साहित्य की आलोचना के लिए आलोचक को न्याय का सहारा लेना चाहिए: प्रो. पाठक
अखिल भारतीय साहित्य परिषद निंबाहेड़ा द्वारा आयोजित परिचर्चा में प्रो. हरेराम पाठक ने साहित्य में लोक मंगल की अवधारणा और आलोचना की भारतीय दृष्टि पर विचार साझा किए।

निंबाहेड़ा के दयानंद जिज्ञासु सभागार में 'आलोचना की भारतीय दृष्टि' विषयक संगोष्ठी के दौरान मंचासीन अतिथि और उपस्थित प्रबुद्ध साहित्यकार।
लोक मंगल की अवधारणा और वर्तमान चुनौतियां
आज साहित्य में लोक मंगल की अवधारणा विघटित होती हुई-सी दिखाई देने लगी है। लोक ही जब विभिन्न समुदायों में बँटकर राजनीति सृजित अपनी-अपनी अस्मिता की लड़ाई लड़ने लगेगा और साहित्य उसी लड़ाई को प्रश्रय देने हेतु लिखा जाने लगेगा तो लोक मंगल की भावना खंडित होगी ही। ऐसी स्थिति में साहित्यालोचन के पुराने मानकों पर भी प्रश्न-चिह्न उठने लगते हैं। साहित्य में विवेक के स्थान पर कुतर्क हावी होने लगता है।
"साहित्य की आलोचना के लिए आलोचक को न्याय का सहारा लेना होगा। न्याय के आधारभूत स्रोतों पर विचार करना होगा।"
उक्त विचार सोमवार को अखिल भारतीय साहित्य परिषद निंबाहेड़ा द्वारा आयोजित साहित्यिक परिचर्चा में असम से आए हुए राष्ट्रवादी चिंतक और प्रोफेसर हरेराम पाठक ने व्यक्त किये।
आलोचना की भारतीय दृष्टि: २१वीं सदी का स्वरूप
निंबाहेड़ा में जेके बाउंड्री रोड पर स्थित दयानंद जिज्ञासु सभागार में "आलोचना की भारतीय दृष्टि" विषयक साहित्यिक परिचर्चा का प्रारंभ करते हुए डॉ. राजेंद्र कुमार सिंघवी ने कहा कि:
- इक्कीसवीं सदी में हिन्दी आलोचना बहुमुखी धाराओं के साथ आगे बढ़ रही है।
- रचनागत मूल्यांकन में भारतीय मूल्यों की गहनता प्रकट हो रही है तो पश्चिमी अवधारणाएँ इसे नया कलेवर दे रही हैं।
- रचनाओं की विपुल मात्राओं, विविध वैचारिक पक्षों के उदय से आलोचना की गंभीरता बढ़ती जा रही हैं।
- भूमण्डलीकरण के दौर में एकांगी दृष्टि संभव भी नहीं है।
अतिथियों का मेवाड़ी परंपरा से स्वागत
परिचर्चा संयोजक डा. रवीन्द्र कुमार उपाध्याय ने बताया कि प्रारंभ में साहित्य परिषद निंबाहेड़ा इकाई के पूर्व अध्यक्ष बीसी पांडे ने अतिथियों का मेवाड़ी परंपरा अनुसार पाग, पगड़ी, शॉल, उपरना, स्मृति चिन्ह भेंट कर स्वागत अभिनंदन किया। उन्होंने कहा कि निंबाहेड़ा जैसे छोटे कस्बे में प्रोफेसर हरेराम पाठक जैसे लब्ध प्रतिष्ठित विद्वान का उद्बोधन और परिचर्चा में भाग लेना हम सब के लिए गर्व की बात है।
विशिष्ट अतिथि वक्तव्य देते हुए ब्लॉगर, भजन जिज्ञासु ने कहा कि:
"हिंदी आलोचना कोष के दस खंडों का संपादन करने वाले और भारत के ख्यातनाम आलोचक प्रो. हरेराम पाठक का उद्बोधन निंबाहेड़ा के साहित्यकारों को साहित्यिक आलोचना की एक नई दृष्टि दे रहा है।"
आलोचना का सर्वसमावेशी स्वरूप
परिचर्चा में भाग लेते हुए डॉ. रविंद्र कुमार उपाध्याय ने कहा कि:
- सामान्य भाषा में किसी कृति और साहित्यकार के व्यक्तित्व और कृतित्व के गुण दोषों का विवेचन ही आलोचना कहलाता है।
- आलोचना की भारतीय दृष्टि एकांगी ना होकर सर्वसमावेशी है, जिसमें किसी कृति का मूल्यांकन राष्ट्र, समाज, सृष्टि के लोकमंगल और लोक कल्याण की भावना से किया जाता है।
परिचर्चा के सहभागी और आभार
आलोचना की भारतीय दृष्टि विषयक परिचर्चा में निम्नलिखित विद्वानों ने भाग लिया:
- डॉ. बी एम भट्ट, डा. राकेश खटीक, शायर एजाज अहमद
- श्रीपाल सिंह सिसोदिया, अशोक जायसवाल, रमेश लक्षकार
- जानकी लाल जोशी, अशोक जिज्ञासु, मयंक चौधरी
- उमेश कुमार शर्मा, नरेंद्र शर्मा, वाजिद अली
- अयूब हुसैन, कमलेश जैन, वी के पानेरी, दिनेश धींग
अतिथियों का आभार साहित्य परिषद के विभाग संयोजक एवं राजस्थानी कवि राजेश गांधी ने प्रकट किया। कार्यक्रम के अंत में लेखकों, कवियों एवं साहित्यकारों ने आलोचना की भारतीय दृष्टि पर देर रात तक गहन चर्चा में सहभागिता की।

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