आंतरराष्ट्रीय मंच पर कैसे होती है फलों की निर्यात ? जानें क्या है पैकहाउस और VHT की पूरी प्रक्रिया
भारत से आम निर्यात के लिए फाइटोसेनेटरी सर्टिफिकेट, हॉट वाटर ट्रीटमेंट, एमआरएल जांच और ग्लोबल गैप प्रमाण-पत्र जैसी सख्त शर्तें पूरी करनी होंगी।

भारतीय फलों को विदेशी बाजारों में भेजने के लिए पैकेजिंग, ग्रेडिंग और कड़े गुणवत्ता परीक्षणों से गुजरना पड़ता है। यह ग्राफिक्स अंतरराष्ट्रीय स्तर पर होने वाले फल निर्यात की एक सांकेतिक प्रक्रिया को दर्शाता है।
Mango export process from India : भारतीय आमों की मिठास और खुशबू का जादू दुनिया भर के लोगों के सिर चढ़कर बोलता है। 'फलों के राजा' का स्वाद चखने के लिए सात समंदर पार बैठे लोग भी बेताब रहते हैं। हालांकि, भारत के बगीचों से निकलकर विदेशी सुपरमार्केट्स के चमचमाते काउंटरों तक पहुँचने का यह सफर बेहद पेचीदा और अग्निपरीक्षा जैसा होता है। विदेशी बाजारों में भारतीय आम के इस निर्यात के पीछे अंतरराष्ट्रीय मानकों का एक ऐसा सख्त जाल है, जिसे पार करने के बाद ही कोई आम वैश्विक स्तर पर अपनी पहचान बना पाता है। आयातक देशों के कड़े नियमों, गुणवत्ता की बारीकियों और कीट-मुक्त होने की सख्त शर्तों का पालन करने के बाद ही भारतीय आम विदेशी थाली की शोभा बनते हैं।
इस जटिल और गौरवमयी निर्यात प्रक्रिया को सुगम बनाने में कृषि और प्रसंस्कृत खाद्य उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण अर्थात एपीडा (APEDA) एक रीढ़ की हड्डी की तरह काम करता है। एपीडा की आधिकारिक वेबसाइट पर इस पूरी निर्यात प्रक्रिया और आवश्यक प्रमाण-पत्रों का विस्तृत ब्यौरा उपलब्ध है, जो भारतीय निर्यातकों को वैश्विक मानकों पर खरा उतरने का मार्ग प्रशस्त करता है। निर्यात की इस डगर में सबसे पहला और सबसे महत्वपूर्ण पड़ाव पादप स्वच्छता मानक यानी फाइटोसेनेटरी स्टैंडर्ड्स का होता है। अंतरराष्ट्रीय व्यापार के तहत यह पूरी तरह सुनिश्चित किया जाता है कि भारतीय फलों के साथ कोई भी हानिकारक कीड़ा या बीमारी दूसरे देश की धरती पर कदम न रख सके।
इस कड़े सुरक्षा चक्र के तहत आमों को कई तरह के वैज्ञानिक उपचारों से गुजरना पड़ता है। सबसे पहले फलों को एक निश्चित और नियंत्रित तापमान, जो आमतौर पर 48°C से 52°C के बीच होता है, के गर्म पानी में डुबोया जाता है। इस 'हॉट वाटर ट्रीटमेंट' का मुख्य उद्देश्य एन्थ्रेक्नोज जैसी खतरनाक फफूंद और अन्य बैक्टीरिया का समूल नाश करना होता है। इसके बाद आम के सबसे बड़े दुश्मन यानी 'फल मक्खी' (Fruit Fly) को खत्म करने के लिए 'वाष्प ताप उपचार' (Vapor Heat Treatment - VHT) का सहारा लिया जाता है, जहाँ फलों को गर्म भाप से उपचारित किया जाता है। अमेरिका जैसे महाशक्ति देशों की बात करें, तो वहाँ निर्यात करने से पहले आमों को कोबाल्ट-60 जैसे उन्नत स्रोतों से गामा किरणों द्वारा 'विकिरण उपचार' (Irradiation) दिया जाता है, जिससे कीटाणुओं के बचने की गुंजाइश पूरी तरह खत्म हो जाती है।
