बड़ी सादड़ी में जहर मुक्त संघर्ष समिति का धरना 42वें दिन जारी, रेलवे भराव व खनन जांच की मांग तेज
बड़ी सादड़ी में जहर मुक्त संघर्ष समिति का धरना 42वें दिन जारी है। रेलवे भराव सामग्री, अपशिष्ट मलबे, खनन, रॉयल्टी और ड्रोन सर्वे की मांग ने मामले को और गंभीर बना दिया है।

तस्वीर में बड़ी सादड़ी में धरना-प्रदर्शन के दौरान टेंट के नीचे बेंच पर एक कतार में बैठे संघर्ष समिति के सदस्य और स्थानीय ग्रामीण।
बड़ी सादड़ी में हिंदुस्तान जिंक के अपशिष्ट मलबे को लेकर जहर मुक्त बड़ी सादड़ी संघर्ष समिति का धरना-प्रदर्शन सोमवार को लगातार 42वें दिन भी जारी रहा। सोमवार को समिति के सदस्य वार्ड नंबर 23 (आतर) स्थित उस स्थान पर पहुंचे, जहां हिंदुस्तान जिंक के अपशिष्ट मलबे को रेलवे भूमि पर डाले जाने का आरोप लगाया गया है। मौके पर अंबिका कंस्ट्रक्शन की पोकलेन मशीन पहुंची, जिससे मलबा हटाने की प्रक्रिया शुरू होने की उम्मीद जगी।
संघर्ष समिति के संयोजक प्रभु प्रजापति ने आरोप लगाया कि जिंक द्वारा अपशिष्ट का निस्तारण आवश्यक सुरक्षा मानकों का पालन किए बिना किया गया। उन्होंने कहा कि यदि बारिश का पानी इस अपशिष्ट के संपर्क में आता है तो उसके संभावित प्रभावों को लेकर स्थानीय लोगों में गंभीर चिंता बनी हुई है।
समिति ने बताया कि बड़ी सादड़ी क्षेत्र में अभी भी कई गांव और स्थान ऐसे हैं, जहां यह अपशिष्ट मलबा पड़ा हुआ है। लगातार हो रही बारिश के कारण ग्रामीणों को आशंका है कि यदि गाय, भैंस और बकरियां जैसे पशु ऐसे पानी का सेवन करते हैं तो उनके स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। इस दौरान गोविंद दवे, देवकीनंदन, श्याम मेहता, मांगीलाल मेघवाल, विनोद रांका, भंवर रेगर, नाना मेहता, मदन सोनावा सहित अन्य ग्रामीण उपस्थित रहे। संघर्ष समिति ने प्रशासन से मांग की कि बरसात के मौसम को देखते हुए सभी प्रभावित स्थानों से अपशिष्ट को प्राथमिकता के आधार पर हटाया जाए। समिति ने स्पष्ट किया कि जब तक यह मांग पूरी नहीं होती, तब तक उनका जनआंदोलन जारी रहेगा।
वहीं दूसरी ओर बड़ी सादड़ी–नीमच रेलवे लाइन निर्माण एवं जिंक की भराव सामग्री के पूरे मामले की निष्पक्ष जांच की मांग भी जनता द्वारा लगातार उठाई जा रही है। ग्रामीणों का कहना है कि बड़ी सादड़ी में पिछले लगभग 40 दिनों से जिंक द्वारा रेलवे परियोजना में उपयोग की गई भराव सामग्री को लेकर धरना-प्रदर्शन चल रहा है। उनका कहना है कि पूरे मामले में केवल भराव सामग्री ही नहीं, बल्कि उससे जुड़े अन्य महत्वपूर्ण पहलुओं की भी निष्पक्ष जांच आवश्यक है।
