चित्तौड़गढ़: अरावली को बचाने के लिए सड़कों पर उतरी कांग्रेस, मशालों की रोशनी में गूंजा 'इंकलाब'
चित्तौड़गढ़ में अरावली पर्वतमाला के संरक्षण हेतु शहर कांग्रेस और अल्पसंख्यक विभाग ने विशाल मशाल जुलूस निकालकर विरोध प्रदर्शन किया। 'अरावली बचाओ जीवन बचाओ' के नारों के साथ सैकड़ों कार्यकर्ताओं ने पद्मिनी पार्क से सुभाष चौक तक मार्च किया और पर्यावरण के विनाश पर गंभीर चेतावनी दी। इस प्रदर्शन में शहर के वरिष्ठ कांग्रेस नेताओं सहित बड़ी संख्या में गणमान्य नागरिक शामिल हुए।

चित्तौड़गढ़। प्रकृति के प्रहरी और राजस्थान की जीवनरेखा मानी जाने वाली अरावली पर्वतमाला के अस्तित्व पर मंडराते खतरों के खिलाफ अब जन-आक्रोश की ज्वाला भड़क उठी है। नव वर्ष की पूर्व संध्या पर जब पूरी दुनिया जश्न की तैयारियों में डूबी थी, तब चित्तौड़गढ़ की सड़कों पर पर्यावरण संरक्षण का संकल्प मशालों के रूप में चमक रहा था। शहर कांग्रेस हेरिटेज जोन मंडल और जिला कांग्रेस कमेटी अल्पसंख्यक विभाग के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित इस मशाल जुलूस ने प्रशासन और व्यवस्थाओं को अरावली के प्रति उनकी जिम्मेदारियों का अहसास कराया। सैकड़ों कार्यकर्ताओं के हुजूम ने यह स्पष्ट कर दिया कि यदि अरावली को नुकसान पहुँचाया गया, तो इसका खामियाजा आने वाली पीढ़ियों को भुगतना पड़ेगा।
मशाल जुलूस का आगाज शहर के ऐतिहासिक पद्मिनी पार्क से हुआ, जहाँ से हाथों में जलती मशालें लेकर निकले कार्यकर्ताओं का कारवां नेहरू बाजार की तंग गलियों से होता हुआ सुभाष चौक पहुँचा। पूरे मार्ग के दौरान फिजां में 'अरावली बचाओ-जीवन बचाओ' और 'साम्राज्यवाद का विरोध हो' जैसे नारों की गूँज सुनाई दी। कार्यकर्ताओं का यह विरोध प्रदर्शन केवल एक औपचारिक मार्च नहीं था, बल्कि अरावली के अवैध दोहन और लुप्त होते पर्वतों के प्रति एक गंभीर चेतावनी थी। सुभाष चंद्र बोस की प्रतिमा के नीचे जब यह जुलूस एक जनसभा में तब्दील हुआ, तो वहां 'इंकलाब जिंदाबाद' के नारों ने माहौल में एक क्रांतिकारी ऊर्जा भर दी।
प्रदर्शन के दौरान वरिष्ठ नेताओं और कार्यकर्ताओं ने चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि अरावली पर्वतमाला केवल पत्थर और मिट्टी का ढेर नहीं है, बल्कि यह क्षेत्र का फेफड़ा है। उन्होंने कड़े शब्दों में संदेश दिया कि यदि अरावली का विनाश इसी गति से जारी रहा, तो भविष्य में इंसानों को जीवित रहने के लिए कृत्रिम ऑक्सीजन और मास्क का सहारा लेना होगा। यह आंदोलन विकास के नाम पर पर्यावरण की बलि चढ़ाने वाली नीतियों के खिलाफ एक सशक्त प्रतिरोध के रूप में उभरा है।
इस महत्वपूर्ण मशाल जुलूस और विरोध प्रदर्शन में इम्तियाज हुसैन लौहार, अहसान पठान, कृष्ण कुमार डागा, पवन मेड़तवाल, रमेश बुनकर, शिव टेलर, रमेशचन्द्र लड्ढा, डॉ. गोपाल सालवी, खुसरो कमाल, उस्मान गनी, संजय राव, फारूख नीलगर, जमील लौहार, सलीम नेता, नासीर खान, गुलशेर, लियाकत अली, अय्युब पठान, मांगीलाल, असलम, शहजाद अब्बासी, गिरिराज गंधर्व, मनोज राव, जीतू लुहार, कैलाशसिंह, शकूर, दिलीप ढोली, रेहान, रजा शेख, जाकीर, असलम, हुसैन, हारून, इमरान छीपा, रिहान, हिमांशु सोलंकी, सोहेल, इरफान, शाहरूख, शकील, शाहीद खान, किशन भोई, मुराद, मोहम्मद शेरू, वासू लोठ, आलोक, करण नकवाल, पीयूष गहलोत, बब्बन, शाबीर, हाजिक, रिजवान, अरमान, अमन, आलम, जूनैद, उमर, शाहीद, नासीर, अहमद, हेदर अली, अयुब छीपा, सन्नी खोखर, राजा बुरठ, वासू लोठ, आलोक बेनीवाल, प्रदीप, भावेश, और दीपक प्रजापत सहित सैंकड़ों कार्यकर्ताओं एवं वरिष्ठजनों ने अपनी उपस्थिति दर्ज कराई।
मशाल जुलूस का यह समापन चित्तौड़गढ़ के जनमानस में एक नई चेतना जगा गया है। सुभाष चौक पर हुआ यह प्रदर्शन इस बात का प्रतीक है कि पर्यावरण की रक्षा अब राजनीतिक गलियारों से निकलकर आम आदमी की लड़ाई बन चुकी है, जिसका एकमात्र उद्देश्य आने वाली पीढ़ियों के लिए एक सुरक्षित और स्वच्छ भविष्य सुनिश्चित करना है।

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