Petrol Diesel price hike after elections 2026 : वैश्विक भू-राजनीति के अशांत गलियारों से उठ रही चिंगारी अब भारतीय रसोई और परिवहन की जेब तक पहुँचने के लिए तैयार है। अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव ने अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल के बाजार में ऐसी उथल-पुथल मचाई है कि भारतीय सरकारी तेल कंपनियों के लिए पेट्रोल और डीजल की बिक्री अब मुनाफे के बजाय गहरे घाटे का सौदा साबित हो रही है। ताजा आंकड़ों और बाजार विश्लेषणों के अनुसार, मौजूदा वैश्विक परिस्थितियों में तेल कंपनियों को पेट्रोल पर करीब 18 रुपये और डीजल पर लगभग 35 रुपये प्रति लीटर का भारी नुकसान उठाना पड़ रहा है। यह स्थिति न केवल आर्थिक रूप से चिंताजनक है, बल्कि एक बड़े मूल्य वृद्धि के संकेत भी दे रही है जो आम आदमी की वित्तीय योजना को झकझोर सकती है।

यद्यपि भारत में पेट्रोल-डीजल की कीमतें बाजार आधारित व्यवस्था के तहत तय होती हैं, लेकिन इंडियन ऑयल, भारत पेट्रोलियम और हिंदुस्तान पेट्रोलियम जैसी प्रमुख कंपनियों ने अप्रैल 2022 के बाद से रिटेल कीमतों में कोई बड़ा बदलाव नहीं किया है। रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद जब कच्चे तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल के पार चली गईं, तब से तेल कंपनियों का घाटा बढ़ता ही जा रहा है। साल 2026 की शुरुआत में कीमतों में कुछ नरमी जरूर आई थी, लेकिन मिडिल ईस्ट के ताजा तनाव ने एक बार फिर कच्चे तेल को 100 डॉलर प्रति बैरल के ऊपर स्थिर कर दिया है। वर्तमान में सरकारी तेल कंपनियों को प्रतिदिन करीब 1,600 करोड़ रुपये का घाटा झेलना पड़ रहा है, जो पिछले महीने तक 2,400 करोड़ रुपये के भयावह स्तर पर था।

इस घाटे को संतुलित करने के लिए केंद्र सरकार ने उत्पाद शुल्क (Excise Duty) में 10 रुपये प्रति लीटर की कटौती जैसे कदम उठाए हैं, ताकि उपभोक्ताओं पर तत्काल बोझ न पड़े। हालांकि, 'मैक्वेरी ग्रुप' (Macquarie Group) की हालिया रिपोर्ट ने एक चौंकाने वाला दावा किया है। रिपोर्ट के अनुसार, पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु जैसे महत्वपूर्ण राज्यों में विधानसभा चुनाव संपन्न होने के बाद तेल की कीमतों में भारी उछाल आना लगभग तय है। रिपोर्ट स्पष्ट रूप से आगाह करती है कि अप्रैल के बाद पेट्रोल पंपों पर दाम बढ़ने का जोखिम अत्यधिक है। इसका अर्थ यह है कि सरकार ने फिलहाल चुनावी संवेदनशीलता को देखते हुए कीमतों को स्थिर रखा है, लेकिन राजनीतिक गतिविधियों के शांत होते ही महंगाई का बड़ा झटका लगना तय माना जा रहा है।

ईंधन की कीमतों में यह संभावित वृद्धि केवल वाहनों तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि माल ढुलाई महंगी होने से दैनिक उपयोग की वस्तुओं और खाद्य पदार्थों के दामों में भी आग लगाएगी। सरकार के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की अनिश्चितता और घरेलू मुद्रास्फीति के बीच संतुलन साधने की है। यदि वैश्विक तनाव जल्द कम नहीं हुआ, तो चुनाव के बाद होने वाली यह मूल्य वृद्धि भारतीय अर्थव्यवस्था और मध्यम वर्ग के लिए एक बड़ी परीक्षा साबित होगी। अब देखना यह है कि क्या सरकार कोई और वित्तीय समाधान निकालती है या फिर आम जनता को इस 'महंगाई बम' का सामना करने के लिए तैयार रहना होगा।

Ashiti Joil

Ashiti Joil

यह प्रातःकाल में कंटेंट रायटर अँड एडिटर के पद पर कार्यरत हैं। यह गए 3 सालों से पत्रकारिता और डिजिटल मीडिया में सक्रिय हैं। इन्होंने लोकसत्ता, टाईम महाराष्ट्र, PR और हैट मीडिया में सोशल मीडिया कंटेंट रायटर के तौर पर काम किया है। इन्होंने मराठी साहित्य में मास्टर डिग्री पूर्ण कि है और अभी ये यूनिवर्सिटी के गरवारे इंस्टीट्यूड में PGDMM (Marthi Journalism) कर रही है। यह अब राजकरण, बिजनेस , टेक्नोलॉजी , मनोरंजन और क्रीड़ा इनके समाचार बनती हैं।

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