ग्रामीणों के अनुसार सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि बड़ी सादड़ी–नीमच रेलवे लाइन के निर्माण में जिस भराव सामग्री का उपयोग किया गया, उसके लिए बड़ी सादड़ी क्षेत्र की पहाड़ियों को काटकर बड़े पैमाने पर खनन किया गया। उनका कहना है कि यह स्पष्ट किया जाना चाहिए कि क्या खान विभाग ने इन पहाड़ियों को काटने की विधिवत अनुमति प्रदान की थी। यदि अनुमति दी गई थी तो क्या संबंधित रॉयल्टी जमा कराई गई, और यदि अनुमति नहीं थी तो लगभग दो वर्षों तक यह कथित अवैध खनन किसके संरक्षण में चलता रहा।
ग्रामीणों ने कहा कि राज्य सरकार ने अवैध खनन रोकने के लिए खान विभाग के साथ-साथ पुलिस विभाग, पटवारी, तहसीलदार एवं एसडीएम को भी अधिकार प्रदान किए हैं। ऐसे में दो वर्षों तक लगातार पहाड़ियां काटी जाती रहीं और किसी विभाग द्वारा कार्रवाई क्यों नहीं की गई, इसकी जिम्मेदारी भी तय की जानी चाहिए।
रेलवे के सिविल निर्माण विभाग की भूमिका पर भी सवाल उठाते हुए ग्रामीणों ने कहा कि ठेकेदार के बिलों का भुगतान करते समय रॉयल्टी रसीदों का सत्यापन किया गया था या नहीं। यदि सत्यापन नहीं किया गया तो संबंधित अधिकारियों के विरुद्ध अब तक क्या कार्रवाई की गई, यह भी स्पष्ट किया जाना चाहिए।
ग्रामीणों का कहना है कि वर्तमान में प्रशासन धरना-प्रदर्शन के दबाव में हिंदुस्तान जिंक की सामग्री हटवा रहा है, जबकि वर्ष 2018 में केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (Central Pollution Control Board) द्वारा जारी अधिसूचना के अनुसार निर्धारित शर्तों के अधीन इस प्रकार की सामग्री का उपयोग रेलवे एवं सड़क निर्माण में भराव के रूप में करने की अनुमति दी गई थी। उनका कहना है कि यदि उसके बाद कोई नई गाइडलाइन जारी नहीं हुई है तो प्रशासन को इस पहलू पर भी स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए।
ग्रामीणों ने आरोप लगाया कि पिछले दो वर्षों में हुए संभावित अवैध खनन और रॉयल्टी चोरी के मुद्दे से ध्यान हटाने के लिए पूरा विवाद केवल भराव सामग्री तक सीमित कर दिया गया है। उनका कहना है कि यदि लगभग 18 करोड़ रुपये की रॉयल्टी चोरी हुई है तो नियमानुसार 10 गुना तक पेनल्टी का भी प्रावधान है, जिससे यह मामला गंभीर वित्तीय अनियमितता का विषय बन जाता है।
ग्रामीणों ने मांग की कि बड़ी सादड़ी से नीमच रेलवे ट्रैक तक उपयोग किए गए पूरे भराव का ड्रोन सर्वे कराया जाए। उनका कहना है कि केवल कुछ चुनिंदा स्थानों पर मैनुअल माप लेकर वास्तविक मात्रा का आकलन संभव नहीं है। ड्रोन सर्वे के माध्यम से यह स्पष्ट किया जा सकेगा कि बड़ी सादड़ी क्षेत्र से कुल कितना खनिज निकाला गया, उसमें से कितना रेलवे परियोजना में उपयोग हुआ तथा उसके आधार पर कितनी रॉयल्टी और संभावित पेनल्टी बनती है।
ग्रामीणों ने मांग की कि पूरे मामले की निष्पक्ष, तकनीकी एवं बहु-विभागीय जांच कराई जाए, जिसमें खान विभाग, रेलवे, प्रशासन तथा संबंधित अधिकारियों की भूमिका की भी जवाबदेही तय की जाए।

Pratahkal Bureau
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