा, गिड़ा खेड़ा, पारी, पटोलिया और राणावतो की सादड़ी में मकर संक्रांति का पर्व पारंपरिक श्रद्धा के साथ मनाया गया। मंदिरों में विशेष श्रृंगार, पवित्र स्नान और दान-पुण्य के साथ-साथ सितोलिया और गिल्ली-डंडा जैसे पारंपरिक खेलों ने उत्सव में चार चांद लगा दिए। जानिए कैसे इस बार लोक संस्कृति और आस्था का अनूठा संगम देखने को मिला।

कांकरवा। सूर्य के उत्तरायण होते ही समूचा कांकरवा क्षेत्र आध्यात्मिक ऊर्जा और उल्लास के रंग में सराबोर हो उठा। मकर संक्रांति के पावन पर्व पर कांकरवा सहित आसपास के ग्रामीण अंचलों—फलासिया खालसा, सदीपुरा, गिड़ा खेड़ा, पारी, पटोलिया और राणावतो की सादड़ी में श्रद्धा का ऐसा सैलाब उमड़ा कि चप्पे-चप्पे पर केवल उत्सव की गूँज सुनाई दी। ब्रह्ममुहूर्त से ही मंदिरों के पट खुलते ही दर्शनार्थियों की भारी भीड़ जुटने लगी, जिससे समूचा परिवेश भक्तिमय हो गया।
इस वर्ष पर्व का आकर्षण केवल धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि लोक संस्कृति का अनूठा संगम भी देखने को मिला। कांकरवा के प्रमुख देवालयों में भगवान की प्रतिमाओं का अलौकिक और मनमोहक श्रृंगार किया गया, जिसकी छटा देखते ही बनती थी। विशेष सजावट के बीच श्रद्धालुओं ने कतारबद्ध होकर सुख-समृद्धि की मंगल कामना की। परंपरा का निर्वहन करते हुए अलसुबह पवित्र जलाशयों में स्नान के पश्चात भगवान सूर्य नारायण को अर्घ्य दिया गया। दान-पुण्य की महिमा को आत्मसात करते हुए ग्रामीणों ने सामर्थ्य अनुसार गौवंश को हरा चारा खिलाया और तिल-गुड़, खिचड़ी, वस्त्र सहित बर्तनों का गुप्त दान कर पुण्य अर्जित किया।
उत्सव की सबसे जीवंत तस्वीर गांव की गलियों और चौपालों से निकलकर आई, जहाँ आधुनिकता के दौर में भी पारंपरिक खेलों के प्रति भारी उत्साह देखा गया। इस बार बच्चों के साथ-साथ बड़े-बुजुर्गों ने भी पूरे जोश के साथ सितोलिया और गिल्ली-डंडा जैसे खेलों में हाथ आजमाया। इन खेलों के माध्यम से न केवल नई पीढ़ी अपनी जड़ों से जुड़ी, बल्कि बुजुर्गों की भी पुरानी यादें ताजा हो गईं। बाजार भी इस उत्सव के रंग से अछूते नहीं रहे; तिल-पट्टी, गज्जक और पतंग-मांझे की दुकानों पर सुबह से शाम तक ग्राहकों की चहल-पहल बनी रही। घरों में तिल के लड्डू और खिचड़ी जैसे पारंपरिक व्यंजनों का स्वाद चखते हुए परिवारों ने इस पर्व की गरिमा को बढ़ाया। यह आयोजन न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक बना, बल्कि इसने ग्रामीण एकजुटता और सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण का भी सशक्त संदेश दिया।

Pratahkal Newsroom
प्रातःकाल न्यूज़-रूम, प्रातःकाल न्यूज़ की वह समर्पित संपादकीय टीम है, जो सटीक, समयबद्ध और निष्पक्ष समाचार पहुँचाने के लिए प्रतिबद्ध है। हमारा न्यूज़-रूम राजनीति, समाज, अर्थव्यवस्था और राष्ट्रीय मामलों में सत्यापित रिपोर्टिंग, गहन विश्लेषण और जिम्मेदार पत्रकारिता पर अपना ध्यान केंद्रित करता है।
