चित्तौड़गढ़: बनास नदी के अस्तित्व पर संकट, प्रशासन की शह पर जनप्रतिनिधि ने नदी को बनाया डंपिंग यार्ड
चित्तौड़गढ़ के राशमी में बनास नदी के अस्तित्व पर संकट! पंचायत प्रशासन ने नदी पेटे को बनाया डंपिंग यार्ड, अवैध खनन और अतिक्रमण की कोशिशों पर अधिकारियों ने साधी चुप्पी। पटवारी चंद्रदीप के अजीब तर्क और जनप्रतिनिधियों के राजनीतिक दबाव के बीच दम तोड़ती जीवनदायिनी नदी की पूरी रिपोर्ट।

चित्तौड़गढ़/राशमी। राजस्थान के चित्तौड़गढ़ जिले में विकास और स्वच्छता के दावों के बीच एक कड़वी सच्चाई सामने आई है, जहाँ जीवनदायिनी मानी जाने वाली बनास नदी प्रशासनिक अनदेखी और राजनीतिक रसूख की भेंट चढ़ रही है। राशमी उपखंड मुख्यालय पर पंचायत समिति कार्यालय से महज 300 मीटर की दूरी पर स्थित बनास नदी के स्वरूप को बिगाड़ने का खेल धड़ल्ले से जारी है। स्थानीय जनप्रतिनिधि की मनमर्जी और प्रशासनिक अधिकारियों की चुप्पी ने इस मामले को गंभीर बना दिया है, जहाँ पवित्र नदी के पेटे को डंपिंग ग्राउंड में तब्दील कर दिया गया है।
ग्रामीणों का आरोप है कि कचरा डालना तो महज एक दिखावा है, असल मकसद नदी के मुहाने पर अवैध कब्जा जमाना है। नदी की कोख को पहले ही अवैध बजरी खनन से छलनी किया जा चुका है, और अब डंपिंग ग्राउंड का निर्माण 'कोढ़ में खाज' जैसा साबित हो रहा है। नदी पेटे की जमीन को खोदकर वहां बाकायदा लोहे के एंगल लगाकर निर्माण कार्य करवाया जा रहा है, जो सीधे तौर पर नदी के प्राकृतिक प्रवाह और भूमि पर अतिक्रमण का प्रयास है। जानकार बताते हैं कि इस पूरे खेल को स्थानीय प्रशासन का मूक समर्थन प्राप्त है।
इस गंभीर मामले पर जब जवाबदेही तय करने की कोशिश की गई, तो तंत्र की संवेदनहीनता खुलकर सामने आई। जिम्मेदार अधिकारी मीडिया के सवालों से बचने के लिए फोन उठाने तक की जहमत नहीं उठा रहे हैं। कई प्रयासों के बाद जब एक उच्च प्रशासनिक अधिकारी से संपर्क हुआ, तो उन्होंने जानकारी न होने का हवाला देते हुए मामले को दिखवाने की रस्म अदायगी कर पल्ला झाड़ लिया। सरकारी मशीनरी की कार्यप्रणाली पर सबसे बड़ा सवाल राशमी पटवार मंडल के पटवारी चंद्रदीप के तर्क ने खड़ा किया। पटवारी ने पहले तो नदी पेटे की जमीन को 'चरनोट' (चारागाह) भूमि बताकर गुमराह करने की कोशिश की, लेकिन जब उनसे नदी और चारागाह भूमि के बीच के अंतर पर तकनीकी सवाल पूछे गए, तो उन्होंने झल्लाते हुए कागजी कार्रवाई की बात कहकर संवाद ही खत्म कर दिया।
नदी के अस्तित्व से खिलवाड़ का यह मामला केवल कूड़ा डालने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके तार अवैध खनन और संगठित अतिक्रमण से जुड़े हुए हैं। बताया जा रहा है कि स्थानीय जनप्रतिनिधि को क्षेत्र के रसूखदार बड़े नेताओं का संरक्षण प्राप्त है, जिसके कारण स्थानीय प्रशासन नतमस्तक नजर आ रहा है। राजनीतिक दबाव और भ्रष्टाचार के गठजोड़ ने एक जीवित नदी को कूड़े के ढेर में तब्दील होने पर मजबूर कर दिया है। फिलहाल प्रशासन की यह चुप्पी बनास नदी के भविष्य के लिए खतरे की घंटी है, जिससे न केवल पर्यावरण को अपूरणीय क्षति हो रही है बल्कि आने वाले समय में नदी के अस्तित्व पर ही प्रश्नचिह्न लग गया है।

Pratahkal Bureau
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