जिला लोकपाल के औचक निरीक्षण में मनरेगा कार्यस्थल पर छाया, पानी और प्राथमिक चिकित्सा किट का अभाव मिला, मस्टरोल में फर्जी उपस्थिति भी उजागर हुई।

महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) के तहत भीषण गर्मी और तपती धूप के बीच श्रमिकों की स्थिति अत्यंत दयनीय बनी हुई है। चित्तौड़गढ़ जिले के जिला लोकपाल अधिकारी अभिषेक सोनी द्वारा पंचायत समिति डूंगला की ग्राम पंचायत देलवास एवं किशन करेरी का औचक निरीक्षण किए जाने पर प्रशासन की गंभीर लापरवाही और अव्यवस्थाएं उजागर हुई हैं। राज्य सरकार द्वारा स्पष्ट निर्देश होने के बावजूद कार्यस्थलों पर श्रमिकों के लिए बुनियादी सुविधाओं का पूर्ण अभाव पाया गया, जिससे विभागीय दावों की पोल खुल गई है।

निरीक्षण के दौरान देलवास और किशन करेरी में मनरेगा श्रमिक चिलचिलाती धूप से बचने के लिए झाड़ियों की ओट में बैठने को मजबूर दिखे। कार्यस्थलों पर न तो छाया के लिए टेंट की व्यवस्था थी और न ही पेयजल के पर्याप्त प्रबंध मिले। अत्यंत खेदजनक स्थिति तब सामने आई जब कार्यस्थल पर एक श्रमिक मां अपने मासूम बच्चे के साथ इस भयंकर गर्मी में संघर्ष करती पाई गई। यदि कोई श्रमिक ऊष्माघात (हीट स्ट्रोक) के कारण बेहोश या बीमार हो जाए, तो उसके प्राथमिक उपचार हेतु मौके पर फर्स्ट एड बॉक्स तक उपलब्ध नहीं था, जबकि विकास अधिकारियों को इन सुविधाओं की उपलब्धता सुनिश्चित करने के कड़े निर्देश दिए गए हैं।

निरीक्षण में वित्तीय और प्रशासनिक अनियमितताएं भी सामने आई हैं। ग्राम पंचायत देलवास में कार्यस्थल पर मशीनी पंजों के निशान पाए गए, जो नियमानुसार प्रतिबंधित हैं। साथ ही, मस्टरोल में 20 श्रमिकों की ऑनलाइन उपस्थिति दर्शाई गई थी, परंतु मौके पर मात्र 13 श्रमिक ही उपस्थित मिले। इसके अतिरिक्त, जब लोकपाल द्वारा ग्राम पंचायत का नरेगा रिकॉर्ड खंगाला गया, तो वह भी अपूर्ण पाया गया। संबंधित अधिकारियों द्वारा समय पर निरीक्षण न किए जाने के कारण धरातल पर इस प्रकार की धांधली व्याप्त है।

मामले की गंभीरता को देखते हुए जिला लोकपाल अधिकारी अभिषेक सोनी ने संबंधित कार्मिकों और अधिकारियों को सख्त निर्देश जारी किए हैं। उन्होंने आदेश दिया है कि नरेगा कार्यस्थलों पर छाया, शीतल जल और फर्स्ट एड बॉक्स की उपलब्धता तत्काल सुनिश्चित की जाए। साथ ही, अपूर्ण नरेगा रिकॉर्ड को व्यवस्थित कर रिपोर्ट प्रस्तुत करने और भविष्य में नियमित निरीक्षण कर कमियों को दूर करने की हिदायत दी गई है। यह घटनाक्रम दर्शाता है कि अधिकारियों की अनदेखी किस प्रकार गरीब श्रमिकों के जीवन और सरकारी योजनाओं की पारदर्शिता पर भारी पड़ रही है।

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