चित्तौड़गढ़ में महाराणा प्रताप जयंती के उपलक्ष्य में आयोजित बालाजी प्रशिक्षण संस्थान के चतुर्थ दंगल का भव्य आगाज हुआ। अखाड़े की मिट्टी की महक और पहलवानों के दांव-पेच के बीच कैसे जीवंत हुई परंपरा, पढ़ें शौर्य की इस गौरवशाली गाथा का विस्तृत वृत्तांत।

महाराणा प्रताप जयंती के पावन अवसर पर चित्तौड़गढ़ में वीरता और परंपरा की गौरवशाली गाथा एक बार पुनः जीवंत हो उठी, जब बालाजी प्रशिक्षण संस्थान द्वारा आयोजित चतुर्थ दंगल का विधिवत उद्घाटन किया गया। शौर्य की इस माटी में आयोजित इस खेल महाकुंभ का शुभारंभ मुख्य अतिथि राजु अग्रवाल के गरिमामयी सान्निध्य में हुआ, जबकि कार्यक्रम की अध्यक्षता विश्व हिंदू परिषद के जिलाध्यक्ष किशन पिछोलिया ने की। यह आयोजन न केवल कुश्ती कला के प्रदर्शन का मंच बना, बल्कि महाराणा प्रताप के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का एक माध्यम भी सिद्ध हुआ।

कार्यक्रम का प्रारंभ अत्यंत सात्विक और पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ हुआ। कुश्ती प्रशिक्षक कमलेश गुर्जर ने बताया कि आयोजन की शुरुआत सर्वप्रथम भगवान हनुमान के समक्ष दीप प्रज्ज्वलन के साथ हुई। इसके उपरांत, महान योद्धा महाराणा प्रताप के चित्र पर माल्यार्पण कर उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की गई। अखाड़े की विधि-विधान से पूजा-अर्चना के बाद उपस्थित उस्तादों और खिलाड़ियों ने सामूहिक जयघोष किया, जिसने संपूर्ण वातावरण में एक नई ऊर्जा और उत्साह का संचार कर दिया। जयघोष के साथ ही अखाड़े में दांव-पेच और कुश्ती के मुकाबलों का औपचारिक शुभारंभ हुआ।

इस ऐतिहासिक अवसर पर खेल के प्रति खेल प्रेमियों और स्थानीय हस्तियों का उत्साह देखते ही बनता था। कार्यक्रम में विशिष्ट अतिथि के रूप में किशन गुर्जर, सुनिल उपाध्याय, सेवक देव टहलानी, भंवरसिंह राणावत, सुनिल जागेटिया, मनोहर वैष्णव, घनश्याम लोठ, उदयलाल कीर, जगदीश साहु, रमेश बुनकर, विष्णु शर्मा, कैलाश आगाल, मन्नालाल भील, हेमंत हटवाल, राधेश्याम आमेरिया, हनुमान शर्मा, मदन शर्मा, दशरथ सनाढ्य, कालुराम खटीक, मथरालाल गुर्जर, लादूलाल गुर्जर, गंगासिंह, भेरूलाल गुर्जर, विजय माली, योगेन्द्रपाल सिंह राठौड़, कुलदीप शर्मा, राजकुमार गांछा और मनोहर लौहार सहित अनेक गणमान्य नागरिक उपस्थित रहे।

चतुर्थ दंगल का यह आयोजन न केवल पारंपरिक भारतीय कुश्ती को संरक्षण प्रदान कर रहा है, बल्कि नई पीढ़ी को अपने गौरवशाली इतिहास और महाराणा प्रताप के संघर्षपूर्ण जीवन से प्रेरणा लेने के लिए भी प्रोत्साहित कर रहा है। चित्तौड़गढ़ की धरती पर गूँजते पहलवानों के दांव और दर्शकों का जोश इस बात का प्रमाण है कि लोक परंपराओं के प्रति युवाओं का समर्पण आज भी अक्षुण्ण है। यह दंगल आने वाले दिनों में स्थानीय खिलाड़ियों के कौशल को निखारने और पारंपरिक खेलों की प्रतिष्ठा को पुनर्स्थापित करने में अपनी महती भूमिका निभाएगा।

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