बस्सी: जैविक खेती की ओर बढ़े किसानों के कदम, खेतों में डाली जा रही गोबर खाद
रासायनिक खादों के दुष्प्रभाव को देखते हुए बस्सी क्षेत्र के किसान आगामी फसल सीजन के लिए पारंपरिक खाद और प्राकृतिक खेती को प्राथमिकता दे रहे हैं।

बस्सी के ग्रामीण इलाकों में आगामी फसल सीजन की तैयारी के लिए खेतों में ट्रैक्टर-ट्रॉली द्वारा देशी गोबर की खाद पहुँचाते किसान।
बस्सी। (प्रात:काल संवाददाता)। कस्बे सहित आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों में कृषि परिदृश्य में एक बड़ा बदलाव देखा जा रहा है, जहाँ किसान अब पारंपरिक और जैविक खेती की ओर तेजी से कदम बढ़ा रहे हैं। आगामी फसल सीजन की पूर्व तैयारियों के मद्देनजर ग्रामीण इलाकों में कृषि गतिविधियां चरम पर हैं और किसान अपने खेतों में देशी गोबर की खाद डालने के कार्य में युद्धस्तर पर जुटे हुए हैं। गांवों की गलियों से लेकर खेतों तक ट्रैक्टर-ट्रॉलियों के माध्यम से गोबर की खाद पहुंचाई जा रही है, जो ग्रामीण अर्थव्यवस्था और कृषि के प्रति किसानों के बदलते नजरिए को स्पष्ट रूप से रेखांकित करता है।
उल्लेखनीय है कि देशी गोबर की खाद न केवल भूमि की उर्वरक क्षमता में वृद्धि करती है, बल्कि मिट्टी को प्राकृतिक रूप से उपजाऊ बनाने में भी किसानों के लिए एक महत्वपूर्ण संबल साबित हो रही है। लंबे समय से रासायनिक खादों के अंधाधुंध और अत्यधिक उपयोग के कारण भूमि की गुणवत्ता पर पड़ रहे प्रतिकूल प्रभावों को देखते हुए अब किसान सचेत हुए हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, गोबर की खाद मिट्टी की नमी को सोखने और उसे लंबे समय तक बनाए रखने के साथ-साथ फसलों को सभी आवश्यक पोषक तत्व सुलभ कराने में अत्यधिक सहायक सिद्ध होती है। क्षेत्र के अनेक किसान पशुपालन के साथ-साथ स्वयं जैविक खाद तैयार कर अपने खेतों में उसका निवेश कर रहे हैं, जिससे खेती की प्रत्यक्ष लागत में भारी कमी आई है और उत्पादन की गुणवत्ता में भी उल्लेखनीय सुधार दर्ज किया जा रहा है। जैविक खाद के प्रयोग से मिट्टी की भौतिक संरचना सुदृढ़ हो रही है और फसलों की पैदावार में भी निरंतर बढ़ोत्तरी देखी गई है।
कृषि जानकारों का तर्क है कि गोबर की खाद मिट्टी को अत्यंत मुलायम बनाकर उसमें लाभदायक सूक्ष्म जीवों की संख्या को बढ़ा देती है, जिससे भूमि की उर्वरता दीर्घकाल तक सुरक्षित रहती है और साथ ही पर्यावरण संरक्षण के उद्देश्यों की भी पूर्ति होती है। क्षेत्र के वरिष्ठ प्रगतिशील किसानों ने युवा पीढ़ी से अधिक से अधिक जैविक एवं देशी खादों को अपनाने का आह्वान किया है। उनका मानना है कि प्राकृतिक खेती का मार्ग अपनाकर ही न केवल मानव स्वास्थ्य की रक्षा की जा सकती है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए इस अनमोल भूमि की उर्वरक शक्ति को भी अक्षुण्ण रखा जा सकता है।

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