भारत में पेट्रोल-डीजल की कीमतें कब होगी कम? जानें वैश्विक संकट, गणित और राहत की उम्मीद
पश्चिम एशिया संकट के बीच देश में ईंधन की खुदरा कीमतों में बढ़ोतरी हुई है, जहां अंतरराष्ट्रीय क्रूड मार्केट और राज्यों के वैट पर राहत की उम्मीदें टिकी हैं।

मुंबई के एक पेट्रोल पंप पर ईंधन भरने के लिए लगा डिस्पेंसर नोजल, जहां स्थानीय वैट अधिक होने के कारण खुदरा कीमतें देश के अन्य हिस्सों की तुलना में ज्यादा हैं।
petrol diesel price : सुबह की पहली किरण के साथ जब एक आम भारतीय अपनी बाइक या कार लेकर सड़क पर निकलता है, तो उसका पहला सामना पेट्रोल पंप के डिजिटल बोर्ड पर चमकती कीमतों से होता है। पिछले कुछ समय से यह बोर्ड लगातार देश के मध्यमवर्ग और स्थानीय व्यापारियों के बजट को बिगाड़ रहा है। तेल कंपनियों द्वारा खुदरा कीमतों पर लगी लंबी रोक हटाने के बाद, पेट्रोल और डीजल के दामों में धीरे-धीरे कुल सात रुपये पचास पैसे प्रति लीटर तक की भारी बढ़ोतरी दर्ज की जा चुकी है। इस अचानक आई तेजी ने रसोई के बजट से लेकर बाजार की लॉजिस्टिक्स लागत तक, हर मोर्चे पर हाहाकार मचा दिया है। हर नागरिक की जुबान पर आज एक ही यक्ष प्रश्न है कि क्या इस आसमान छूती कीमत से कोई राहत मिलने वाली है या ईंधन की यह आग अभी और भड़केगी। इस पूरे संकट को समझने के लिए हमें वैश्विक बाजार के उलझे हुए गणित, सरकारी टैक्स के चक्रव्यूह और भारतीय तेल कंपनियों के वित्तीय बहीखातों की गहराई में उतरना होगा।
भारत के इस ईंधन संकट की जड़ें सीधे अंतरराष्ट्रीय भू-राजनीति से जुड़ी हुई हैं, क्योंकि देश अपनी कुल जरूरत का लगभग पचासी प्रतिशत कच्चा तेल विदेशी बाजारों से आयात करता है। यही कारण है कि दुनिया के किसी भी कोने में होने वाली मामूली हलचल भी भारतीय उपभोक्ताओं की जेब पर सीधा डाका डालती है। हालिया संकट के पीछे पश्चिम एशिया में ईरान और इजरायल के बीच छिड़ा भीषण तनाव है। इस टकराव के चलते समुद्र का सबसे संवेदनशील और रणनीतिक व्यापारिक मार्ग माना जाने वाला 'होर्मुज जलडमरूमध्य' बुरी तरह प्रभावित हो गया। इस रास्ते में पैदा हुई बाधा के कारण वैश्विक बाजार से प्रतिदिन करीब एक करोड़ चालीस लाख बैरल कच्चे तेल की आपूर्ति अचानक ठप हो गई। नतीजा यह हुआ कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें देखते ही देखते एक सौ पचास डॉलर प्रति बैरल के सर्वकालिक उच्च स्तर के करीब पहुंच गईं।
इस अभूतपूर्व वैश्विक तूफान के बीच राहत की एकमात्र बात यह रही कि भारत सरकार और देश की सार्वजनिक तेल विपणन कंपनियों ने मिलकर एक मजबूत ढाल का काम किया और कीमतों को अनियंत्रित होने से रोका। यदि हम भारत के पड़ोसी मुल्कों की स्थिति का आकलन करें, तो भारतीय बाजार की स्थिति कहीं बेहतर नजर आती है। इस अंतरराष्ट्रीय संकट के दौरान जहां नेपाल और पाकिस्तान जैसे देशों में ईंधन की खुदरा कीमतों में बीस से लेकर सड़सठ प्रतिशत तक का भारी उछाल आया—जिसके कारण वहां पेट्रोल क्रमशः एक सौ छत्तीस