जोईड़ा बावजी के प्राचीन देवस्थान पर अतिक्रमण का आरोप, ग्रामीणों ने उपखंड अधिकारी को सौंपा हस्ताक्षरयुक्त ज्ञापन
डूंगला में जोईड़ा बावजी के 400–500 वर्ष पुराने प्राचीन देवस्थान से अतिक्रमण हटाने की मांग को लेकर ग्रामीणों ने उपखंड अधिकारी को हस्ताक्षरयुक्त ज्ञापन सौंपा। ग्रामीणों ने स्व. वरदीचन्द मेहता के प्लाट से जुड़े कथित अतिक्रमण को आस्था पर आघात बताते हुए शीघ्र कार्रवाई की मांग की।

डूंगला। क्षेत्र की आस्था से जुड़े जोईड़ा बावजी के प्राचीन देवस्थान को लेकर गुरुवार को डूंगला उपखंड मुख्यालय पर ग्रामीणों का आक्रोश सामने आया। कई दर्जन ग्रामीणों ने अपने हस्ताक्षरों से युक्त एक ज्ञापन उपखंड अधिकारी डूंगला को सौंपते हुए जोईड़ा बावजी के स्थान से कथित अतिक्रमण को शीघ्र हटाने की मांग की। ग्रामीणों का कहना है कि यह स्थान न केवल ऐतिहासिक है, बल्कि सैकड़ों वर्षों से जन-जन की श्रद्धा का केंद्र बना हुआ है।
ग्रामीणों ने ज्ञापन में बताया कि जोईड़ा बावजी का यह प्राचीन स्थान पिपलेश्वर महादेव मंदिर के सामने, प्रेम नगर से पुरानी तहसील की ओर जाने वाले मार्ग पर नाले के पास स्थित है। पूर्वजों और बुजुर्गों के कथनों के अनुसार यह देवस्थान लगभग 400 से 500 वर्ष पुराना है, जहां प्रतिदिन ग्रामीण अपनी आस्था के अनुसार पूजा-अर्चना करते चले आ रहे हैं। यह स्थल वर्षों से धार्मिक आस्था और सामाजिक परंपरा का प्रतीक बना हुआ है।
ज्ञापन में उल्लेख किया गया कि देवस्थान के उत्तर दिशा में स्वर्गीय वरदीचन्द मेहता, पूर्व सरपंच का प्लाट स्थित है। आरोप है कि इसी प्लाट की ओर से जोईड़ा बावजी के देवस्थान के समीप पक्की नींव की चुनाई कर दी गई है। ग्रामीणों के अनुसार, कई बार स्व. वरदीचन्द मेहता के वारिसानों से दीवार हटाने का आग्रह किया गया, लेकिन वारिस विरेंद्र उर्फ लाला मेहता द्वारा कथित रूप से ग्रामीणों से यह कहा जा रहा है कि जोईड़ा देव उनके प्लाट की सीमा में आ रहा है और उसे हटा लिया जाए।
इस कथन को लेकर ग्रामीणों में गहरा रोष व्याप्त है। उनका कहना है कि जन-जन की आस्था के केंद्र बने जोईड़ा बावजी को हटाने की बात न केवल धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने वाली है, बल्कि गांव की सांस्कृतिक विरासत पर भी आघात है। ज्ञापन में प्रशासन से मांग की गई कि उक्त अतिक्रमण को शीघ्र प्रभाव से हटाया जाए, ताकि जोईड़ा बावजी के स्थान पर आवश्यक विकास कार्य कराए जा सकें और धार्मिक स्थल की गरिमा बनी रहे।
ग्रामीणों ने प्रशासन से निष्पक्ष जांच और त्वरित कार्रवाई की अपेक्षा जताई है। अब सभी की निगाहें उपखंड प्रशासन के निर्णय पर टिकी हैं, जो यह तय करेगा कि सैकड़ों वर्षों पुरानी आस्था से जुड़े इस देवस्थान की रक्षा किस प्रकार की जाती है।
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