सिर्फ कीड़े-मकोड़े ही नहीं, बल्कि फलों पर रसायनों का अत्यधिक उपयोग भी अंतरराष्ट्रीय बाजारों में पूरी तरह प्रतिबंधित है। इसके लिए आयातक देशों द्वारा हर फल के लिए एक अधिकतम कीटनाशक अवशेष सीमा यानी एमआरएल (MRL) निर्धारित की जाती है। भारत की अत्याधुनिक प्रयोगशालाओं में आम के नमूनों की गहन रासायनिक जांच होती है, जहाँ यह देखा जाता है कि कीटनाशकों का स्तर तय सीमा यानी पार्ट्स प्रति मिलियन (ppm) के भीतर ही हो। इसके साथ ही, फलों का भौतिक रूप भी उतना ही उत्कृष्ट होना चाहिए। ग्रेडिंग प्रक्रिया के दौरान फलों को उनके सटीक वजन और आकार के आधार पर ए, बी और सी जैसी श्रेणियों में विभाजित किया जाता है। इस दौरान यह भी सुनिश्चित किया जाता है कि फलों पर कोई घाव, दाग-धब्बा या सड़न न हो और वे न तो अत्यधिक कच्चे हों और न ही बहुत ज्यादा पके, ताकि लंबी समुद्री या हवाई यात्रा के दौरान वे अपनी ताजगी न खोएं।
वैज्ञानिक दृष्टिकोण से आमों के स्वाद की प्रामाणिकता मापने के लिए उनके रासायनिक परीक्षण और पोषण मान को भी आंका जाता है। इसमें 'टोटल सॉल्युबल सॉलिड्स' (TSS) के जरिए आमों की मिठास के स्तर यानी ब्रिक्स वैल्यू को मापा जाता है और साथ ही एसिडिटी के स्तर की जांच करके स्वाद के सटीक संतुलन को परखा जाता है। जब आम इन सभी कड़े पैमानों पर खरे उतर जाते हैं, तब बारी आती है उनकी सुरक्षित पैकेजिंग की। अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप हवा के आवागमन के लिए डिब्बों में विशेष वेंटिलेशन यानी छेद रखे जाते हैं, ताकि फल ताजे बने रहें। इन डिब्बों पर उत्पाद का नाम, उत्पादक का पूरा विवरण, बैच नंबर, पैकिंग की तारीख और गर्व से चमकता हुआ 'प्रोडक्ट ऑफ इंडिया' (भारत में निर्मित) का लेबल लगाना अनिवार्य होता है।
इस पूरी प्रक्रिया को कानूनी और आधिकारिक मान्यता देने के लिए कई अनिवार्य दस्तावेजों की आवश्यकता होती है। इसमें सबसे प्रमुख सरकारी कृषि विभाग द्वारा जारी किया जाने वाला 'फाइटोसेनेटरी सर्टिफिकेट' है, जो इस बात का कानूनी प्रमाण है कि फल पूरी तरह से कीट-मुक्त और मानव स्वास्थ्य के लिए सुरक्षित हैं। इसके अतिरिक्त, प्रत्येक निर्यातक के पास एपीडा का पंजीकरण होना अनिवार्य है। साथ ही, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अच्छी कृषि प्रथाओं को प्रमाणित करने वाला 'ग्लोबल गैप' (GLOBALG.A.P) प्रमाण-पत्र भी इस बात की गवाही देता है कि इन आमों की खेती वैश्विक मानकों के अनुरूप सुरक्षित माहौल में की गई है। अंततः, इन तमाम अग्निपरीक्षाओं से गुजरकर जब भारतीय आम विदेशी बाजारों में पहुँचता है, तो वह केवल एक फल नहीं, बल्कि भारत की कृषि शक्ति, वैज्ञानिक आत्मनिर्भरता और उच्च गुणवत्ता का एक वैश्विक प्रतीक बनकर उभरता है।

Ashiti Joil
यह प्रातःकाल में कंटेंट रायटर अँड एडिटर के पद पर कार्यरत हैं। यह गए 3 सालों से पत्रकारिता और डिजिटल मीडिया में सक्रिय हैं। इन्होंने लोकसत्ता, टाईम महाराष्ट्र, PR और हैट मीडिया में सोशल मीडिया कंटेंट रायटर के तौर पर काम किया है। इन्होंने मराठी साहित्य में मास्टर डिग्री पूर्ण कि है और अभी ये यूनिवर्सिटी के गरवारे इंस्टीट्यूड में PGDMM (Marthi Journalism) कर रही है। यह अब राजकरण, बिजनेस , टेक्नोलॉजी , मनोरंजन और क्रीड़ा इनके समाचार बनती हैं।
