जयनगर (बेगूं)। चित्तौड़गढ़ जिले के बेगूं खंड स्थित जयनगर मंडल आज भगवामय नजर आया, जहाँ शहीद रूपा जी धाकड़ की पावन पुण्य भूमि पर उनके आशीर्वाद के साथ एक ऐतिहासिक 'विराट हिंदू सम्मेलन' का भव्य आगाज हुआ। इस आयोजन ने न केवल धार्मिक एकजुटता का प्रदर्शन किया, बल्कि समाज को कुरीतियों से मुक्त करने और अपनी जड़ों की ओर लौटने का एक सशक्त संदेश भी दिया। कार्यक्रम का प्रारंभ एक अद्भुत दृश्य के साथ हुआ, जब गुणता गांव से जयनगर तक विशाल कलश यात्रा निकाली गई। इस यात्रा में जयनगर, सोनगर, गुणता, बनोडा, किशोरपुरा, खेरमालिया, पीपली खेड़ा और गंगापुर से आईं सैकड़ों मातृशक्तियों ने 251 मंगल कलश धारण कर सहभागिता की। डीजे की भक्तिमय धुनों पर थिरकते बालक-बालिकाओं और भजन-कीर्तन करती प्रभात फेरियों ने पूरे वातावरण को भक्ति के रस में सराबोर कर दिया।

सम्मेलन की औपचारिक शुरुआत में आयोजन समिति के अध्यक्ष भूरालाल ने पधारे हुए सभी संत-महात्माओं और अतिथियों का आत्मीय स्वागत एवं अभिनंदन किया। मंच की शोभा बढ़ा रहे मुख्य अतिथि विजेंद्र सिंह (मंदसौर-रतलाम विभाग प्रमुख एवं वर्तमान जनजाति प्रमुख) ने अपने ओजस्वी संबोधन में भारत के गौरवशाली अतीत को याद किया। उन्होंने कहा कि भारत कभी विश्व गुरु था और आज फिर उसी पथ पर अग्रसर है। उन्होंने स्पष्ट किया कि पूरे विश्व में केवल सनातन ही एकमात्र 'धर्म' है, शेष सभी पंथ और मजहब हैं। सम्राट पृथ्वीराज चौहान का उदाहरण देते हुए उन्होंने हिंदू धर्म की क्षमाशीलता और वर्तमान में अपनी शक्ति पहचानने की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने कहा कि 500 वर्षों के लंबे संघर्ष के बाद भगवान राम के भव्य मंदिर का निर्माण हमारी जागृत शक्ति का ही परिणाम है।

विशिष्ट वक्ता लक्ष्मी नारायण जोशी (संरक्षक, भारतीय इतिहास संकलन समिति, चित्तौड़ प्रांत) ने महाभारत के प्रसंगों के माध्यम से हिंदू समाज की वर्तमान कमियों पर प्रहार किया। उन्होंने कृष्ण-अर्जुन संवाद और भीष्म पितामह की प्रतिज्ञाओं का उल्लेख करते हुए सत्य और असत्य के भेद को समझाया। उन्होंने 'जात-पात की करो विदाई, हम सब हैं भाई-भाई' का नारा देते हुए पूरे भारत को संगठित कर पुनः विश्व गुरु बनाने का आह्वान किया। वहीं, मातृशक्ति के रूप में उपस्थित मंजू लता (जिला उपाध्यक्ष, वि.हि.प. चित्तौड़गढ़) ने आधुनिक युग में सोशल मीडिया और मोबाइल के बढ़ते प्रभाव पर चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि परिवार समाज की सबसे छोटी और सबसे महत्वपूर्ण इकाई है; यदि हम अपने बच्चों को ग्रंथों का ज्ञान देंगे और उनसे संवाद करेंगे, तभी भारतीय संस्कृति और 'वसुधैव कुटुंबकम' की भावना जीवित रहेगी।

आध्यात्मिक ऊर्जा का संचार करते हुए मेंढकी महादेव आश्रम के संत नंदकिशोर दास महाराज ने कड़े शब्दों में हिंदुओं को अपनी पहचान और इतिहास बचाने की नसीहत दी। उन्होंने औरंगजेब के क्रूर इतिहास का स्मरण कराते हुए कहा कि यदि हम धर्म की रक्षा करेंगे, तभी धर्म हमारी रक्षा करेगा। उन्होंने बच्चों में सुंदर संस्कार विकसित करने, तिलक और चोटी जैसे धार्मिक प्रतीकों को धारण करने तथा साम-दाम-दंड-भेद की नीति को समझने पर जोर दिया। कार्यक्रम के अंत में अध्यक्ष भूरालाल ने सभी का आभार व्यक्त किया। उल्लेखनीय है कि इस आयोजन में पर्यावरण संरक्षण का अनूठा उदाहरण पेश करते हुए प्लास्टिक मुक्त महाप्रसाद का वितरण किया गया, जिसमें करीब 1800 श्रद्धालुओं ने शुचिता के साथ भोजन ग्रहण किया। कार्यक्रम का समापन 'भारत माता की जय' और 'जय सियाराम' के गगनभेदी उद्घोष के साथ हुआ, जिसने पूरे क्षेत्र में नव-चेतना का संचार कर दिया।

Pratahkal Newsroom

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