भारत के सबसे बड़े औद्योगिक साम्राज्य, टाटा ग्रुप के भीतर एक गंभीर कानूनी गतिरोध उत्पन्न हो गया है। टाटा ट्रस्ट्स, जो टाटा संस में बहुमत हिस्सेदारी रखता है, वर्तमान में बंबई हाई कोर्ट के कठघरे में खड़ा है। विवाद का केंद्र सर रतन टाटा ट्रस्ट (SRTT) में नियमों के कथित उल्लंघन से जुड़ा है, जिसने औद्योगिक जगत में हलचल मचा दी है। यह मामला एक ऐसे समय में सामने आया है जब टाटा ट्रस्ट्स अपनी एक अत्यंत महत्वपूर्ण रणनीतिक बैठक आयोजित करने की तैयारी में था, जिस पर अब अनिश्चितता के बादल मंडराने लगे हैं।

इस कानूनी विवाद की शुरुआत सुरेश तुलसीराम पाटिलखेड़े द्वारा दायर एक याचिका से हुई। याचिकाकर्ता का मुख्य तर्क यह है कि सर रतन टाटा ट्रस्ट का वर्तमान बोर्ड ढांचा महाराष्ट्र पब्लिक ट्रस्ट (संशोधन) एक्ट, 2025 के प्रावधानों का उल्लंघन कर रहा है। उल्लेखनीय है कि सितंबर 2025 में लागू हुए इस नए कानून के तहत किसी भी ट्रस्ट में 'स्थायी ट्रस्टियों' की संख्या कुल सदस्यों की संख्या के एक-चौथाई यानी 25 प्रतिशत तक ही सीमित होनी चाहिए। वर्तमान में, सर रतन टाटा ट्रस्ट में कुल छह ट्रस्टी हैं, जिनमें से तीन—जिम्मी नवल टाटा, जहांगीर एचसी जहांगीर और नोएल नवल टाटा—स्थायी सदस्य के रूप में कार्यरत हैं। यह संख्या ट्रस्ट की कुल क्षमता का 50 प्रतिशत है, जो नए वैधानिक मानदंडों से दोगुनी है।

याचिका में मांग की गई है कि 1 सितंबर 2025 के बाद ट्रस्ट द्वारा लिए गए सभी निर्णयों को अवैध घोषित किया जाए, क्योंकि बोर्ड का गठन ही त्रुटिपूर्ण है। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यदि ट्रस्ट को अपने तीनों स्थायी सदस्यों को पद पर बनाए रखना है, तो उसे ट्रस्टियों की कुल संख्या बढ़ाकर कम से कम 12 करनी होगी। इस तकनीकी विसंगति ने न केवल ट्रस्ट के आंतरिक प्रशासन को बल्कि टाटा संस के बोर्ड में इसके प्रतिनिधित्व को भी प्रभावित किया है।

इस विवाद का सबसे तात्कालिक प्रभाव टाटा ट्रस्ट्स की प्रस्तावित बैठक पर पड़ सकता है। इस बैठक का मुख्य एजेंडा टाटा संस के बोर्ड में ट्रस्ट के नामांकित व्यक्तियों की समीक्षा करना था। वर्तमान में, नोएल टाटा और वेणु श्रीनिवासन टाटा संस के बोर्ड में ट्रस्ट का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। याचिकाकर्ता ने कोर्ट से इस बैठक पर तत्काल रोक लगाने की अपील की है। मामले की गंभीरता को देखते हुए याचिका में महाराष्ट्र सरकार, चैरिटी कमिश्नर और नोएल टाटा सहित अन्य वरिष्ठ ट्रस्टियों को प्रतिवादी बनाया गया है।

टाटा ग्रुप जैसे प्रतिष्ठित घराने के लिए यह कानूनी चुनौती केवल एक तकनीकी मामला नहीं है, बल्कि यह भविष्य के कॉर्पोरेट गवर्नेंस और निर्णयों की वैधता पर भी सवाल खड़ा करता है। बंबई हाई कोर्ट के रुख पर अब पूरे देश की नजरें टिकी हैं, क्योंकि यह फैसला भारत के सबसे प्रभावशाली चैरिटेबल ट्रस्टों में से एक की कार्यप्रणाली और नियंत्रण को नई दिशा दे सकता है।

Lalita Rajput

Lalita Rajput

इन्हें लेखन क्षेत्र में लगभग 5 वर्षों का अनुभव है। इस दौरान इन्होंने फाइनेंस, कैलेंडर और बिज़नेस न्यूज़ को गहराई से कवर किया है। इनकी शैक्षणिक पृष्ठभूमि वित्त से जुड़ी है—इन्होंने एमबीए (फाइनेंस) किया है और वर्तमान में फाइनेंस में पीएचडी कर रही हैं। जनवरी 2026 से ये दै. प्रातःकाल में कार्यरत हैं, जहाँ बिज़नेस, फाइनेंस, मौसम और भारतीय सीमाओं से जुड़े समाचार सरल, सटीक और व्यवस्थित ढंग से प्रस्तुत करती हैं।

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