रुपये सैंतालीस पैसे और एक सौ उनतालीस रुपये सत्तर पैसे प्रति लीटर तक पहुंच गया—वहीं भारत की राजधानी दिल्ली में यह बढ़ोतरी महज आठ से नौ प्रतिशत के दायरे में सीमित रखी गई। दिल्ली में फिलहाल पेट्रोल एक सौ दो रुपये बारह पैसे और डीजल नब्बे रुपये बीस पैसे प्रति लीटर पर टिका हुआ है। हालांकि, देश के भीतर भी सभी राज्यों की तस्वीर एक जैसी नहीं है। राज्यों द्वारा लगाए जाने वाले स्थानीय वैट की अलग-अलग दरों के कारण खुदरा कीमतों में भारी अंतर है। उदाहरण के लिए, दिल्ली की तुलना में मुंबई में वैट की दरें काफी ऊंची होने की वजह से वहां पेट्रोल की कीमतें एक सौ ग्यारह रुपये अठारह पैसे से लेकर एक सौ ग्यारह रुपये इक्कीस पैसे प्रति लीटर के स्तर को छू रही हैं।
इस आर्थिक दवाब के बीच अब सवाल उठता है कि आम आदमी को इस बोझ से मुक्ति कब और कैसे मिलेगी। विशेषज्ञों के मुताबिक, देश में पेट्रोल-डीजल की कीमतें कम होने के केवल दो ही रास्ते दिखाई देते हैं। पहला रास्ता अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल का स्थायी रूप से सस्ता होना है। राहत की बात यह है कि वैश्विक मोर्चे पर युद्ध और तनाव के बादल थोड़े छंटने से ब्रेंट क्रूड एक सौ पचास डॉलर से गिरकर अब पंचानवे से नब्बे डॉलर प्रति बैरल के आसपास कारोबार कर रहा है। दुनिया की अग्रणी वित्तीय संस्था बार्कलेज का मानना है कि आपूर्ति में मामूली कमी के चलते इस साल औसत कीमत सौ डॉलर प्रति बैरल के आसपास बनी रहेगी। वहीं जेपी मॉर्गन का अनुमान है कि यह कीमत अगले साल तक गिरकर पचहत्तर डॉलर प्रति बैरल के स्तर पर आ सकती है। इसके साथ ही ऊर्जा सूचना प्रशासन यानी ईआईए ने भी संकेत दिए हैं कि वर्ष की तीसरी तिमाही तक बाजार में तेल की प्रचुर उपलब्धता होगी जिससे दाम अस्सी डॉलर से नीचे चले जाएंगे।
लेकिन इस अंतरराष्ट्रीय गिरावट का सीधा फायदा भारतीय उपभोक्ताओं तक पहुंचने में 'इन्वेंट्री लैग' नाम का एक बड़ा तकनीकी रोड़ा है। दरअसल, इंडियन ऑयल, भारत पेट्रोलियम और हिंदुस्तान पेट्रोलियम जैसी भारतीय तेल कंपनियां हमेशा पचास से साठ दिनों का एडवांस बफर स्टॉक खरीदकर रखती हैं। इसका सीधा मतलब यह हुआ कि यदि आज अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चा तेल सस्ता होता है, तो उसका वास्तविक असर भारत के पेट्रोल पंपों पर दिखने में कम से कम दो महीने का समय लगेगा। इस व्यावहारिक गणित के लिहाज से वैश्विक बाजार के भरोसे आम जनता को बड़ी राहत मिलने की सबसे तार्किक उम्मीद आगामी सितंबर के अंत या अक्टूबर के शुरुआती हफ्तों में ही की जा सकती है।
