शेयर बाजार में भारी गिरावट: पश्चिम एशिया संकट के कारण सेंसेक्स 900 अंक टूटा, रुपया ऐतिहासिक निचले स्तर पर|
पश्चिम एशिया में गहराते तनाव और कच्चे तेल की कीमतों में उछाल के चलते शुरुआती कारोबार में सेंसेक्स 900 अंक से ज्यादा लुढ़का, रुपया सर्वकालिक निचले स्तर पर पहुंचा।

पश्चिम एशिया तनाव व कच्चे तेल में तेजी से शेयर बाजार क्रैश; सेंसेक्स भारी गिरा और रुपया डॉलर के मुकाबले रिकॉर्ड निचले स्तर पर।
नई दिल्ली: वैश्विक मोर्चे पर बढ़ते भू-राजनीतिक भूचाल और पश्चिम एशिया में गहराते सैन्य तनाव का सीधा असर भारतीय वित्तीय बाजार पर दिखाई देने लगा है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में आई अचानक तेजी के कारण घरेलू शेयर बाजार में बिकवाली का भारी दबाव देखा गया। कारोबारी सत्र की शुरुआत होते ही बंबई स्टॉक एक्सचेंज (BSE) का सूचकांक सेंसेक्स 900 अंक से अधिक लुढ़क गया, जिसने निवेशकों की धारणा को गंभीर रूप से प्रभावित किया है। इसी तरह नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) के सूचकांक निफ्टी में भी बड़ी गिरावट दर्ज की गई। इक्विटी बाजार में मची इस उथल-पुथल के बीच भारतीय मुद्रा भी दबाव से अछूती नहीं रही और अमेरिकी डॉलर के मुकाबले रुपया अपने अब तक के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गया।
बाजार खुलने के कुछ ही मिनटों के भीतर बिकवाली का दौर इतना तेज हुआ कि सुबह 9 बजकर 23 मिनट पर सेंसेक्स 800.46 अंक यानी 1.06 प्रतिशत की गिरावट के साथ 74,437.53 अंक के स्तर पर आ गया। ठीक इसी समय नेशनल स्टॉक एक्सचेंज का निफ्टी भी अपनी बढ़त गंवाकर 237.60 अंक यानी 1 प्रतिशत की गिरावट के साथ 23,405.90 अंक के स्तर पर कारोबार करता देखा गया। बाजार विश्लेषकों का मानना है कि ईरान और अमेरिका के बीच बढ़ते कूटनीतिक गतिरोध के कारण होर्मुज जलडमरूमध्य से होने वाली वैश्विक तेल आपूर्ति बाधित होने की आशंका बढ़ गई है, जिससे ब्रेंट क्रूड की कीमतें तेजी से ऊपर जा रही हैं। भारत अपनी जरूरत का अधिकांश पेट्रोलियम आयात करता है, इसलिए कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें देश के चालू खाता घाटे और राजकोषीय संतुलन के लिए एक बड़ा खतरा मानी जाती हैं।
मुद्रा बाजार में डॉलर की बढ़ती मांग और विदेशी संस्थागत निवेशकों (FIIs) द्वारा भारतीय बाजार से लगातार पूंजी निकालने के कारण रुपये की विनिमय दर ऐतिहासिक रूप से कमजोर हो गई है। घरेलू शेयर बाजार से विदेशी निवेशकों की इस निकासी ने रुपये की तरलता पर प्रतिकूल प्रभाव डाला है, जिससे घरेलू मुद्रा लगातार टूट रही है। इसके साथ ही, देश के आयातकों द्वारा कच्चे तेल के भुगतान के लिए अमेरिकी डॉलर की आक्रामक खरीदारी करने से रुपये पर दबाव और ज्यादा गहरा गया है, जो सीधे तौर पर देश की व्यापक आर्थिक स्थिरता के लिए एक संवेदनशील स्थिति पैदा करता है।
भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (SEBI) तथा रिजर्व बैंक के अधिकारी वित्तीय बाजारों की इस असाधारण अस्थिरता पर पैनी नजर रख रहे हैं। बैंकिंग सूत्रों के मुताबिक, रुपये की विनिमय दर को अत्यधिक गिरने से रोकने और मुद्रा बाजार में तरलता बनाए रखने के लिए केंद्रीय बैंक द्वारा आने वाले समय में हस्तक्षेप किया जा सकता है। बाजार नियामकों ने निवेशकों से किसी भी तरह की जल्दबाजी या पैनिक सेलिंग से बचने की अपील की है क्योंकि यह गिरावट पूरी तरह से वैश्विक बाहरी कारकों और भू-राजनीतिक उथल-पुथल से प्रेरित है। आगामी कारोबारी सत्रों में बाजार की चाल काफी हद तक पश्चिम एशिया से आने वाले कूटनीतिक घटनाक्रमों और अंतरराष्ट्रीय तेल उत्पादक देशों के रुख पर निर्भर करेगी।

Lalita Rajput
इन्हें लेखन क्षेत्र में लगभग 5 वर्षों का अनुभव है। इस दौरान इन्होंने फाइनेंस, कैलेंडर और बिज़नेस न्यूज़ को गहराई से कवर किया है। इनकी शैक्षणिक पृष्ठभूमि वित्त से जुड़ी है—इन्होंने एमबीए (फाइनेंस) किया है और वर्तमान में फाइनेंस में पीएचडी कर रही हैं। जनवरी 2026 से ये दै. प्रातःकाल में कार्यरत हैं, जहाँ बिज़नेस, फाइनेंस, मौसम और भारतीय सीमाओं से जुड़े समाचार सरल, सटीक और व्यवस्थित ढंग से प्रस्तुत करती हैं।
