प्राथमिक शिक्षा में मानसिक स्वास्थ्य को नया आयाम: “खुशीशाला खुद की खोज” कार्यक्रम का शुभारंभ
चित्तौड़गढ़ में राजस्थान शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद ने प्राथमिक शिक्षा में मानसिक स्वास्थ्य और वेलबीइंग को बढ़ावा देने के लिए “खुशीशाला खुद की खोज” कार्यक्रम शुरू किया। यह पहल बच्चों में स्व-जागरूकता, करुणा और जीवन मूल्यों के विकास पर केंद्रित है।

चित्तौड़गढ़। राजस्थान में प्राथमिक शिक्षा के क्षेत्र में बच्चों के मानसिक और भावनात्मक विकास को बढ़ावा देने के लिए एक नई पहल शुरू की गई है। राजस्थान राज्य शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद (Rajasthan SCERT) ने “खुशीशाला खुद की खोज” कार्यक्रम का उद्घाटन कर इसे औपचारिक रूप दिया। यह कार्यक्रम कक्षा 1 से 5 तक के विद्यार्थियों में मानसिक, भावनात्मक और नैतिक मूल्यों के संतुलित विकास के उद्देश्य से डिज़ाइन किया गया है।
जिला शिक्षा एवं प्रशिक्षण संस्थान में आयोजित तीन दिवसीय प्रशिक्षण कार्यशाला का उद्घाटन डाइट प्रधानाचार्य राकेश कुमार पारीक और प्रशिक्षण प्रभारी राकेश सुखवाल ने किया। इस अवसर पर प्रशिक्षकों और शिक्षकों को मार्गदर्शन देते हुए बताया गया कि कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य बच्चों के लिए ऐसा सुरक्षित और सहयोगी वातावरण तैयार करना है, जिसमें वे अपने मन की गहराईयों को समझते हुए सीखने का आनंद ले सकें।
“खुशीशाला खुद की खोज” के लिए तैयार शिक्षक संदर्शिकाएँ तीन वर्षों की गहन अकादमिक शोध प्रक्रिया का परिणाम हैं। इस पहल में विशेषज्ञ श्वेता फगेड़िया, पीयूष कुमार जैन और आभा शर्मा का मार्गदर्शन अहम रहा। विशेषज्ञों के अनुसार, वर्तमान समय में बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य पर करियर और प्रतिस्पर्धा के बढ़ते दबाव का गहरा असर पड़ रहा है, जो किशोरावस्था में अवसाद, आत्महत्या और अन्य गंभीर मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं के रूप में सामने आ रहा है।
कार्यक्रम के अंतर्गत शिक्षक बच्चों में स्व-जागरूकता, आत्म-नियमन, करुणा और जीवन मूल्यों के विकास पर ध्यान केंद्रित करेंगे। इस पहल के माध्यम से उम्मीद की जा रही है कि बच्चे अधिक संतुलित, संवेदनशील और आत्मविश्वासी बनेंगे, जो भविष्य में देश के विकास में जिम्मेदारीपूर्वक योगदान दे सकेंगे। राजस्थान इस क्षेत्र में राष्ट्रीय स्तर पर अग्रणी बनकर उभर रहा है और “खुशीशाला” पहल इसी दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।
यह कार्यक्रम न केवल बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य को सुदृढ़ करेगा, बल्कि स्कूलों को बच्चों के लिए एक भरोसेमंद और सकारात्मक वातावरण के रूप में स्थापित करेगा। विशेषज्ञों का मानना है कि शुरुआती शिक्षा में ऐसी पहल बच्चों की जीवन यात्रा में स्थायी सकारात्मक प्रभाव डाल सकती है।
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Pratahkal Bureau
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