चित्तौड़गढ़ में रूढ़ियों की बेड़ियाँ टूटीं: मासूम बेटियों ने अर्थी को दिया कंधा, मुखाग्नि दे निभाया बेटे का फर्ज
चित्तौड़गढ़ के पंचवटी में रूढ़ियों को तोड़ती एक भावुक मिसाल सामने आई है। 44 वर्षीय रविंद्र प्रताप सिंह कोठारी के आकस्मिक निधन के बाद उनकी मासूम बेटियों और भतीजियों ने न केवल अर्थी को कंधा दिया, बल्कि मुखाग्नि देकर समाज को बेटा-बेटी की समानता का संदेश दिया। बदलते भारत की इस सशक्त कहानी को यहाँ विस्तार से पढ़ें।

चित्तौड़गढ़। परंपरा और प्रेम के बीच जब भी द्वंद्व होता है, जीत हमेशा मानवीय संवेदनाओं की ही होती है। राजस्थान के ऐतिहासिक शहर चित्तौड़गढ़ के पंचवटी क्षेत्र में आज एक ऐसी ही हृदयविदारक किंतु प्रेरणादायी घटना घटी, जिसने सदियों पुरानी सामाजिक रूढ़ियों को धराशायी कर दिया। यहाँ दो मासूम बेटियों ने न केवल अपने पिता की अर्थी को कंधा दिया, बल्कि जलती चिता को मुखाग्नि देकर यह स्पष्ट संदेश दिया कि संतान के रूप में बेटा और बेटी के बीच का भेद केवल एक मानसिक भ्रम है।
घटना का केंद्र पंचवटी निवासी 44 वर्षीय रविंद्र प्रताप सिंह कोठारी का निवास रहा, जिनका आकस्मिक निधन पूरे क्षेत्र के लिए एक स्तब्ध कर देने वाली खबर बनकर आया। असमय काल के गाल में समाए रविंद्र प्रताप के पीछे उनका भरा-पूरा परिवार बिलखता छोड़ गया। घर के मुखिया का साया इतनी कम उम्र में सिर से उठ जाने के बाद कोठारी परिवार गहरे शोक में डूब गया, लेकिन इस दुख की घड़ी में जो मिसाल पेश की गई, उसने पूरे शहर की आंखों को नम कर दिया।
भारतीय समाज में आमतौर पर अंतिम संस्कार की क्रियाएं पुरुष उत्तराधिकारियों या बेटों द्वारा ही संपन्न की जाती हैं। समाज के इसी पुरातन विधान को किनारे रखते हुए रविंद्र प्रताप सिंह की दोनों मासूम बेटियों और उनकी भतीजियों ने वह निर्णय लिया जिसे देखकर हर कोई गौरवान्वित महसूस कर रहा है। जब रविंद्र की अंतिम यात्रा उनके निवास स्थान से शुरू हुई, तो उनकी बेटियों ने पिता की अर्थी को कंधा देकर विदाई की शुरुआत की।
शमशान घाट (मोक्षधाम) पर जब मंत्रोच्चार के साथ अंतिम विदाई का समय आया, तो बेटियों ने ही अपने पिता की चिता को मुखाग्नि दी। उपस्थित जनसमूह इस साहसिक और भावनात्मक दृश्य का साक्षी बना। बेटियों ने अपनी इस जिम्मेदारी से यह सिद्ध कर दिया कि पिता के प्रति उनका स्नेह और कर्तव्य किसी भी रूढ़िवादी सामाजिक बंधन की सीमाओं में नहीं बांधा जा सकता।
पंचवटी की इन बेटियों द्वारा पेश की गई यह मिसाल बदलते भारत की एक सशक्त और जीवंत तस्वीर है। समाज में प्रचलित यह धारणा कि 'पुत्र के बिना तर्पण अधूरा है', आज इन बेटियों के साहस के आगे फीकी पड़ गई। रविंद्र प्रताप सिंह कोठारी भले ही आज भौतिक रूप से इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन उनकी बेटियों ने उन्हें जो मान-सम्मान और गरिमापूर्ण विदाई दी है, उसकी गूंज पूरे चित्तौड़गढ़ में एक मिसाल बनकर गूंज रही है। यह घटना समाज के लिए एक दर्पण है कि बेटियां केवल घर की रौनक ही नहीं, बल्कि कुल की मान-मर्यादा और संकट के समय का सबसे मजबूत आधार भी होती हैं।

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