मानवीय जिजीविषा और चिकित्सा जगत के समर्पण की एक अनुपम मिसाल चित्तौड़गढ़ जिला मुख्यालय स्थित महिला एवं बाल चिकित्सालय में देखने को मिली है, जहाँ संवेदनहीनता के दौर के बीच एक सुखद समाचार ने सबको अभिभूत कर दिया है। चिकित्सालय की 'स्पेशल न्यूबॉर्न केयर यूनिट' (SNCU) में चिकित्सकों और नर्सिंग स्टाफ ने मात्र 900 ग्राम वजन वाली एक नवजात बच्ची को मृत्यु के द्वार से सुरक्षित वापस लाकर उसे नवजीवन प्रदान किया है।

घटनाक्रम के अनुसार, डेलवास निवासी हेमलता ने गत 19 फरवरी को उदयपुर के एक निजी अस्पताल में समय से पूर्व (प्री-मैच्योर) एक पुत्री को जन्म दिया था। जन्म के समय नवजात का वजन मात्र 900 ग्राम था और वह कई गंभीर स्वास्थ्य जटिलताओं से जूझ रही थी। आर्थिक अभाव के कारण परिजन निजी अस्पताल का खर्च वहन करने में असमर्थ थे, जिसके परिणामस्वरूप बच्ची को अत्यंत नाजुक और चिंताजनक स्थिति में चित्तौड़गढ़ के जिला चिकित्सालय में स्थानांतरित कर भर्ती कराया गया। यहाँ शिशु रोग विशेषज्ञ डॉ. जयसिंह मीणा और उनकी टीम ने इस कठिन चुनौती को स्वीकार करते हुए तत्काल उपचार प्रारंभ किया।

बच्ची की स्थिति इतनी गंभीर थी कि परिजनों ने जीवन की आशा लगभग छोड़ दी थी, किंतु एसएनसीयू के समर्पित स्टाफ ने हार नहीं मानी। उपचार की प्रक्रिया के दौरान पहले मासूम को नली के माध्यम से आहार दिया गया, तत्पश्चात स्थिति में क्रमिक सुधार होने पर उसे 'पलाड़ी' और अंततः प्रत्यक्ष स्तनपान की स्थिति तक लाया गया। चिकित्सा विशेषज्ञों और नर्सिंग कर्मियों ने 55 दिनों तक दिन-रात एक कर इस मासूम की सांसों की डोर को टूटने से बचाए रखा।

इस संघर्षपूर्ण यात्रा में बच्ची की माँ हेमलता एक योद्धा की भांति डटी रहीं। जहाँ समाज में नवजातों को लावारिस छोड़ने जैसी विचलित करने वाली घटनाएं घटती हैं, वहीं हेमलता ने अस्पताल परिसर में ही रहकर अपनी ममता को बच्ची की ढाल बना लिया। चिकित्सकों के सटीक मार्गदर्शन और माँ के अटूट विश्वास का ही सुखद परिणाम रहा कि आज वह नन्हीं जान पूरी तरह स्वस्थ है।

55 दिनों के गहन उपचार और निरंतर निगरानी के बाद अब बच्ची का वजन 900 ग्राम से बढ़कर 1.650 किलोग्राम हो गया है। चिकित्सकों ने उसे पूर्णतः स्वस्थ घोषित कर अस्पताल से डिस्चार्ज कर दिया है। डॉ. जयसिंह मीणा ने इस सफलता पर प्रसन्नता व्यक्त करते हुए कहा कि यद्यपि एसएनसी यूनिट पूर्व में भी ऐसे कई बच्चों को जीवनदान दे चुकी है, परंतु हेमलता का अपनी संतान के प्रति समर्पण समाज के लिए एक महान प्रेरणा है। यह सफलता प्रमाणित करती है कि जब अटूट विश्वास और उचित चिकित्सा तकनीक का संगम होता है, तो नामुमकिन भी मुमकिन हो जाता है। यह विजय न केवल आधुनिक चिकित्सा विज्ञान की है, अपितु एक माँ के धैर्य और अदम्य साहस की भी है।

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