चित्तौड़गढ़: मेवाड़ विश्वविद्यालय में इतिहास का जीवंत संगम, पूर्व राजपरिवार के वंशज ने किया भव्य 'मेवाड़ संग्रहालय' का लोकार्पण
चित्तौड़गढ़ के मेवाड़ विश्वविद्यालय में भव्य 'मेवाड़ संग्रहालय' का उद्घाटन महाराणा विश्वराज सिंह मेवाड़ द्वारा किया गया। डॉ. अशोक कुमार गदिया के 10 वर्षों के कठिन परिश्रम से निर्मित यह संग्रहालय मेवाड़ की ऐतिहासिक विरासत, शौर्यगाथाओं और लोक-संस्कृति को संजोने का एक जीवंत केंद्र बनेगा। इस गौरवशाली समारोह में दिग्गज इतिहासकारों और साहित्यकारों की उपस्थिति ने मेवाड़ के सांस्कृतिक वैभव को पुनर्जीवित कर दिया।

चित्तौड़गढ़। शौर्य, त्याग और बलिदान की पावन धरा चित्तौड़गढ़ के गंगरार स्थित मेवाड़ विश्वविद्यालय परिसर में एक नए स्वर्णिम अध्याय का सूत्रपात हुआ है। मेवाड़ की गौरवशाली ऐतिहासिक, सांस्कृतिक एवं पारंपरिक विरासत को भविष्य की पीढ़ियों के लिए सुरक्षित करने के ध्येय से नवनिर्मित 'मेवाड़ संग्रहालय' का भव्य उद्घाटन संपन्न हुआ। इस ऐतिहासिक गरिमा से परिपूर्ण संग्रहालय का लोकार्पण मेवाड़ के पूर्व राजघराने के वंशज महाराणा विश्वराज सिंह मेवाड़ के कर-कमलों द्वारा किया गया। यह संग्रहालय केवल एक भवन मात्र नहीं, बल्कि मेवाड़ के कुलाधिपति डॉ. अशोक कुमार गदिया के उस दस वर्षीय संकल्प और दीर्घकालीन स्वप्न की सिद्धि है, जिसे उन्होंने क्षेत्र की लोक-संस्कृति और कला को सहेजने के लिए संजोया था।
समारोह का शुभारंभ बांसी ठिकाना शैली की भव्यता के साथ हुआ, जहाँ अतिथियों का स्वागत पारंपरिक वैभव के साथ किया गया। एन.एस.एस. कैडेट्स ने बैंड की धुनों पर अतिथियों की अगवानी की, जबकि दरबार से आए पारंपरिक लवाज़म, छत्री, चंवर और नौबतखाना जैसे वाद्ययंत्रों की गूंज ने वातावरण को राजसी आभा से सराबोर कर दिया। पारंपरिक वेशभूषा में सजी बालिकाओं की शोभायात्रा और राजस्थानी घूमर नृत्य ने इस पल को यादगार बना दिया। उद्घाटन के दूसरे चरण में महाराणा विश्वराज सिंह ने नौबतखाना संगीत की गूँज और गुलाब की पंखुड़ियों की वर्षा के बीच उद्घाटन पट्टिका का अनावरण किया। इस अवसर पर संग्रहालय की विस्तृत मार्गदर्शिका यानी 'कैटलॉग' का विमोचन भी किया गया। प्रोफेसर डॉ. चित्रलेखा सिंह ने अतिथियों को संग्रहालय की विभिन्न दीर्घाओं का अवलोकन कराया, जहाँ मेवाड़ के इतिहास और संस्कृति से संबंधित दुर्लभ सामग्रियों को प्रदर्शित किया गया है।
महाराणा प्रताप सभागार में आयोजित मुख्य समारोह में दीप प्रज्ज्वलन और कुलगीत के पश्चात महाराणा विश्वराज सिंह का पारंपरिक अभिनंदन किया गया। कार्यक्रम के मुख्य वक्ता प्रख्यात साहित्यकार राव सुरेंद्र सिंह मृत्युंजय एवं मेवाड़ी कवि अमृत कुमावत ने अपने ओजस्वी उद्बोधन में मेवाड़ की सांस्कृतिक चेतना और बलिदान की गाथाओं पर प्रकाश डाला। इस मंच से वरिष्ठ इतिहासकार मंगल सिंह राव, तनवीर सिंह सारंगदेवोत एवं नरेंद्र सिंह पंवार को उनके उल्लेखनीय ऐतिहासिक योगदान के लिए सम्मानित किया गया। कुलाधिपति डॉ. अशोक कुमार गदिया ने अपने अध्यक्षीय संबोधन में विश्वविद्यालय की शैक्षणिक प्रगति और अनुसंधान के साथ-साथ अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़े रहने की प्रतिबद्धता दोहराई।
सांस्कृतिक प्रस्तुतियों के दौरान अंतरराष्ट्रीय छात्राओं द्वारा राजस्थानी नृत्य और काव्यपाठ ने दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया। महाराणा विश्वराज सिंह ने अपने संबोधन में इस संग्रहालय को भावी पीढ़ी के लिए इतिहास का एक जीवंत केंद्र और सांस्कृतिक संरक्षण का सशक्त माध्यम बताया। इस गरिमामयी उपस्थिति में मेवाड़ एजुकेशन सोसाइटी के अध्यक्ष गोविंद लाल गदिया, बोर्ड मेंबर्स राधाकृष्णन गदिया, कमला बाई गदिया, ओएसडी एच. विधानी, रजिस्ट्रार डॉ. चंडिकादित्य कुमावत, डीन एकेडमिक प्रो. डॉ. दीपक व्यास, हरीश गुरनानी, डॉ. दीप्ति शास्त्री और कार्यक्रम संयोजक डॉ. हेमेन्द्र सिंह सारंगदेवोत उपस्थित रहे। कुलपति प्रो. डॉ. आलोक मिश्रा ने सभी का आभार व्यक्त किया और कार्यक्रम का सफल संचालन डॉ. वंदना चुंडावत ने किया। यह संग्रहालय अब मेवाड़ की वीरता और गौरव को वैश्विक पटल पर एक नई पहचान देने के लिए तैयार है।

