चित्तौड़गढ़। मेवाड़ की ऐतिहासिक धरा चित्तौड़गढ़ में विधि शिक्षा के भविष्य पर अनिश्चितता के बादल मंडरा रहे हैं। जिले के एकमात्र राजकीय विधि महाविद्यालय की मान्यता को लेकर गहराते संकट के बीच, आक्रोशित छात्र-छात्राओं ने अपनी शैक्षणिक सुरक्षा के लिए हुंकार भरी है। पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकार के कार्यकाल में बड़े उत्साह के साथ शुरू हुआ यह संस्थान आज 'स्थाई मान्यता' के अभाव में अधर में लटका नजर आ रहा है, जिससे विद्यार्थियों का भविष्य दांव पर लग गया है।

इस गंभीर स्थिति को देखते हुए विद्यार्थियों के एक प्रतिनिधिमंडल ने राज्यपाल के नाम विधि महाविद्यालय के प्राचार्य को एक औपचारिक ज्ञापन सौंपा। छात्र नेता विक्रम जाट ने इस अवसर पर घटनाक्रम की गंभीरता पर प्रकाश डालते हुए बताया कि वर्ष 2021-22 के बजट में तत्कालीन मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने पूर्व राज्यमंत्री सुरेंद्र सिंह जाड़ावत की अनुशंसा पर चित्तौड़गढ़ को इस महाविद्यालय की सौगात दी थी। संभाग के इस महत्वपूर्ण संस्थान के लिए प्रशासनिक और वित्तीय स्वीकृतियां बिजली की गति से मिलीं, भूमि आवंटन हुआ और देखते ही देखते पाड़नपोल स्थित अस्थाई भवन से निकलकर महाविद्यालय अपने नवनिर्मित भव्य भवन में स्थानांतरित भी हो गया। वर्तमान में यहाँ द्वितीय वर्ष के छात्र-छात्राओं का अध्ययन सुचारू रूप से चल रहा है, लेकिन अंदरूनी तकनीकी बाधाएं अब शिक्षा के मार्ग में रोड़ा बन रही हैं।

छात्रों की मुख्य मांग है कि महाविद्यालय को 'राज सेस सोसायटी' के दायरे से बाहर निकालकर स्थाई बीसीआई (बार काउंसिल ऑफ इंडिया) की मान्यता प्रदान की जाए। ज्ञापन में स्पष्ट रूप से उल्लेख किया गया है कि यदि शीघ्र ही स्थाई मान्यता नहीं मिली, तो न केवल परीक्षा परिणामों में जटिलताएं आएंगी, बल्कि उत्तीर्ण होने के बाद छात्रों को उच्च शिक्षा और वकालत के पंजीकरण में भी भारी कठिनाइयों का सामना करना पड़ेगा। विद्यार्थियों का तर्क है कि एक पूर्ण विकसित सरकारी एलएलबी कॉलेज को स्थाई मान्यता मिलने से जिले में विधि शिक्षा का स्तर ऊँचा होगा और कानून के क्षेत्र में करियर बनाने का सपना देखने वाले युवाओं को अपने ही शहर में एक सुदृढ़ मंच प्राप्त होगा।

प्रदर्शन और ज्ञापन सौंपने के दौरान गोपाल सालवी, भरत मेनारिया, भगवतीराम जाट, प्रकाश गिरी गोस्वामी, अक्षय शर्मा, विजय भाटी, राहुल वैष्णव, अमित नकवाल और मनीष कुमार सहित बड़ी संख्या में छात्र-छात्राएं उपस्थित रहे। अब देखना यह है कि राजभवन तक पहुँची यह गुहार क्या चित्तौड़गढ़ के इस विधि संस्थान को स्थाई पहचान दिला पाती है या भविष्य की अनिश्चितता यूं ही बरकरार रहेगी।

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