डॉलर से भी दमदार था रुपया; अरब के रेगिस्तानों से लेकर खाड़ी के बाजारों तक, जानें भारत की मुद्रा का वो ऐतिहासिक सफर
क्या आप जानते हैं कि कभी कुवैत और दुबई जैसे देशों में भारतीय रुपया चलता था? जानें रुपये के उस शाही सफर की कहानी, जब यह खाड़ी देशों की आधिकारिक करेंसी था। 1966 के ऐतिहासिक अवमूल्यन और सोने की तस्करी ने कैसे भारतीय रुपये को ग्लोबल से लोकल बना दिया और क्यों अरब देशों ने अपनी अलग करेंसी बनाई? भारतीय मुद्रा के उत्थान और पतन की पूरी रिपोर्ट।

Indian Rupee History : आज भले ही वैश्विक व्यापार में डॉलर और यूरो का दबदबा हो, लेकिन एक दौर ऐसा भी था जब भारतीय रुपया हिंद महासागर के आर-पार और खाड़ी देशों के बाजारों की मुख्य धड़कन हुआ करता था। 19वीं सदी से लेकर 20वीं सदी के मध्य तक, कुवैत से लेकर ओमान तक की तिजोरियों में भारतीय रुपया ही गौरव के साथ रखा जाता था। लेकिन आखिर ऐसा क्या हुआ कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर धाक जमाने वाली यह मुद्रा अचानक अपनी ही सीमाओं में सिमट कर रह गई? इसके पीछे की कहानी में शाही सत्ता का प्रभाव, सोने की तस्करी का रोमांच और एक ऐतिहासिक आर्थिक संकट छिपा है।
खाड़ी देशों की 'लाइफलाइन' था रुपया :
ब्रिटिश काल के दौरान भारत स्वेज नहर के पूर्व में ब्रिटिश साम्राज्य का सबसे बड़ा आर्थिक केंद्र था। खाड़ी देश (कुवैत, बहरीन, कतर, ओमान और वर्तमान UAE) औपचारिक संधियों के माध्यम से भारतीय मुद्रा से जुड़े हुए थे। चांदी के सिक्कों पर आधारित भारतीय रुपये की स्थिरता इतनी अधिक थी कि पूर्वी अफ्रीका से लेकर दक्षिण-पूर्व एशिया तक के व्यापारी इसे सोने के बराबर मानते थे। यह केवल एक करेंसी नहीं, बल्कि भरोसे का प्रतीक थी।
सोने की तस्करी और 'गल्फ रुपी' का जन्म :
1950 के दशक में रुपये की वैश्विक साख को तस्करों की नजर लग गई। भारत में सोने के आयात पर कड़े प्रतिबंधों के कारण देश में सोना महंगा था, जबकि खाड़ी देशों में यह आसानी से और सस्ता उपलब्ध था। तस्कर भारतीय रुपये को खाड़ी ले जाते, वहां से सोना खरीदते और भारत लाकर भारी मुनाफे पर बेचते। इस अवैध धंधे ने भारत के विदेशी मुद्रा भंडार को खोखला करना शुरू कर दिया।
कदम: इस संकट को रोकने के लिए आरबीआई ने 1959 में 'गल्फ रुपी' पेश किया।
बदलाव: यह दिखने में भारतीय नोट जैसा था लेकिन इसका रंग अलग था। इसे केवल खाड़ी देशों के लिए वैध बनाया गया ताकि भारत के घरेलू रिजर्व सुरक्षित रह सकें।
1966 का वो काला साल: जब टूट गया सदियों का भरोसा
रुपये के अंतरराष्ट्रीय पतन की अंतिम पटकथा 1966 में लिखी गई। भारत एक गंभीर आर्थिक संकट की चपेट में था और सरकार ने रुपये का 57% अवमूल्यन (Devaluation) कर दिया। चूंकि गल्फ रुपया भारतीय रुपये से सीधे जुड़ा था, खाड़ी देशों की बचत और अर्थव्यवस्था रातों-रात धराशायी हो गई।
नतीजा: खाड़ी देशों का भारत की आर्थिक नीतियों से भरोसा उठ गया।
नई शुरुआत: कुवैत ने 1961 में 'दीनार' अपनाया, बहरीन ने 1965 में अपनी मुद्रा बदली और कतर-दुबई ने 1966 में साझा रियाल जारी किया। 1970 तक ओमान ने भी भारतीय रुपये को अलविदा कह दिया।

Ashiti Joil
यह प्रातःकाल में कंटेंट रायटर अँड एडिटर के पद पर कार्यरत हैं। यह गए 3 सालों से पत्रकारिता और डिजिटल मीडिया में सक्रिय हैं। इन्होंने लोकसत्ता, टाईम महाराष्ट्र, PR और हैट मीडिया में सोशल मीडिया कंटेंट रायटर के तौर पर काम किया है। इन्होंने मराठी साहित्य में मास्टर डिग्री पूर्ण कि है और अभी ये यूनिवर्सिटी के गरवारे इंस्टीट्यूड में PGDMM (Marthi Journalism) कर रही है। यह अब राजकरण, बिजनेस , टेक्नोलॉजी , मनोरंजन और क्रीड़ा इनके समाचार बनती हैं।
