वैश्विक भू-राजनीतिक मोर्चे से आए सकारात्मक और ऐतिहासिक संकेतों के कारण भारतीय इक्विटी बाजार में कारोबारी सप्ताह के पहले ही दिन अभूतपूर्व तेजी दर्ज की गई है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में आई भारी गिरावट और अमेरिका व ईरान के बीच शांति समझौते की उम्मीदों ने घरेलू निवेशकों के सेंटिमेंट को मजबूत कर दिया है। इसी का परिणाम रहा कि घरेलू शेयर बाजार खुलते ही बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज का सूचकांक सेंसेक्स और नेशनल स्टॉक एक्सचेंज का निफ्टी दोनों ही बड़े अंकों की छलांग के साथ हरे निशान पर कारोबार करने लगे। इस जोरदार लिफ्टिंग के कारण शुरुआती कुछ मिनटों के भीतर ही भारतीय निवेशकों की संपत्ति में लाखों करोड़ रुपये का भारी इजाफा देखने को मिला है, जिसने हालिया सत्रों से बाजार पर हावी सुस्ती और अनिश्चितता के बादलों को पूरी तरह से साफ कर दिया है।

कारोबार की शुरुआत होते ही दलाल स्ट्रीट पर लिवाल इस कदर हावी हुए कि सेंसेक्स ने शुरुआती टिक में ही 800 अंकों से अधिक की बढ़त बना ली, जबकि निफ्टी 50 सूचकांक भी 250 अंकों से ज्यादा की मजबूती के साथ आगे बढ़ा। बाजार में आई इस सामूहिक खरीदारी के दम पर बीएसई पर सूचीबद्ध कंपनियों का कुल बाजार पूंजीकरण (मार्केट कैप) बढ़कर 468 लाख करोड़ रुपये के सर्वकालिक उच्च स्तर के करीब पहुंच गया। इस जादुई आंकड़े को छूने के साथ ही निवेशकों की झोली में महज कुछ ही समय के भीतर करीब 5 लाख करोड़ रुपये की नई वेल्थ जुड़ गई। बाजार के इस आक्रामक रुख ने विश्लेषकों को भी चौंका दिया है, क्योंकि पिछले कुछ हफ्तों से विदेशी संस्थागत निवेशकों की लगातार जारी बिकवाली के कारण घरेलू बाजार भारी दबाव महसूस कर रहा था।

इस ऐतिहासिक तेजी के पीछे सबसे प्रमुख और निर्णायक कारक मध्य पूर्व एशिया में शांति स्थापना की नई उम्मीदें बनी हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ओर से जारी एक हालिया बयान में कहा गया है कि वाशिंगटन और तेहरान ने वैश्विक व्यापार के सबसे महत्वपूर्ण जलमार्ग, होर्मुज जलडमरूमध्य को निर्बाध रूप से फिर से खोलने के लिए एक शांति समझौते के मसौदे (MoU) पर काफी हद तक आम सहमति बना ली है। इस कूटनीतिक प्रगति की घोषणा ने दुनिया भर के वित्तीय बाजारों में जोखिम लेने की क्षमता को बढ़ा दिया। चूंकि होर्मुज मार्ग वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति की रीढ़ माना जाता है, इसलिए इसके खुलने के संकेतों ने अंतरराष्ट्रीय बाजार में कमोडिटी व्यापारियों को तत्काल राहत का संदेश दिया।

शांति समझौते की खबरों का सीधा और पहला प्रहार कच्चे तेल की कीमतों पर हुआ, जहां भारी बिकवाली के चलते भाव क्रैश हो गए। वैश्विक मानक माना जाने वाला ब्रेंट क्रूड वायदा अंतरराष्ट्रीय बाजार में 5 फीसदी से अधिक की गिरावट के साथ 98 डॉलर प्रति बैरल के स्तर पर आ गया। वहीं, अमेरिकी बेंचमार्क डब्ल्यूटीआई (WTI) क्रूड भी लगभग 6 फीसदी टूटकर 91.30 डॉलर प्रति बैरल पर कारोबार करने लगा। भारतीय अर्थव्यवस्था के दृष्टिकोण से कच्चे तेल का सस्ता होना सबसे बड़ी संजीवनी माना जाता है, क्योंकि भारत अपनी कुल पेट्रोलियम आवश्यकताओं का लगभग 85 प्रतिशत हिस्सा आयात करता है। तेल की कीमतें घटने से देश का आयात बिल कम होता है और चालू खाता घाटे (CAD) में सुधार आता है, जिसका सीधा सकारात्मक असर घरेलू शेयर बाजार की कंपनियों के रिफाइनिंग व इनपुट मार्जिन पर पड़ता है।

