अखिल भारतीय साहित्य परिषद चित्तौड़गढ़ द्वारा आनंद मठ पर राजकीय पुस्तकालय किला रोड में आयोजित पुस्तक परिचर्चा ने ऐतिहासिक, साहित्यिक और राष्ट्रवादी विमर्श को एक मंच पर प्रस्तुत किया, जिसमें वक्ताओं ने इसे स्वतंत्रता संग्राम के क्रांतिकारियों के लिए गीता समान पवित्र कृति बताया।

कार्यक्रम के मुख्य अतिथि सेवानिवृत्त आयुर्वेद चिकित्सक योगेश व्यास रहे, जबकि अध्यक्षता प्रांत मीडिया प्रमुख राकेश कुमार चौधरी ने की। विशिष्ट अतिथियों में शिक्षाविद् एवं साहित्यकार शिव मृदुल, पूर्व प्राचार्य डाइट मुन्नालाल डाकोत एवं पुस्तकालय अध्यक्ष सुश्री सुधा कुमारी शामिल रहे। अतिथियों का परिचय प्रांत कोषाध्यक्ष पंकज कुमार झा ने करवाया।

परिचर्चा के दौरान एडवोकेट यशवंत पुरी गोस्वामी ने उपन्यास के कथानक का संक्षिप्त परिचय देते हुए कहा कि यह कृति क्रांतिकारियों के लिए प्रेरणास्रोत रही। पंकज कुमार झा ने अपने उद्बोधन में बताया कि बंकिम चंद्र चटोपाध्याय द्वारा रचित यह उपन्यास 1760 से 1800 के मध्य बंगाल में हुए सन्यासी विद्रोह की पृष्ठभूमि पर आधारित है। उन्होंने कहा कि ‘वंदे मातरम’ गीत, जो आज भारत का राष्ट्रीय गीत है, इसी कृति से लिया गया है और इसे पहली बार संगीतबद्ध करने का कार्य रवींद्रनाथ ठाकुर ने किया।

पंकज सरकार ने कहा कि यह पुस्तक क्रांतिकारियों के लिए गीता के समान पवित्र रही तथा अनुशीलन समिति जैसे संगठनों ने इसे आदर्श मानकर कार्य प्रारंभ किया। उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के आद्य सरसंघचालक डॉक्टर केशवराव बलिराम हेडगेवार ने इस कृति के अध्ययन के बाद ही संघ, प्रचारक और स्वयंसेवक की कल्पना की होगी, क्योंकि उपन्यास में वर्णित कठोर ब्रह्मचर्य और अनुशासन का स्वरूप संघ के प्रचारकों से मेल खाता है।

शिव मृदुल ने कहा कि बंकिम चंद्र चटोपाध्याय ने अंग्रेजी शासन में रहते हुए अत्यंत सूझबूझ से इस उपन्यास का कथानक गढ़ा, जिससे यह स्वतंत्रता संग्राम के लिए प्रेरणा स्रोत बना। उन्होंने इसे भारत माता की अवधारणा को साहित्य में स्थापित करने वाला पहला उपन्यास बताया, जिस कारण अंग्रेजों ने इस पर प्रतिबंध लगाया।

मुन्नालाल डाकोत ने कहा कि कई बार किसी ग्रंथ का एक अंश उससे अधिक प्रसिद्ध हो जाता है, जैसे महाभारत में गीता, उसी प्रकार आनंद मठ के ‘वंदे मातरम’ ने जन-जन में विशेष स्थान बनाया। मुख्य अतिथि डॉ. योगेश व्यास ने कहा कि जहां लाखों क्रांतिकारियों ने देश की आजादी के लिए बलिदान दिया, वहीं कुछ नेता आजादी की आड़ में अंग्रेजों के साथ रहे। उन्होंने बताया कि ‘वंदे मातरम’ गीत प्रारंभ में कांग्रेस के अधिवेशनों में गाया जाता था, परंतु आजादी के बाद इसे संक्षिप्त कर दो अंतरों तक सीमित कर दिया गया।

अध्यक्ष राकेश कुमार चौधरी ने युवाओं की उपस्थिति पर संतोष व्यक्त करते हुए कहा कि वर्तमान में युवा केवल प्रतियोगी परीक्षाओं और पाठ्यक्रम तक सीमित हो गया है, जबकि साहित्य से जुड़ाव आवश्यक है। उन्होंने ऐसे आयोजनों को युवाओं को साहित्य की ओर प्रेरित करने के लिए जरूरी बताया।

कार्यक्रम में कवि नंद किशोर निर्झर, अब्दुल जब्बार, शशि बाला एवं सुश्री सुधा कुमारी ने भी विचार व्यक्त किए। पुस्तकालय अध्यक्ष सुधा कुमारी ने सभी से पुस्तकालय के पाठक बनने का आग्रह किया। धन्यवाद ज्ञापन इकाई अध्यक्ष बृजेश कुमार राठौर ने किया तथा संचालन कोषाध्यक्ष श्रीमती कृष्णा सिन्हा ने किया। इस अवसर पर मनोज कुमार मंडेला, कांति चंद्र शर्मा, ललित नाथ झा, राधा किशन साहू, विनीता मेढ़तवाल, शिखा झा, वीणा झा, अमृतलाल चंगेरिया, सुनील बाटू, ऋषिकेश, देवेंद्र शर्मा, श्वेता जीनगर, पुष्पेंद्र जीनगर, नितेश गोयर, अंकित कुमार धोबी, कमला धाकड़ सहित कई कार्यकर्ता एवं पाठक उपस्थित रहे। कार्यक्रम का समापन ‘वंदे मातरम’ गीत के साथ हुआ, जिसने आयोजन को राष्ट्रभक्ति की भावनाओं से ओतप्रोत कर दिया।

Pratahkal Bureau

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