NAAS Brainstorming Session New Delhi : भारत को कृषि क्षेत्र में वैश्विक शक्ति बनाने और उर्वरकों के आयात पर पड़ने वाले भारी बोझ को कम करने के लिए एक निर्णायक पहल की गई है। नेशनल एकेडमी ऑफ एग्रीकल्चरल साइंसेज (NAAS) द्वारा आयोजित एक उच्च स्तरीय 'ब्रेनस्टॉर्मिंग' सत्र में देश के अग्रणी वैज्ञानिकों, नीति निर्माताओं, उद्योग जगत के दिग्गजों और किसान प्रतिनिधियों ने शिरकत की। इस सत्र का एकमात्र उद्देश्य भारत को उर्वरक क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाने के लिए एक ठोस और दीर्घकालिक ब्लूप्रिंट तैयार करना था। बैठक की गंभीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि यहाँ केवल पारंपरिक खेती ही नहीं, बल्कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और सेंसर आधारित प्रिसिजन फार्मिंग जैसी भविष्यवादी तकनीकों पर भी विस्तृत चर्चा हुई।

बैठक के केंद्र में रहे प्रख्यात कृषि वैज्ञानिक एम. एल. जाट ने स्पष्ट किया कि वर्ष 2047 तक 'विकसित भारत' के संकल्प को पूरा करने में कृषि क्षेत्र की भूमिका आधारशिला के समान होगी। भारत वर्तमान में प्रतिवर्ष लगभग 33 मिलियन टन उर्वरकों का उपभोग कर रहा है, जिसका एक बड़ा हिस्सा विदेशी मुद्रा खर्च कर आयात किया जाता है। विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि वैश्विक भू-राजनीतिक अस्थिरता के बीच आयात पर यह निर्भरता देश की खाद्य सुरक्षा के लिए जोखिम बन सकती है। इस चुनौती से निपटने के लिए संतुलित उर्वरक उपयोग, मिट्टी की उर्वरता को पुनर्जीवित करने और किसानों को जमीनी स्तर पर शिक्षित करने को सबसे महत्वपूर्ण स्तंभ माना गया है।

तकनीकी क्रांति के इस दौर में कृषि को पीछे नहीं छोड़ा जा सकता, इसीलिए इस रणनीतिक सत्र में 'इंटीग्रेटेड न्यूट्रिएंट सप्लाई एंड मैनेजमेंट' (INSAM) को मिशन मोड में लागू करने का प्रस्ताव रखा गया है। इसका उद्देश्य अगले तीन वर्षों के भीतर कम से कम 25 प्रतिशत रासायनिक उर्वरकों को हटाकर उनके स्थान पर जैविक खाद और पर्यावरण के अनुकूल विकल्पों को स्थापित करना है। कचरे से कंचन बनाने यानी 'वेस्ट-टू-वेल्थ' की अवधारणा को बढ़ावा देते हुए फसल विविधीकरण और मिट्टी के माइक्रोबायोम के बेहतर प्रबंधन पर भी जोर दिया गया है, ताकि मिट्टी की प्राकृतिक उत्पादन क्षमता को बढ़ाया जा सके और रसायनों की आवश्यकता को न्यूनतम किया जा सके।

नीतिगत स्तर पर भी बड़े बदलावों की सिफारिश की गई है, जो आने वाले समय में देश की कृषि अर्थव्यवस्था की दिशा बदल सकते हैं। विशेषज्ञों ने सुझाव दिया है कि यूरिया को भी अब 'न्यूट्रिएंट बेस्ड सब्सिडी' (NBS) के दायरे में लाया जाना चाहिए ताकि इसका अनियंत्रित उपयोग रुक सके। इसके अलावा, उर्वरक सब्सिडी को सीधे तौर पर 'मिट्टी स्वास्थ्य कार्ड' (Soil Health Card) से जोड़ने और किसानों को सीधे नकद सहायता हस्तांतरण (DBT) करने जैसे क्रांतिकारी प्रस्तावों पर भी चर्चा हुई। वर्तमान में उर्वरकों का असंतुलित उपयोग न केवल सरकारी खजाने पर आर्थिक बोझ बढ़ा रहा है, बल्कि मिट्टी की गुणवत्ता को भी नष्ट कर रहा है। यह बैठक भारत को उर्वरक क्षेत्र में एक स्वावलंबी राष्ट्र बनाने की दिशा में न केवल एक संवाद है, बल्कि एक व्यापक कार्ययोजना की ठोस शुरुआत है।

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Ashiti Joil

Ashiti Joil

यह प्रातःकाल में कंटेंट रायटर अँड एडिटर के पद पर कार्यरत हैं। यह गए 3 सालों से पत्रकारिता और डिजिटल मीडिया में सक्रिय हैं। इन्होंने लोकसत्ता, टाईम महाराष्ट्र, PR और हैट मीडिया में सोशल मीडिया कंटेंट रायटर के तौर पर काम किया है। इन्होंने मराठी साहित्य में मास्टर डिग्री पूर्ण कि है और अभी ये यूनिवर्सिटी के गरवारे इंस्टीट्यूड में PGDMM (Marthi Journalism) कर रही है। यह अब राजकरण, बिजनेस , टेक्नोलॉजी , मनोरंजन और क्रीड़ा इनके समाचार बनती हैं।

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