वैश्विक स्तर पर भी इस शांति वार्ता के संकेतों का जोरदार जश्न मनाया गया, जिसने घरेलू बाजार की तेजी को अतिरिक्त सहारा दिया। एशियाई बाजारों में जापान का निक्केई इंडेक्स 3 फीसदी से ज्यादा की ऐतिहासिक उछाल के साथ अपने इतिहास में पहली बार 65,000 के मनोवैज्ञानिक स्तर को पार कर गया। इसके साथ ही चीन का शंघाई कंपोजिट और ताइवान का मुख्य सूचकांक भी क्रमशः एक और तीन फीसदी की बढ़त के साथ बंद हुए। अमेरिकी फ्यूचर्स (डाउ जोंस) में भी सुबह से ही एक फीसदी की मजबूती देखी जा रही थी, जिसने वैश्विक स्तर पर इक्विटी बाजारों में तरलता और विश्वास की नई लहर दौड़ा दी।

इस अनुकूल वैश्विक माहौल के बीच भारतीय रुपये ने भी मुद्रा बाजार में जोरदार रिकवरी दिखाई है। पिछले सप्ताह के दौरान रिकॉर्ड निचले स्तरों को छूने के बाद घरेलू मुद्रा अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 0.37 फीसदी की मजबूती के साथ 95.34 के स्तर पर खुली। रुपये को मिली इस मजबूती के पीछे कच्चे तेल के घटते दाम और भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) द्वारा मुद्रा बाजार में समय पर किया गया रणनीतिक हस्तक्षेप माना जा रहा है। स्थिर और मजबूत होती घरेलू मुद्रा हमेशा से विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों के विश्वास को बहाल करने में सहायक सिद्ध होती है, जिससे भारतीय परिसंपत्तियों में पूंजी का बहिर्वाह रुकने की संभावना बढ़ जाती है।

इसके अतिरिक्त, अंतरराष्ट्रीय ऋण बाजार में अमेरिकी ट्रेजरी बॉन्ड यील्ड में आई गिरावट ने भी इक्विटी बाजारों के लिए उत्प्रेरक का काम किया है। पिछले सप्ताह बहु-वर्षीय उच्च स्तर को छूने के बाद, 10-वर्षीय अमेरिकी बॉन्ड यील्ड घटकर 4.558 फीसदी पर आ गई है। वित्तीय सिद्धांतों के अनुसार, बॉन्ड यील्ड में कमी आने से निश्चित आय वाले सुरक्षित साधनों का आकर्षण कम हो जाता है, जिसके कारण वैश्विक फंड मैनेजर अपनी पूंजी को वापस उभरते बाजारों के शेयर बाजार की ओर स्थानांतरित करने लगते हैं। हालांकि, इन तमाम सकारात्मक बदलावों के बीच बाजार के दिग्गजों ने सतर्कता बरतने की सलाह भी दी है।

भू-राजनीतिक राहत और बॉन्ड यील्ड में कमी के बावजूद, विदेशी संस्थागत निवेशकों (FIIs) की अनवरत बिकवाली भारतीय बाजार के लिए अब भी एक गंभीर और दीर्घकालिक चिंता का विषय बनी हुई है। बाजार के मुख्य निवेश रणनीतिकार वी. के. विजयकुमार के अनुसार, इस साल मई महीने तक विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPI) द्वारा की गई कुल शुद्ध बिकवाली 2,22,343 करोड़ रुपये के विशाल आंकड़े तक पहुंच चुकी है। यह आंकड़ा पिछले पूरे वर्ष 2025 में हुई कुल बिकवाली से भी कहीं अधिक है। इसलिए, हालांकि आज की इस पांच लाख करोड़ रुपये की इंट्रा-डे रिकवरी ने बाजार को एक मजबूत तकनीकी आधार प्रदान किया है, लेकिन बाजार की टिकाऊ बढ़त इस बात पर निर्भर करेगी कि आने वाले समय में विदेशी निवेशक भारतीय बाजार में शुद्ध खरीदार के रूप में कब वापसी करते हैं।

Lalita Rajput

Lalita Rajput

इन्हें लेखन क्षेत्र में लगभग 5 वर्षों का अनुभव है। इस दौरान इन्होंने फाइनेंस, कैलेंडर और बिज़नेस न्यूज़ को गहराई से कवर किया है। इनकी शैक्षणिक पृष्ठभूमि वित्त से जुड़ी है—इन्होंने एमबीए (फाइनेंस) किया है और वर्तमान में फाइनेंस में पीएचडी कर रही हैं। जनवरी 2026 से ये दै. प्रातःकाल में कार्यरत हैं, जहाँ बिज़नेस, फाइनेंस, मौसम और भारतीय सीमाओं से जुड़े समाचार सरल, सटीक और व्यवस्थित ढंग से प्रस्तुत करती हैं।

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