चित्तौड़गढ़: बैंक कर्मियों के आक्रोश से थमी करोड़ों की रफ्तार, 5-दिवसीय कार्य सप्ताह की मांग पर आर-पार की जंग
चित्तौड़गढ़ में बैंक कर्मियों की महा-हड़ताल से 5000 करोड़ का लेनदेन ठप! यूनाइटेड फोरम ऑफ बैंक यूनियन के नेतृत्व में 5-दिवसीय कार्य सप्ताह की मांग को लेकर राहुल बक्षी और संजय शर्मा समेत सैकड़ों कर्मियों ने भरी हुंकार। जानिए कैसे 10 साल से लंबित मांगों पर सरकार की उदासीनता ने थामी बैंकिंग की रफ्तार और क्या है बैंक कर्मियों की अगली रणनीति।

चित्तौड़गढ़। देशभर के बैंकिंग सेक्टर में मंगलवार को उस वक्त सन्नाटा पसर गया जब हजारों बैंक कर्मियों ने अपनी दस साल पुरानी लंबित मांगों को लेकर हुंकार भरी। राजस्थान के चित्तौड़गढ़ और प्रतापगढ़ जिलों में हड़ताल का ऐसा व्यापक असर देखने को मिला कि देखते ही देखते करोड़ों रुपये का लेनदेन ठप हो गया। यूनाइटेड फोरम ऑफ बैंक यूनियन (UFBU) के नेतृत्व में आयोजित इस राष्ट्रव्यापी हड़ताल ने केंद्र सरकार की नीतियों के खिलाफ एक बड़े जनांदोलन का रूप ले लिया है। इस विरोध प्रदर्शन की गूंज चित्तौड़गढ़ की सड़कों पर साफ सुनाई दी, जहां बैंक कर्मियों ने यह स्पष्ट कर दिया कि अब समझौता नहीं, बल्कि सीधा समाधान चाहिए।
हड़ताल का मुख्य केंद्र मीरा नगरी स्थित भारतीय स्टेट बैंक का क्षेत्रीय कार्यालय रहा, जहां सुबह से ही बैंक अधिकारियों और कर्मचारियों का हुजूम जुटना शुरू हो गया था। प्रदर्शनकारियों का सबसे बड़ा मुद्दा केंद्र और राज्य सरकार के कर्मचारियों की तर्ज पर बैंकों में भी 'पांच दिवसीय कार्य सप्ताह' (5-Day Work Week) लागू करना है। बैंक कर्मियों का आरोप है कि वे साल 2015 से निरंतर शांतिपूर्ण तरीके से अपनी यह जायज मांग सरकार के सम्मुख रख रहे हैं, लेकिन प्रशासन की उदासीनता के चलते अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई है। आंदोलनकारियों ने आक्रोश व्यक्त करते हुए कहा कि पूर्व में कई बार ज्ञापन और सांकेतिक धरने दिए गए, यहां तक कि वर्ष 2025 की शुरुआत में भी हड़ताल का आह्वान किया गया था। उस समय चीफ लेवल कमिश्नर की बैठक के बाद फाइल वित्त मंत्रालय भेजी गई थी, जो बीते 9 महीनों से धूल फांक रही है।
विरोध की इस मशाल को थामते हुए भारतीय स्टेट बैंक ऑफिसर्स एसोसिएशन के जोनल सेक्रेटरी राहुल बक्षी, ऑल इंडिया बैंक ऑफ बड़ौदा ऑफिसर एसोसिएशन के अध्यक्ष संजय शर्मा, विक्रम सिंह पुरावत और अंकित माहेश्वरी सहित कई दिग्गज पदाधिकारियों ने उपस्थित जनसमूह को संबोधित किया। वक्ताओं ने दोटूक शब्दों में कहा कि अब सरकार की 'टाल-मटोल' वाली नीति नहीं चलेगी और बैंक कर्मियों का सब्र का बांध टूट चुका है। प्रदर्शन के दौरान हाथों में तख्तियां लिए बैंक कर्मियों ने कतारबद्ध होकर कलेक्ट्री चौराहे तक पैदल मार्च निकाला और वहां एक विशाल मानव श्रृंखला बनाकर अपनी एकता का प्रदर्शन किया। नारों की गूंज और एकजुटता ने शहर के प्रशासनिक गलियारों में हलचल पैदा कर दी।
इस एक दिवसीय हड़ताल का आर्थिक प्रभाव अत्यंत गहरा रहा। आधिकारिक आंकड़ों और विशेषज्ञों के अनुमान के अनुसार, राज्यभर में इस हड़ताल के चलते लगभग 5 हजार करोड़ रुपये का लेनदेन प्रभावित हुआ है। चेक क्लीयरेंस से लेकर नकदी प्रवाह तक सब कुछ बाधित रहने से आम जनता और व्यापारियों को भारी असुविधा का सामना करना पड़ा। यह विरोध प्रदर्शन केवल एक प्रशासनिक मांग नहीं, बल्कि बैंक कर्मियों के उस मानसिक और शारीरिक श्रम के सम्मान की लड़ाई बन गया है, जिसे सरकार पिछले एक दशक से नजरअंदाज कर रही है। अब सबकी नजरें केंद्र सरकार के अगले कदम पर टिकी हैं कि क्या वह इस वित्तीय गतिरोध को खत्म करने के लिए बैंक कर्मियों की मांगों पर मुहर लगाती है या यह आंदोलन और उग्र रूप धारण करेगा।

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