चित्तौड़गढ़: राष्ट्रीय हैंडबॉल प्रतियोगिता का भावुक समापन, कलेक्टर आलोक रंजन की अनूठी पहल ने खिलाड़ियों की विदाई को बनाया यादगार
चित्तौड़गढ़ में आयोजित राष्ट्रीय विद्यालयी हैंडबॉल प्रतियोगिता का समापन जिला कलेक्टर आलोक रंजन की भावुक पहल के साथ हुआ। 1250 से अधिक खिलाड़ियों और कोचों को चित्तौड़गढ़ दुर्ग की यादों के साथ विशेष फोटो फ्रेम भेंट किए गए। मेवाड़ के आतिथ्य और खेल भावना की इस अनूठी गाथा को पढ़ें, जहाँ हार-जीत से परे रिश्तों की एक नई इबारत लिखी गई।

चित्तौड़गढ़। मेवाड़ की पावन धरा पर शौर्य और खेल भावना के अद्भुत संगम के साथ राष्ट्रीय विद्यालयी हैंडबॉल प्रतियोगिता का समापन हो गया। खेल के मैदान पर कड़े मुकाबले और पसीने की बूंदों के बीच शुरू हुआ यह सफर, विदाई की बेला तक आते-आते एक भावनात्मक रिश्ते में तब्दील हो गया। चित्तौड़गढ़ जिला कलेक्टर आलोक रंजन की एक संवेदनशील और अभिनव पहल ने इस विदाई को केवल एक औपचारिक प्रक्रिया न रखकर, इसे देश के कोने-कोने से आए खिलाड़ियों के जीवन की सबसे मधुर स्मृतियों में शुमार कर दिया है। प्रतियोगिता के समापन पर जब खिलाड़ी अपने राज्यों की ओर लौटने लगे, तो उनके हाथों में जीत के मेडल के साथ-साथ चित्तौड़गढ़ के प्रेम और आतिथ्य का एक विशेष प्रतीक भी था।
कलेक्टर आलोक रंजन के विजन के अनुरूप, प्रतियोगिता में भाग लेने वाली सभी टीमों को एक विशेष फोटो फ्रेम भेंट किया गया। यह महज एक तस्वीर नहीं, बल्कि कला और भावना का वो दस्तावेज है जिसमें विश्व धरोहर चित्तौड़गढ़ दुर्ग के विहंगम दृश्य के साथ उस टीम के सभी खिलाड़ी, समर्पित कोच, निष्पक्ष निर्णायक और एसजीएफआई के ऑब्ज़र्वर लियाक़ खान की सामूहिक उपस्थिति को कैद किया गया है। उद्घाटन के समय कलेक्टर ने खिलाड़ियों से जो वादा किया था कि वे यहाँ से ‘सुनहरी यादें’ लेकर जाएंगे, यह फोटो फ्रेम उसी वादे की एक सजीव और गौरवशाली परिणति बनकर उभरा। मेवाड़ की सांस्कृतिक पहचान और टीम वर्क के इस अनूठे मेल ने खिलाड़ियों को भावुक कर दिया।
इस विशाल आयोजन के सफल क्रियान्वयन और स्मृति चिन्हों के वितरण की कमान जिला शिक्षा अधिकारी (प्रारंभिक) राजेंद्र शर्मा के कुशल निर्देशन में संभाली गई। इस वृहद कार्य को धरातल पर उतारने में एडीईओ सतीश दशोरा के साथ नियंत्रण कक्ष के समर्पित कार्मिकों की टीम ने दिन-रात एक कर दिया। इनमें अरुण सक्सेना, लक्ष्मण सिंह सोलंकी, संजय कोदली, त्रिलोक शुक्ला, कमलेश डांगड़ा, दीपक पुरोहित, सूरज प्रकाश कांटिया, मोहसिन खान, रवि खोईवाल और राहुल लोठ ने विभिन्न राज्यों की टीमों के साथ निरंतर समन्वय स्थापित कर यह सुनिश्चित किया कि लगभग 1250 से अधिक फोटो फ्रेम प्रत्येक छात्र और छात्रा वर्ग की कुल 65 टीमों तक गरिमापूर्ण तरीके से पहुँचें।
प्रतियोगिता के अंतिम क्षणों में राजस्थान की मेहमाननवाजी की गूँज देशभर से आए खिलाड़ियों के मुख से सुनाई दी। खिलाड़ियों और प्रशिक्षकों ने कहा कि चित्तौड़गढ़ का यह प्रेम उनके लिए एक स्थायी भावनात्मक संबंध बन गया है। जब टीमें स्टेशन और बस स्टैंड के लिए रवाना हुईं, तो उनके बैग में केवल खेल के अनुभव ही नहीं थे, बल्कि मेवाड़ की ऐतिहासिक विरासत और मानवीय संवेदनाओं की वो मधुर स्मृतियाँ भी थीं, जो ताउम्र उनके ड्राइंग रूम की दीवारों पर इस फोटो फ्रेम के रूप में सजी रहेंगी। यह आयोजन सिद्ध कर गया कि खेल केवल हार-जीत का नाम नहीं, बल्कि दिलों को जोड़ने का एक सशक्त माध्यम है।

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