ग्रेट निकोबार द्वीप परियोजना एक महत्त्वाकांक्षी और विशाल विकास परियोजना है जिसका उद्देश्य भारत के अंडमान और निकोबार द्वीपसमूह के सबसे बड़े द्वीप, ग्रेट निकोबार को एक सामरिक और आर्थिक केंद्र में बदलना है। इस परियोजना की कुल लागत लगभग ₹81,000 करोड़ है और इसमें कई महत्वपूर्ण अवसंरचनात्मक विकास शामिल हैं। नीति आयोग ने कमीशन की गई व्यवहार्यता रिपोर्ट एईसीओएम इंडिया द्वारा तैयार की थी। इसके बाद, विशेषज्ञ मूल्यांकन समिति की बैठक आयोजित की गई, जिसमें 25 मई 2021 को परियोजना के संदर्भ में आवश्यक शर्तें निर्धारित की गईं।

परियोजना की प्रारंभिक कुल लागत ₹75,000 करोड़ (2022 में $9.4 बिलियन) थी, जिसे 2025 में ₹81,000 करोड़ तक बढ़ा दिया गया। इस परिकल्पना नीति आयोग ने तैयार की थी, और परियोजना का विकास अंडमान और निकोबार द्वीप समूह एकीकृत विकास निगम (ANIIDC) द्वारा किया जा रहा है।


ग्रेट निकोबार द्वीप परियोजना क्या है?

इस परियोजना में निम्नलिखित प्रमुख घटक शामिल हैं:

गैलेथिया खाड़ी में एक अंतरराष्ट्रीय कंटेनर ट्रांसशिपमेंट टर्मिनल (ICTT) स्थापित किया जाएगा, जो भारत को मलक्का जलडमरूमध्य के नजदीक एक प्रमुख शिपिंग हब के रूप में उभारेगा। इसके साथ ही, एक ग्रीनफील्ड अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा बनाया जाएगा, जिसका उपयोग नागरिक और सैन्य दोनों उद्देश्यों के लिए किया जाएगा। परियोजना में एक समग्र टाउनशिप का भी निर्माण शामिल है, जहां लगभग 3 से 4 लाख लोग निवास कर सकेंगे। ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए 450 MVA क्षमता वाला गैस और सौर ऊर्जा आधारित बिजली संयंत्र भी स्थापित किया जाएगा। इस परियोजना का मुख्य उद्देश्य भारत के सामरिक हितों की सुरक्षा सुनिश्चित करना है, क्योंकि यह द्वीप हिंद महासागर के महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों के बेहद करीब स्थित है। इसके माध्यम से भारत की समुद्री सुरक्षा, नौसैनिक क्षमताओं और क्षेत्रीय आर्थिक विकास को सुदृढ़ करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाया जाएगा।

क्या होगा इसका स्थानीय आदिवासी समुदायों पर प्रभाव:

ग्रेट निकोबार द्वीप पर शमपेन और निकोबारी जैसे आदिवासी समुदाय सदियों से रह रहे हैं। यह परियोजना इनके जीवन और संस्कृति पर चिंताजनक प्रभाव डाल सकती है। परियोजना के लिए बड़े पैमाने पर भूमि अधिग्रहण होगा, जिससे आदिवासियों को अपने आवास और पारंपरिक जंगलों से विस्थापित होना पड़ सकता है। यह विस्थापन उनकी पारंपरिक जीवनशैली, संस्कृति, और प्राकृतिक संसाधनों पर निर्भरता को प्रभावित करेगा। वन्य जीवन और उनकी जीवन धारा को नुकसान, धार्मिक और सांस्कृतिक स्थलों के नष्ट होने का खतरा है। अक्सर आदिवासियों की सहमति के बिना योजनाएं बनाई जाती हैं, जिससे उनके अधिकारों का उल्लंघन हो सकता है। इसलिए यह आवश्यक है कि परियोजना में आदिवासी समुदायों की भागीदारी सुनिश्चित की जाए और उनके अधिकारों की रक्षा की जाए।

कानूनी चुनौतियाँ और विरोध:

ग्रेट निकोबार परियोजना के खिलाफ कई कानूनी मुद्दे और सार्वजनिक विरोध सामने आए हैं। पर्यावरण संरक्षण को लेकर कई समूहों ने उच्च न्यायालय और नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल में पर्यावरण मंजूरी को चुनौती दी है। आदिवासी अधिकारों की अनदेखी और बिना उनकी सहमति के भूमि हस्तांतरण की कड़ी आलोचना हुई है। समाजिक कार्यकर्ताओं और पर्यावरणविदों ने विशाल वनक्षेत्रों की कटाई और जैव विविधता नष्ट होने को लेकर विरोध प्रदर्शन किए हैं।

कांग्रेस सहित कुछ राजनीतिक दलों ने भी परियोजना की पर्यावरणीय और जनजातीय प्रभावों को लेकर केंद्र सरकार की आलोचना की है। इन कानूनी और सामाजिक विरोधों ने परियोजना की प्रगति में रुकावट बनाई है और सरकार से पारदर्शी व सहभागी योजना बनाने की मांग की जा रही है।


ग्रेट निकोबार द्वीप परियोजना सामरिक और आर्थिक दृष्टि से भारत के लिए अत्यंत अहम है, क्योंकि इससे हिंद महासागर क्षेत्र में भारत की स्थिति और प्रभाव और अधिक मजबूत होगा। इसी कारण सरकार इस परियोजना को जल्द से जल्द पूरा करना चाहती है। हालांकि, इसके क्रियान्वयन से स्थानीय आदिवासी समुदायों के जीवन और पर्यावरण पर गंभीर प्रभाव पड़ने की आशंका है। इसलिए आवश्यक है कि इस परियोजना को संतुलित दृष्टिकोण के साथ आगे बढ़ाया जाए और इसमें स्थानीय समुदायों की सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित की जाए, ताकि विकास के साथ सांस्कृतिक, सामाजिक और पर्यावरणीय संरक्षण भी बना रहे।


Manyaa Chaudhary

Manyaa Chaudhary

यह 'प्रातःकाल' में एसोसिएट एडिटर के पद पर हैं। और पिछले दो वर्षों से इन्हें रिपोर्टिंग और इवेंट मैनेजमेंट का अनुभव है। इससे पहले इन्होंने 'स्वदेश न्यूज़ चैनल' में बतौर ट्रेनी रिपोर्टर काम किया है। ये विशेष रूप में मनोरंजन, स्पोर्ट्स, और क्राइम रिपोर्टिंग क्षेत्र में समर्थ हैं। अभी यह जर्नलिज्म की पढाई कर रही हैं।

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