चित्तौड़गढ़। कृषि विज्ञान केन्द्र द्वारा गाजरघास उन्मूलन जागरूकता सप्ताह के तहत रावे विद्यार्थियों एवं किसानों को खेतों के बीच और खाली जगहों पर उगने वाली गाजरघास के उन्मूलन तथा इससे होने वाली बीमारियों के प्रति सचेत किया गया।

वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. रतन लाल सोलंकी ने बताया कि गाजरघास उन्मूलन सप्ताह मनाने का मुख्य उद्देश्य ग्रामीण एवं शहरी समुदाय को गाजरघास से होने वाले रोगों एवं स्वास्थ्य समस्याओं तथा घरेलू स्तर पर गाजरघास हटाने संबंधी तकनीकी जानकारी से अवगत कराना है। उन्होंने बताया कि गाजरघास को क्रांगेस घास, चटक चांदनी और सफेद टोंपी आदि नामों से भी जाना जाता है। इसका प्रवेश 1955 में अमेरिका से आयात गेहूं के साथ हुआ था और कम समय में ही गाजरघास पूरे देश में फैल गई।

केन्द्र की कार्यक्रम सहायक दीपा इन्दौरिया ने बताया कि गाजरघास के लगातार संपर्क में रहने से विभिन्न प्रकार की त्वचीय एलर्जी, बुखार तथा अस्थमा जैसी बीमारियां होने की संभावनाएं रहती हैं। इससे बचाव के लिए गाजरघास के पौधे में फूल आने से पहले उसे उखाड़कर जला देना चाहिए। पौधे को हाथ लगाने से पहले दस्ताने तथा मास्क का प्रयोग करना अनिवार्य है, ताकि पौधे का कोई भी भाग शरीर के संपर्क में नहीं आ सके। इसके अलावा पशुधन को भी इस घास से दूर रखने का संभवतः प्रयास किया जाना चाहिए।

उन्होंने बताया कि इस खरपतवार में सेस्क्युटरपिन लेक्टौन नामक विषाक्त रसायन पाया जाता है, जिसके कारण फसल उत्पादन में 40 प्रतिशत तक कमी आ जाती है।

संजय कुमार धाकड़ ने बताया कि गाजरघास का पौधा विभिन्न बीमारियों तथा जलवायु के प्रति उदासीन होता है। इसके कारण यह किसी भी प्रकार की भूमि में आसानी से उग जाती है। नदी, नालों और सिंचाई के पानी के माध्यम से भी गाजरघास के सूक्ष्म बीज एक स्थान से दूसरे स्थान पर आसानी से पहुंच जाते हैं।

उन्होंने बताया कि गाजरघास की प्रतिस्पर्धी वनस्पति चकोड़ा, हिपटीस और जंगली चौलाई आदि के माध्यम से गाजरघास को आसानी से विस्थापित किया जा सकता है। गाजरघास के स्वास्थ्य संबंधी खतरों और फसल उत्पादन पर पड़ने वाले प्रभाव को देखते हुए इसके समय रहते उन्मूलन और उचित सावधानी की जानकारी ग्रामीण एवं शहरी समुदाय तक पहुंचाना जागरूकता सप्ताह का प्रमुख उद्देश्य है।

Pratahkal Newsroom

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