चित्तौड़गढ़ में उमड़ा आस्था का महाकुंभ: उत्तम स्वामी महाराज ने सुनाई काल की महिमा, रुक्मिणी विवाह के उल्लास में झूमे श्रद्धालु
चित्तौड़गढ़ के रतन बाग में महामंडलेश्वर उत्तम स्वामी महाराज की श्रीमद्भागवत कथा के छठे दिन रुक्मिणी विवाह का भव्य आयोजन हुआ। महाराज श्री ने काल की महिमा और समय के महत्व पर मार्मिक व्याख्यान दिया। इस धार्मिक उत्सव में क्षेत्र के गणमान्य नागरिकों सहित हजारों श्रद्धालुओं ने भाग लेकर पुण्य लाभ कमाया।

चित्तौड़गढ़। भक्ति, शक्ति और अध्यात्म की त्रिवेणी संगम कहे जाने वाले चित्तौड़गढ़ की धरा इन दिनों कृष्ण प्रेम के रंग में सराबोर है। स्थानीय रतन बाग में सनातन गौरव समिति के तत्वावधान में आयोजित सात दिवसीय श्रीमद्भागवत कथा के छठे दिन आस्था का ऐसा सैलाब उमड़ा कि पूरा पांडाल 'जय श्री कृष्णा' के उद्घोष से गुंजायमान हो उठा। महामंडलेश्वर ब्रह्मचारी उत्तम स्वामी महाराज के मुखारबिंद से प्रवाहित हो रही ज्ञान गंगा ने श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया। इस विशेष अवसर पर आयोजित रुक्मिणी विवाह प्रसंग ने उत्सव को दीपावली और होली जैसे पावन पर्वों के उल्लास में बदल दिया, जहां हर श्रद्धालु भाव-विभोर होकर झूमने लगा।
कथा के षष्ठम दिवस की शुरुआत महामंडलेश्वर उत्तम स्वामी महाराज द्वारा हनुमान चालीसा के सस्वर पाठ के साथ हुई, जिससे वातावरण में एक असीम ऊर्जा का संचार हुआ। अपने प्रवचन के दौरान महाराज श्री ने 'काल' यानी समय की अत्यंत सूक्ष्म और गंभीर व्याख्या की। उन्होंने श्रद्धालुओं को सचेत करते हुए कहा कि समय की गति अबाध है और यह किसी के लिए नहीं रुकता। मनुष्य को अपने जीवन के प्रत्येक क्षण का सम्मान करना चाहिए क्योंकि काल की कृपा ही व्यक्ति को श्री कृष्ण के चरणों में स्थान दिलाती है, जबकि उसकी अवकृपा यमराज के द्वार तक ले जाती है। उन्होंने काल की विशालता का वर्णन करते हुए बताया कि समय ने सतयुग के 17 लाख 28 हजार वर्ष, त्रेता के 12 लाख 96 हजार वर्ष, द्वापर के 8 लाख 64 हजार वर्ष और कलियुग के अब तक के 5 हजार से अधिक वर्षों को अपने भीतर समाहित कर लिया है।
धार्मिक आयोजन की गरिमा को बढ़ाते हुए इस अवसर पर समाज और संगठन के विभिन्न गणमान्य जन उपस्थित रहे। अतिथियों की सूची में राष्ट्रीय सहमंत्री गोसेवा विभाग राजेन्द्र सिंह, संघ गौ सेवा विभाग के प्रांत उपाध्यक्ष भुवन पंड्या, दिव्य भारती, मंहत रामशरणदास, दिग्विजय राम, चन्द्रभारती महाराज, भूपेंद्र सिंह रघुवंशी, सुरेश झंवर, जगदीश दशोरा, भंवर सिंह चौहान, राजेंद्र बाहेती, सीताराम मेनारिया, गोपाल मूंदड़ा, शैलेंद्र मेनारिया, विनोद कोठारी, सुरेश बांगड़, सत्यनारायण पुंगलिया, रतन तड़बा, प्रवीण टांक, शैलेंद्र झंवर, अनिल ईनाणी, विश्वनाथ टांक, महेंद्र सिंह सिसोदिया, प. राकेश शास्त्री, राधेश्याम आमेरिया, विनीत तिवारी, अजय बनवार, मनोज पारीक, गोपाल जाजू, मनोज साहू, जे सी मेनारिया, रवि मेनारिया, राजन माली, रवि वीरानी, फ़तह लाल भड़कत्या, केशव व्यास, संजय शर्मा, राजेन्द्र शक्तावत, रामप्रसाद बघेरवाल, दीपक वर्मा, दीनदयाल भारद्वाज, लविस मूंदड़ा, विक्रम गवारिया, कुलदीप शर्मा, युवराज आर्य, प्रहलाद साहू, जितेन्द्र वैष्णव, रितेश कुमावत, राजकुमार तोलम्बिया और गणेश प्रजापत की गरिमामयी उपस्थिति रही।
कार्यक्रम में मातृशक्ति की भी भारी भागीदारी देखी गई, जिसमें जगदीश मंडोवरा, सुशीला कंवर, विमला गट्टाणी, रेखा शक्तावत, लीला आग़ाल, भावना न्याति, चंद्रकांता राठौड़, प्रेमलता कुमावत, कल्पना शर्मा, सरस्वती शर्मा और भारती वैष्णव सहित हजारों की संख्या में महिलाएं सम्मिलित हुईं। समिति द्वारा सभी आगंतुक अतिथियों का उपरना ओढ़ाकर और स्मृति चिन्ह भेंट कर भव्य स्वागत किया गया। रुक्मिणी विवाह के प्रसंग के साथ शुरू हुआ यह आयोजन न केवल एक धार्मिक अनुष्ठान रहा, बल्कि इसने समाज में सांस्कृतिक चेतना और समय की महत्ता का एक गहरा संदेश प्रवाहित किया। इस कथा का समापन क्षेत्र की आध्यात्मिक स्मृतियों में लंबे समय तक अंकित रहेगा।

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