NSE के 4 इंडेक्स में बड़ा बदलाव; नए लॉट साइज से ट्रेडिंग हुई आसान
नेशनल स्टॉक एक्सचेंज ने निफ्टी 50, निफ्टी बैंक समेत चार प्रमुख सूचकांकों के लॉट साइज घटाने का फैसला लिया है, जो दिसंबर 2025 के बाद लागू होगा। एनालिस्ट्स के मुताबिक, इससे कॉन्ट्रैक्ट्स की नोशनल वैल्यू घटेगी, लिक्विडिटी बढ़ेगी, लेकिन एफएंडओ ट्रेडिंग का जोखिम कम नहीं होगा।

indian stock market derivatives rule change 2025 : डेरिवेटिव मार्केट में कारोबार करने वाले ट्रेडर्स के लिए नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) ने एक अहम बदलाव का ऐलान किया है। एनएसई ने निफ्टी 50 समेत चार प्रमुख सूचकांकों के लॉट साइज में कटौती करने का फैसला लिया है, जो दिसंबर 2025 के एक्सपायरी साइकिल के बाद लागू होगा। यह फैसला अक्तूबर महीने में सार्वजनिक किया गया था और अब इसे लेकर ट्रेडिंग समुदाय में चर्चाएं तेज हो गई हैं।
एनएसई के मुताबिक, निफ्टी 50 का लॉट साइज 75 से घटाकर 65 कर दिया गया है। इसी तरह निफ्टी बैंक का लॉट साइज 35 से घटकर 30, निफ्टी फाइनेंशियल सर्विसेज का 65 से घटाकर 60 और निफ्टी मिडकैप सेलेक्ट का लॉट साइज 140 से घटाकर 120 कर दिया गया है। हालांकि, निफ्टी नेक्स्ट 50 के लॉट साइज में कोई बदलाव नहीं किया गया है। यह संशोधन जनवरी 2026 से शुरू होने वाले वीकली और मंथली कॉन्ट्रैक्ट्स में दिखाई देगा।
मार्केट एक्सपर्ट्स का कहना है कि इस बदलाव का सीधा असर कॉन्ट्रैक्ट्स की नोशनल वैल्यू पर पड़ेगा। Vibhavangal Anukulakara के फाउंडर और मैनेजिंग डायरेक्टर सिद्धार्थ मौर्य के अनुसार, लॉट साइज घटने से कॉन्ट्रैक्ट की कुल वैल्यू कम होगी, जिससे ट्रेडर्स को पहले के मुकाबले कम पूंजी लगानी पड़ेगी। हालांकि, इसके साथ ही उन्हें अपनी पोजीशन साइज और मार्जिन स्ट्रक्चर को नए सिरे से एडजस्ट करना होगा। उनका मानना है कि यह बदलाव एफएंडओ सेगमेंट में ट्रेड करने वालों के लिए कई मामलों में सकारात्मक साबित हो सकता है।
अन्य एनालिस्ट्स भी इस बात पर सहमत हैं कि लॉट साइज में कटौती से गणनाएं जरूर बदलेंगी, लेकिन जोखिम का मूल स्वरूप वही रहेगा। उनका कहना है कि कॉन्ट्रैक्ट्स छोटे होने से लिक्विडिटी बढ़ेगी, मार्केट डेप्थ बेहतर होगी और एग्जिक्यूशन आसान होगा, लेकिन इससे एफएंडओ ट्रेडिंग का रिस्क अपने आप कम नहीं हो जाएगा। सेबी के आंकड़ों के मुताबिक, डेरिवेटिव सेगमेंट में करीब 90 फीसदी रिटेल ट्रेडर्स को नुकसान उठाना पड़ता है, ऐसे में केवल लॉट साइज घटने से जोखिम समाप्त नहीं होता।
इस बदलाव का असर रिटेल इनवेस्टर्स और ऑप्शन ट्रेडर्स पर अलग-अलग तरीके से पड़ सकता है। रिटेल निवेशकों के लिए एफएंडओ में एंट्री अपेक्षाकृत आसान हो जाएगी, क्योंकि अब पहले की तुलना में कम पूंजी की जरूरत होगी। वहीं, ऑप्शन सेलर्स को सावधान रहने की सलाह दी जा रही है, क्योंकि लॉट साइज घटने से उनकी ट्रांजैक्शन कॉस्ट बढ़ सकती है।
कुल मिलाकर, एनएसई का यह कदम डेरिवेटिव मार्केट की संरचना में एक महत्वपूर्ण बदलाव के तौर पर देखा जा रहा है। इससे बाजार में भागीदारी बढ़ने और ट्रेडिंग गतिविधियों में सुधार की उम्मीद है, लेकिन विशेषज्ञों का स्पष्ट संदेश है कि छोटे लॉट का मतलब कम जोखिम नहीं है। आने वाले समय में ट्रेडर्स के लिए अनुशासन, जोखिम प्रबंधन और सही रणनीति पहले से कहीं अधिक अहम हो जाएगी।

Ashiti Joil
यह प्रातःकाल में कंटेंट रायटर अँड एडिटर के पद पर कार्यरत हैं। यह गए 3 सालों से पत्रकारिता और डिजिटल मीडिया में सक्रिय हैं। इन्होंने लोकसत्ता, टाईम महाराष्ट्र, PR और हैट मीडिया में सोशल मीडिया कंटेंट रायटर के तौर पर काम किया है। इन्होंने मराठी साहित्य में मास्टर डिग्री पूर्ण कि है और अभी ये यूनिवर्सिटी के गरवारे इंस्टीट्यूड में PGDMM (Marthi Journalism) कर रही है। यह अब राजकरण, बिजनेस , टेक्नोलॉजी , मनोरंजन और क्रीड़ा इनके समाचार बनती हैं।
