डीके फीडर निर्माण विवाद: किसानों का प्रदर्शन और सरकारी कार्य में बाधा से विकास पर संकट
कपासन में 25 करोड़ की डीके फीडर परियोजना पर संकट के बादल। मुआवजे की मांग को लेकर किसानों का प्रदर्शन और सरकारी इंजीनियर के साथ मारपीट से निर्माण कार्य रुका। क्या इस बार भी प्यासे रहेंगे कपासन के तालाब? पढ़ें पूरी रिपोर्ट।

तस्वीर में कपासन की डीके फीडर परियोजना के तहत निर्माण कार्य के लिए उपयोग में लाए जा रहे ट्रैक्टर और उपकरण दिख रहे हैं, जिसे लेकर विवाद बढ़ गया है।
कपासन क्षेत्र के सूखे तालाबों को पुनर्जीवित करने के उद्देश्य से संचालित महत्वाकांक्षी 'डीके फीडर' परियोजना के मरम्मत कार्य में बड़ा व्यवधान उत्पन्न हो गया है। जीतावास क्षेत्र में चल रहे निर्माण कार्य के दौरान किसानों के विरोध और सरकारी अधिकारियों के साथ कथित मारपीट के बाद स्थिति तनावपूर्ण हो गई है। सिंचाई विभाग द्वारा रेलमगरा थाने में राजकार्य में बाधा पहुंचाने और मारपीट के गंभीर आरोपों में नामजद रिपोर्ट दर्ज कराई गई है, जिससे मानसून से पूर्व निर्माण पूरा करने की चुनौती और अधिक बढ़ गई है।
क्षेत्र के विकास के लिए राजस्थान सरकार द्वारा स्वीकृत 25 करोड़ रुपये की इस परियोजना के तहत सींदेसर से बनास नदी तक 'स्टोन पीचिंग' का कार्य युद्ध स्तर पर किया जा रहा है। विभाग के अनुसार, 10 जून को जब सहायक अभियंता सांवरमल जाट सरकारी भूमि पर जारी कार्य का निरीक्षण करने पहुंचे, तो कुछ स्थानीय किसानों ने निर्माण रुकवा दिया। विवाद के दौरान सिंचाई विभाग के ठेकेदार के चालक पर लाठियों से हमला किया गया और घटना का वीडियो मिटाने के लिए उसका मोबाइल भी छीन लिया गया। सहायक अभियंता के साथ भी अभद्र व्यवहार किया गया, जिसके बाद पुलिस ने तीन व्यक्तियों के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर जांच शुरू कर दी है।
दूसरी ओर, जीतावास सरपंच पूरण जाट ने किसानों का पक्ष रखते हुए स्पष्ट किया है कि ग्रामीण विकास के विरोधी नहीं हैं, बल्कि अपनी निजी खातेदारी भूमि के मुआवजे और भविष्य की सुरक्षा को लेकर चिंतित हैं। किसानों का तर्क है कि पक्के निर्माण से उनकी उपजाऊ जमीन प्रभावित हो रही है, जिसके समाधान के लिए उन्होंने जोधपुर उच्च न्यायालय में रिट याचिका भी दायर की है। उनका सुझाव है कि नहर के दोनों ओर ऊंची दीवारें बनाकर भूमि का बचाव किया जा सकता है। अब कपासन विधायक अर्जुन लाल जीनगर के सामने विकास और जनहित के इस टकराव को सुलझाने की बड़ी चुनौती है। मानसून के निकट होने के कारण यदि इस विवाद का त्वरित समाधान नहीं निकला, तो क्षेत्र के जल संकट के निवारण की उम्मीदों पर फिर से पानी फिर सकता है।

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