केरल के शिक्षक के निलंबन पर चित्तौड़गढ़ में ज्ञापन, तत्काल बहाली की मांग उठी
सावरकर से जुड़े प्रश्न पर केरल के शिक्षक गुरु प्रसाद के निलंबन के विरोध में चित्तौड़गढ़ में ज्ञापन देकर तत्काल बहाली की मांग की गई।

तस्वीर में चित्तौड़गढ़ कलेक्ट्रेट कार्यालय में जिला कलेक्टर को ज्ञापन सौंपते हुए शिक्षक प्रतिनिधि नजर आ रहे हैं।
चित्तौड़गढ़। अखिल भारतीय राष्ट्रीय शैक्षिक महासंघ के राष्ट्रव्यापी आह्वान पर स्वातंत्र्यवीर विनायक दामोदर सावरकर से संबंधित प्रश्न पूछने पर केरल के शिक्षक गुरु प्रसाद के निलंबन को तत्काल वापस लेने की मांग को लेकर अखिल भारतीय राष्ट्रीय शैक्षिक महासंघ राजस्थान (विद्यालय शिक्षा) चित्तौड़गढ़ ने जिला कलेक्टर डॉ. मंजु को प्रधानमंत्री, केरल के राज्यपाल एवं मुख्यमंत्री के नाम ज्ञापन सौंपा। ज्ञापन वरिष्ठ उपाध्यक्ष भंवरसिंह मुरलिया एवं जिला मंत्री निर्भयराम धाकड़ के नेतृत्व में सौंपा गया।
ज्ञापन में कहा गया कि शिक्षा केवल ज्ञानार्जन का माध्यम नहीं, बल्कि राष्ट्रबोध, राष्ट्रीय चरित्र, सांस्कृतिक आत्मगौरव और कर्तव्यबोध के निर्माण का प्रमुख साधन है। केरल के कासरगोड जिले के कुंबला सब-डिस्ट्रिक्ट में आयोजित विद्यालयी क्विज प्रतियोगिता में स्वातंत्र्यवीर विनायक दामोदर सावरकर से संबंधित प्रश्न पूछे जाने के कारण प्रश्न निर्माण से जुड़े शिक्षक गुरु प्रसाद के निलंबन की घटना ने देशभर के शिक्षक समुदाय में गंभीर चिंता उत्पन्न की है। महासंघ ने इस कार्रवाई की कड़े शब्दों में निंदा की।
महासंघ ने कहा कि स्वातंत्र्यवीर विनायक दामोदर सावरकर भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के महत्वपूर्ण ऐतिहासिक व्यक्तित्व हैं। उनके विचारों से सहमति-असहमति हो सकती है, किंतु सावरकर पर प्रश्न पूछना न अपराध है और न अनुशासनहीनता। यदि प्रश्न में कोई तथ्यात्मक अथवा भाषाई त्रुटि थी तो उसे सुधारा जा सकता था। इसके लिए शिक्षक को निलंबित करना उचित और अनुपातिक कार्रवाई नहीं है।
ज्ञापन में कहा गया कि भारत का स्वतंत्रता आंदोलन किसी एक राजनीतिक दल अथवा विचारधारा की संपत्ति नहीं है। असंख्य ज्ञात-अज्ञात राष्ट्रभक्तों के त्याग और बलिदान से इसकी राष्ट्रीय गाथा निर्मित हुई है।
महासंघ ने यह भी कहा कि यदि प्रश्नावली संबंधित उप जिला शिक्षा अधिकारी द्वारा अनुमोदन के बाद विभिन्न विद्यालयों में प्रसारित की गई थी, तो किसी कथित त्रुटि के लिए केवल प्रश्न तैयार करने वाले शिक्षक को जिम्मेदार ठहराना उचित नहीं है। शिक्षक का दायित्व विद्यार्थियों को किसी विशेष विचारधारा की ओर ले जाना नहीं, बल्कि उन्हें प्रश्न करने, तर्क करने, प्रमाणों की जांच करने और विभिन्न दृष्टिकोणों को समझने के लिए सक्षम बनाना है। निर्भीक नागरिकों के निर्माण के लिए निर्भीक शिक्षक आवश्यक हैं।
ज्ञापन में कहा गया कि स्वतंत्र भारत में विभिन्न सरकारों और राजनीतिक विचारधाराओं द्वारा सावरकर को सार्वजनिक जीवन में ऐतिहासिक व्यक्तित्व के रूप में स्वीकार किया गया है। इतिहास को राजनीतिक चश्मे से नहीं देखा जाना चाहिए और शिक्षा को वैचारिक दबाव से मुक्त रखा जाना चाहिए।
इस प्रकरण का संज्ञान लेते हुए केरल सरकार से गुरु प्रसाद का निलंबन तत्काल एवं अविलंब वापस लेने तथा उन्हें सम्मानपूर्वक सेवा में बहाल करने के लिए आवश्यक कार्रवाई सुनिश्चित करने की मांग की गई।
इस दौरान प्रकाशचन्द्र बक्षी, नर्बदाशंकर पुष्करणा, तेजपालसिंह शक्तावत, राजेन्द्र गगरानी, मुकेशचन्द्र त्रिपाठी, भगवतीलाल, ओमप्रकाश छीपा, शंकरलाल भांभी, गोपाललाल जाट, जोगेन्द्रसिंह राणावत, रतनलाल जांगिड़, दिनमान वशिष्ठ, मांगीलाल सुथार, चमनसिंह शक्तावत, दिनेश वैष्णव, शांतिलाल शर्मा, इन्द्रमल वैष्णव, कालूलाल रायका, विकास कुमार आचार्य, सुरेशचन्द्र लौहार, बीरबलसिंह, सुरेशचन्द्र कुम्हार, निर्भरायम धाकड़, नरेन्द्रसिंह शक्तावत, शंभूदास वैष्णव, देवकीनन्दन वैष्णव, भरत कुमार तेली, दिनेश चौधरी, गोपालकृष्ण नामधर, महिपाल चौधरी, पूरणमल, गोवर्धनलाल शर्मा, सतीश बिजारनिया, हरिसिंह चौधरी, महावीर शर्मा, नारायणलाल रेबारी, विजयकुमार स्वामी, आशुतोष शर्मा, चन्द्रप्रकाश सांखोलिया, सांगासिंह भाटी, ललित शर्मा, लोकेश सोनी, कमलेश शर्मा, अशोक वैष्णव, लक्ष्मणलाल मीणा, केशव व्यास, शांतिलाल वैष्णव, सत्यनारायण गुर्जर, अमजद हुसैन, शंकरलाल सेन, सुरेन्द्र सेनी सहित कई शिक्षकगण मौजूद रहे।

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