चित्तौड़गढ़: श्री शेषावतार कल्लाजी वेदपीठ पर सूर्य की आभा से दमक उठे ठाकुर जी, आस्था के महासंगम में उमड़ा जनसैलाब
चित्तौड़गढ़ की प्रसिद्ध श्री शेषावतार कल्लाजी वेदपीठ पर मकर संक्रांति का पर्व धूमधाम से मनाया गया। ठाकुर जी का सूर्य स्वरूप में भव्य श्रृंगार, सूर्य यंत्र पूजा और सूर्य सूक्त अनुष्ठान ने भक्तों को मंत्रमुग्ध कर दिया। कल्याण भक्तों और आचार्यों के सानिध्य में आयोजित इस महोत्सव में गौ सेवा और यज्ञ के माध्यम से विश्व कल्याण की कामना की गई। विस्तार से पढ़ें पूरी खबर।
चित्तौड़गढ़। मेवाड़ की पावन धरा पर भक्ति और आध्यात्म का अद्भुत संगम देखने को मिला, जब प्रसिद्ध श्री शेषावतार कल्लाजी वेदपीठ पर मकर संक्रांति का पर्व अभूतपूर्व श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया गया। हाड़ कंपा देने वाली शीत लहर भी श्रद्धालुओं के उत्साह को डिगा नहीं सकी और तड़के से ही वेदपीठ परिसर मंत्रोच्चार से गुंजायमान हो उठा। इस पावन अवसर पर ठाकुर श्री का अलौकिक 'सूर्य स्वरूप' में श्रृंगार किया गया, जिसकी स्वर्णिम आभा को निहार कर भक्त मंत्रमुग्ध रह गए। साक्षात सूर्य देव के प्रतिरूप में सजे अपने आराध्य की अनुपम छटा को देखकर हर कोई चकित और भावविभोर नजर आया।
उत्सव का विधि विधान पूर्णतः शास्त्रोक्त परंपराओं पर आधारित रहा। वेदपीठ के विद्वान आचार्यों एवं बटुकों के सानिध्य में कल्याण भक्तों ने पवित्र दस विधि गंगा स्नान की रस्म पूरी की। इसके पश्चात, सूर्य यंत्र की विधिवत पूजा-अर्चना करते हुए भगवान भास्कर का अभिषेक किया गया। कल्याण भक्तों ने सूर्य उपासना के माध्यम से चराचर जगत में खुशहाली, शांति और समृद्धि की मंगल कामना की। वेदपीठ की आध्यात्मिकता उस समय अपने चरमोत्कर्ष पर पहुंच गई जब ठाकुर श्री की विशेष अनुकंपा से श्री सूर्य सूक्त का अनुष्ठान प्रारंभ हुआ। इस दौरान आयोजित सूर्य यज्ञ में यजमानों ने वैदिक मंत्रों के उच्चारण के साथ गौघृत एवं शाकल्य की आहुतियां समर्पित कीं और भगवान भास्कर से समस्त सृष्टि पर कृपा दृष्टि बनाए रखने का अनुनय-विनय किया।
मकर संक्रांति के इस पुण्य काल में परंपराओं का निर्वहन करते हुए ठाकुर श्री को तिल से बने विशेष व्यंजनों और पारंपरिक खीचड़े का भोग लगाया गया, जिसे बाद में श्रद्धालुओं में प्रसाद के रूप में वितरित किया गया। जीव दया की सनातन परंपरा को जीवंत करते हुए वैदिक विश्वविद्यालय स्थित श्री कल्याण गौशाला में भी भव्य आयोजन हुआ। यहां गौमाता को छप्पन भोग अर्पित किए गए, साथ ही हरा चारा और सवा क्विंटल गुड़-लापसी का भोग लगाकर पुण्य अर्जित किया गया। यह संपूर्ण आयोजन न केवल धार्मिक निष्ठा का प्रतीक रहा, बल्कि मेवाड़ की गौरवशाली सांस्कृतिक और वैदिक विरासत को भी मजबूती से प्रदर्शित कर गया।

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