दूसरा और सबसे त्वरित रास्ता सरकारी टैक्स में कटौती का है। यदि अंतरराष्ट्रीय कीमतों को एक तरफ रख दिया जाए, तो सरकारें चाहें तो आज शाम से ही पेट्रोल के दाम आधा कर सकती हैं, क्योंकि हमारे यहां ईंधन की खुदरा कीमत का लगभग आधा हिस्सा सिर्फ केंद्र और राज्य सरकारों के टैक्स से मिलकर बनता है। हालांकि, केंद्र सरकार की ओर से तत्काल राहत की उम्मीद बेहद धुंधली है क्योंकि उसने मार्च के महीने में ही एक्साइज ड्यूटी में दस रुपये प्रति लीटर की बड़ी कटौती की थी, जिससे केंद्रीय राजस्व को एक लाख करोड़ रुपये का सीधा नुकसान उठाना पड़ा था। ऐसे में राहत की असली चाबी अब पूरी तरह से राज्य सरकारों की तिजोरी में बंद है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, जब केंद्र ने अपना टैक्स घटाया, तब अधिकांश राज्यों ने अपने वैट में कोई रियायत नहीं दी, जिससे राज्यों की कमाई में अट्ठावन प्रतिशत की भारी वृद्धि दर्ज की गई। हाल ही में महाराष्ट्र सरकार ने एक बड़ा प्रशासनिक कदम उठाते हुए हवाई जहाज के ईंधन पर वैट को अठारह प्रतिशत से घटाकर सीधे सात प्रतिशत कर दिया है। आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि अगर राज्य सरकारें ऐसा ही साहसिक और जनहितैषी निर्णय पेट्रोल और डीजल के लिए भी लागू कर दें, तो स्थानीय स्तर पर तेल की कीमतें तत्काल प्रभाव से पंद्रह से बीस रुपये प्रति लीटर तक नीचे आ सकती हैं।
यदि हम पिछले कुछ वर्षों के इतिहास पर नजर डालें, तो भारत में पेट्रोल की कीमतों की चाल और टैक्स का ढांचा हमेशा से उतार-चढ़ाव भरा रहा है। वर्ष दो हजार इक्कीस में पेट्रोल की औसत कीमत पंचानवे रुपये इकतालीस पैसे प्रति लीटर थी, जब पहली बार केंद्रीय करों में संशोधन हुआ था। इसके बाद रूस-यूक्रेन युद्ध के बड़े संकट के बावजूद सरकार द्वारा टैक्स प्रबंधन करने से वर्ष दो हजार बाईस में यह दर पचानवे रुपये पर स्थिर रही। वर्ष दो हजार तेईस और चौबीस में वैश्विक उथल-पुथल के बीच यह क्रमशः नब्बे रुपये और सौ रुपये प्रति लीटर के आसपास घूमती रही। लेकिन वर्ष दो हजार पच्चीस में महंगाई के चौतरफा दबाव के बाद यह एक सौ पांच रुपये के पार निकल गई और मौजूदा वर्ष के मई महीने तक आते-आते मुंबई जैसे महानगरों में यह एक सौ ग्यारह रुपये इक्कीस पैसे के ऐतिहासिक स्तर पर पहुंच गई। मुंबई के इस एक सौ ग्यारह रुपये इक्कीस पैसे के पूरे गणित को समझें तो इसमें तेल को विदेश से लाने, रिफाइन करने और कंपनियों के खर्च का आधार मूल्य महज अड़तालीस रुपये तेईस पैसे है, जबकि इस पर सत्ताइस रुपये नब्बे पैसे केंद्रीय उत्पाद शुल्क, तीन रुपये छियासी पैसे डीलर का कमीशन और तीस रुपये उन्नीस पैसे राज्य का वैट और सेस शामिल होता है।
इस पूरे परिदृश्य में अक्सर यह सवाल भी उठाया जाता है कि क्या जनता की बेबसी का फायदा उठाकर तेल कंपनियां मोटा मुनाफा कूट रही हैं। वित्तीय बहीखातों के अनुसार, इन कंपनियों ने चालू वित्त वर्ष में सतहत्तर हजार आठ सौ इक्कीस करोड़ रुपये का शुद्ध लाभ जरूर कमाया है, लेकिन इस मुनाफे के पीछे छिपी हकीकत को समझना भी जरूरी है। ये तेल कंपनियां सालाना लगभग बीस लाख करोड़ रुपये का विशाल कारोबार करती हैं, और इस महाकाय टर्नओवर के मुकाबले उनका वास्तविक प्रॉफिट मार्जिन महज तीन से चार प्रतिशत ही बैठता है, जो तेल जैसे अत्यधिक जोखिम वाले वैश्विक व्यवसाय में बेहद सामान्य