देश का आम बजट 1 फरवरी को संसद में पेश होने जा रहा है। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण लगातार नौवीं बार बजट प्रस्तुत कर एक नया रिकॉर्ड बनाने की ओर हैं। सामान्यतः बजट पेश करने की जिम्मेदारी वित्त मंत्री की होती है, लेकिन भारतीय संसदीय इतिहास में कुछ ऐसे असाधारण मौके भी दर्ज हैं, जब परिस्थितियों ने देश के प्रधानमंत्रियों को स्वयं आगे आकर बजट पेश करने के लिए मजबूर कर दिया। ये घटनाएं न केवल राजनीतिक संकट की कहानी कहती हैं, बल्कि शासन की निरंतरता और संवैधानिक जिम्मेदारी का भी उदाहरण प्रस्तुत करती हैं।

जब प्रधानमंत्री बने वित्त मंत्री

जवाहरलाल नेहरू: संकट में नेतृत्व का उदाहरण (1958-59)

देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ऐसे पहले प्रधानमंत्री थे जिन्होंने स्वयं यूनियन बजट पेश किया।

वित्त मंत्री टी.टी. कृष्णामाचारी का नाम 1958 के मुंद्रा घोटाले में सामने आया।

जस्टिस छागला आयोग की रिपोर्ट में भ्रष्टाचार का दोषी पाए जाने के बाद कृष्णामाचारी ने 12 फरवरी 1958 को इस्तीफा दे दिया।

इसके बाद नेहरू ने वित्त मंत्रालय का कार्यभार संभाला और वित्त वर्ष 1958-59 का बजट संसद में प्रस्तुत किया।

अपने बजट भाषण में नेहरू ने स्पष्ट रूप से उन असामान्य परिस्थितियों का उल्लेख किया, जिनमें उन्हें यह जिम्मेदारी निभानी पड़ी। इस बजट की सबसे बड़ी खासियत ‘गिफ्ट टैक्स’ का प्रस्ताव था, जिसके तहत 10,000 रुपये से अधिक की संपत्ति के हस्तांतरण को कर के दायरे में लाया गया, जबकि पत्नी को 1 लाख रुपये तक उपहार देने पर छूट का प्रावधान रखा गया।

इंदिरा गांधी: राजनीतिक टकराव के बीच बजट (1970)

पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने भी एक बार स्वयं यूनियन बजट पेश किया।

1969 में वित्त मंत्री मोरारजी देसाई के इस्तीफे के बाद वित्त मंत्रालय की जिम्मेदारी इंदिरा गांधी के पास आई।

कांग्रेस में आंतरिक कलह और मतभेदों के चलते 12 नवंबर 1969 को उन्हें पार्टी से निष्कासित कर दिया गया।

इसके बावजूद, उन्होंने 28 फरवरी 1970 को संसद में बजट पेश किया।

इस बजट में गिफ्ट टैक्स की सीमा 10,000 रुपये से घटाकर 5,000 रुपये कर दी गई। साथ ही, इनडायरेक्ट टैक्स में बड़ा बदलाव करते हुए सिगरेट पर कर 3% से बढ़ाकर 22% कर दिया गया, जिसे उस दौर का साहसिक आर्थिक निर्णय माना गया।

राजीव गांधी: विवादों के साये में आर्थिक सुधार (1987-88)

वित्त वर्ष 1987-88 का बजट तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने प्रस्तुत किया।

बोफोर्स घोटाले की जांच के चलते वित्त मंत्री वी.पी. सिंह और राजीव गांधी के बीच विवाद गहराता गया।

दबाव में आकर वी.पी. सिंह ने जनवरी 1987 में इस्तीफा दे दिया।

इसके बाद राजीव गांधी ने वित्त मंत्रालय अपने पास रखते हुए बजट पेश किया।

यह बजट तकनीक, आधुनिकीकरण और आर्थिक सुधारों पर केंद्रित था। इसी बजट में पहली बार कॉर्पोरेट टैक्स का प्रस्ताव सामने आया, जिसके तहत घरेलू और विदेशी कंपनियों की आय पर कर लगाने की व्यवस्था की गई।

बजट से आगे की कहानी :

भारतीय लोकतंत्र में बजट केवल आर्थिक दस्तावेज नहीं, बल्कि राजनीतिक स्थिरता, संवैधानिक जिम्मेदारी और नेतृत्व क्षमता का भी प्रतीक रहा है। जब-जब वित्त मंत्री संकट में पड़े, तब-तब प्रधानमंत्रियों ने आगे आकर यह सुनिश्चित किया कि देश की आर्थिक व्यवस्था और संसदीय परंपराएं बाधित न हों। ये घटनाएं आज भी भारतीय संसदीय इतिहास के सबसे महत्वपूर्ण और असाधारण अध्यायों में गिनी जाती हैं।

Ashiti Joil

Ashiti Joil

यह प्रातःकाल में कंटेंट रायटर अँड एडिटर के पद पर कार्यरत हैं। यह गए 3 सालों से पत्रकारिता और डिजिटल मीडिया में सक्रिय हैं। इन्होंने लोकसत्ता, टाईम महाराष्ट्र, PR और हैट मीडिया में सोशल मीडिया कंटेंट रायटर के तौर पर काम किया है। इन्होंने मराठी साहित्य में मास्टर डिग्री पूर्ण कि है और अभी ये यूनिवर्सिटी के गरवारे इंस्टीट्यूड में PGDMM (Marthi Journalism) कर रही है। यह अब राजकरण, बिजनेस , टेक्नोलॉजी , मनोरंजन और क्रीड़ा इनके समाचार बनती हैं।

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