चित्तौड़गढ़ में ज्ञान और राष्ट्रभक्ति का महासंगम: श्री कल्लाजी वैदिक विश्वविद्यालय में गूंजा 'जय हिंद' और 'माँ सरस्वती' का जयघोष
चित्तौड़गढ़ के श्री कल्लाजी वैदिक विश्वविद्यालय में बसंत पंचमी और नेताजी सुभाषचंद्र बोस जयंती का भव्य आयोजन हुआ। चेयरपर्सन कैलाशचंद्र मूंदड़ा की अध्यक्षता में ज्ञान, संस्कृति और राष्ट्रभक्ति की त्रिवेणी बही, जिसमें माँ सरस्वती की वंदना और नेताजी के बलिदान को याद किया गया। जानिए कैसे इस गरिमामय समारोह ने विद्यार्थियों और समाज में नई चेतना का संचार किया।

चित्तौड़गढ़। भक्ति, शक्ति और गौरवशाली इतिहास की धरा चित्तौड़गढ़ में एक ऐसा दृश्य जीवंत हो उठा, जहाँ बसंत की सुनहरी आभा और राष्ट्रभक्ति का जज्बा एक साथ एकाकार हो गए। निम्बाहेड़ा स्थित श्री कल्लाजी वैदिक विश्वविद्यालय कल्याण लोक में शुक्रवार को बसंत पंचमी और महान क्रांतिकारी नेताजी सुभाषचंद्र बोस की जयंती का संयुक्त आयोजन न केवल श्रद्धा और संस्कृति का प्रतीक बना, बल्कि इसने परिसर में ज्ञान, सृजन और अटूट देशभक्ति की त्रिवेणी प्रवाहित कर दी। कार्यक्रम की गरिमा ने उपस्थित जनसमूह को भारतीय मूल्यों और महान नायकों के बलिदान की याद दिलाते हुए एक नए उत्साह से भर दिया।
समारोह का विधिवत आगाज़ श्रीश्री 1008 श्री शेषावतार श्री कल्लाजी महाराज, माँ सरस्वती, भारत माता और नेताजी सुभाषचंद्र बोस के चित्रों के समक्ष पूर्ण वैदिक रीति-रिवाजों के साथ पूजन-अर्चन से हुआ। दीप प्रज्वलन और छात्र प्रत्युष की मधुर वाणी में प्रस्तुत सरस्वती वंदना ने संपूर्ण वातावरण को आध्यात्मिक ऊर्जा और उल्लास से सराबोर कर दिया। इसी क्रम को आगे बढ़ाते हुए छात्र रजत ने बसंत पंचमी के दार्शनिक महत्व पर प्रकाश डाला और इसे केवल एक ऋतु परिवर्तन नहीं, बल्कि नवसृजन और सकारात्मक ऊर्जा का दिव्य पर्व बताया।
बौद्धिक विमर्श के सत्र में विश्वविद्यालय के आचार्य डॉ. राहुल कुमार सती ने बसंत ऋतु के धार्मिक, सांस्कृतिक और वैदिक आयामों को साझा करते हुए बताया कि यह समय प्रकृति और मनुष्य दोनों के लिए पुनर्जागरण का होता है। वहीं, आचार्य विनायक वानखेड़े ने नेताजी सुभाषचंद्र बोस के अदम्य साहस और स्वतंत्रता संग्राम में उनकी अविस्मरणीय भूमिका का सविस्तार वर्णन किया। उन्होंने जोर देकर कहा कि नेताजी का व्यक्तित्व आज के युवाओं के लिए एक मशाल की तरह है, जो उन्हें राष्ट्र के प्रति समर्पण की प्रेरणा देता है।
कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे विश्वविद्यालय के चेयरपर्सन कैलाशचंद्र मूंदड़ा ने अपने संबोधन में बसंत पंचमी की परंपराओं और नेताजी के जीवन के प्रेरक प्रसंगों को बड़ी कुशलता से पिरोया। उन्होंने कहा कि माँ सरस्वती की आराधना हमें विवेक और संस्कारों की ओर ले जाती है, जो विद्यार्थियों के लिए अनुसंधान और आत्मविकास का मार्ग प्रशस्त करती है। नेताजी को नमन करते हुए उन्होंने 'तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आज़ादी दूँगा' के ऐतिहासिक आह्वान को दोहराया और युवाओं से राष्ट्र निर्माण में सक्रिय भागीदारी की अपील की। कार्यक्रम का सफल संचालन डॉ. स्मिता शर्मा द्वारा किया गया, जबकि डॉ. रोहित शर्मा ने सभी का आभार प्रकट किया। अंत में डॉ. सौरभ जोशी द्वारा शांति पाठ के साथ इस गौरवमयी आयोजन का समापन हुआ, जिसने चित्तौड़गढ़ की इस पावन धरा पर एक नई चेतना का संचार किया।

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