माना जाता है। इसके अलावा, संकट के शुरुआती दौर में जब सरकार ने घरेलू बाजार में कीमतों को बढ़ने से रोक दिया था, तब इन कंपनियों को प्रतिदिन करीब एक हजार करोड़ रुपये का भारी नुकसान उठाना पड़ रहा था। वर्तमान में हुई मूल्य बढ़ोतरी के बाद कंपनियों का यह दैनिक घाटा घटकर अब छह सौ करोड़ रुपये प्रतिदिन रह गया है। सीधे शब्दों में कहें तो जब तक तेल कंपनियों का यह पुराना और दैनिक अंडर-रिकवरी का घाटा पूरी तरह से शून्य नहीं हो जाता, तब तक वे अपनी तरफ से खुदरा कीमतों में कटौती करने की स्थिति में बिल्कुल नहीं होंगी।
इस संकट से निपटने और भविष्य में देश की ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए सरकार ने कुछ बेहद महत्वपूर्ण रणनीतिक और कानूनी कदम भी उठाए हैं। देश के भीतर ईंधन की कोई किल्लत न पैदा हो, इसके लिए सरकार ने पेट्रोल के निर्यात यानी इसे विदेशों में बेचने पर तीन रुपये प्रति लीटर का अतिरिक्त टैक्स लगा दिया है, ताकि रिफाइनर पहले घरेलू बाजार की मांग को पूरा करें। इसके साथ ही, भारत की धरती और समुद्री क्षेत्रों से कच्चे तेल का घरेलू उत्पादन बढ़ाने के लिए सरकार ने तेल खोजक कंपनियों को बड़ी राहत दी है। सरकार ने अपतटीय यानी समुद्र से तेल निकालने पर रॉयल्टी को नौ दशमलव शून्य नौ प्रतिशत से घटाकर सीधे आठ प्रतिशत और ऑनशोर यानी जमीन से तेल निकालने पर रॉयल्टी को सोलह दशमलव छियासी प्रतिशत से घटाकर सीधे दस प्रतिशत कर दिया है, ताकि देश की विदेशी तेल पर निर्भरता को कम किया जा सके।
इस पूरे आर्थिक और राजनीतिक घटनाक्रम का लब्बोलुआब यही है कि पेट्रोल-डीजल की कीमतों में राहत का ऊंट अब दो अलग-अलग करवटें ले सकता है। पहली, अल्पकालिक या तत्काल राहत जो पूरी तरह से देश की राज्य सरकारों की इच्छाशक्ति पर निर्भर करती है। यदि राज्य सरकारें अपने राजस्व हितों से थोड़ा समझौता कर वैट की दरों में कटौती करती हैं, तो आम जनता को इसी हफ्ते से पंद्रह से बीस रुपये की बड़ी राहत मिल सकती है। दूसरी तरफ, एक स्थायी और दीर्घकालिक राहत के लिए हमें सितंबर और अक्टूबर के महीनों का इंतजार करना होगा, जब अंतरराष्ट्रीय बाजार का सस्ता तेल भारतीय रिफाइनरियों के इन्वेंट्री चक्र में शामिल होगा और तेल कंपनियों का संचित घाटा पूरी तरह समाप्त हो जाएगा। तभी देश के आम नागरिक को आगामी त्योहारों के सीजन में ईंधन की इन तपती कीमतों से एक वास्तविक और स्थायी निजात मिल सकेगी।

Ashiti Joil
यह प्रातःकाल में कंटेंट रायटर अँड एडिटर के पद पर कार्यरत हैं। यह गए 3 सालों से पत्रकारिता और डिजिटल मीडिया में सक्रिय हैं। इन्होंने लोकसत्ता, टाईम महाराष्ट्र, PR और हैट मीडिया में सोशल मीडिया कंटेंट रायटर के तौर पर काम किया है। इन्होंने मराठी साहित्य में मास्टर डिग्री पूर्ण कि है और अभी ये यूनिवर्सिटी के गरवारे इंस्टीट्यूड में PGDMM (Marthi Journalism) कर रही है। यह अब राजकरण, बिजनेस , टेक्नोलॉजी , मनोरंजन और क्रीड़ा इनके समाचार बनती हैं।
