भारत की तेल आयात रणनीति में बड़ा बदलाव

नई दिल्ली: भारत की ऊर्जा सुरक्षा और कच्चे तेल के आयात की रणनीति अब एक नए और नपे-तुले दौर में प्रवेश कर रही है। पिछले दो सालों से भारतीय रिफाइनरियों की पहली पसंद बना रूस अब थोड़ा पीछे खिसकता दिख रहा है, जबकि सऊदी अरब के नेतृत्व में मिडिल ईस्ट के देश एक बार फिर भारतीय बाजार में अपनी मजबूत वापसी कर रहे हैं।

शिपिंग डेटा और विश्लेषकों के ताजा आंकड़े बताते हैं कि यह बदलाव अचानक नहीं हुआ है, बल्कि यह अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों और बदलती भू-राजनीतिक स्थितियों का नतीजा है।

आंकड़ों की जुबानी: क्या कह रही है गिरावट?

1 से 18 फरवरी 2026 के दौरान, भारत का कुल कच्चा तेल आयात औसतन 4.85 मिलियन बैरल प्रति दिन (bpd) रहा। यह जनवरी के 5.25 मिलियन bpd के मुकाबले लगभग 8 प्रतिशत कम है।

रूस से आने वाले तेल की बात करें तो:

  • दिसंबर 2025: 1.28 मिलियन bpd
  • जनवरी 2026: 1.22 मिलियन bpd
  • फरवरी (शुरुआती): 1.09 मिलियन bpd

विशेषज्ञों का अनुमान है कि मार्च तक रूसी तेल का आयात गिरकर 8 लाख से 10 लाख bpd के बीच रह सकता है। 2022 में यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद भारत ने सस्ते रूसी तेल पर जो निर्भरता बढ़ाई थी, वह अब धीरे-धीरे कम होकर एक स्थिर स्तर (Baseload) पर आ रही है।

सऊदी अरब की 'नंबर-1' की गद्दी पर वापसी

जैसे ही रूसी तेल की आवक कम हुई, सऊदी अरब ने उस कमी को पूरा करना शुरू कर दिया। फरवरी में सऊदी अरब से भारत आने वाला तेल 1 मिलियन से 1.1 मिलियन bpd तक पहुँचने की उम्मीद है। दिलचस्प बात यह है कि फरवरी के शुरुआती दिनों में यह आंकड़ा 1.4 मिलियन bpd तक भी छुआ, जो नवंबर 2019 के बाद का सबसे उच्चतम स्तर है।

वर्तमान रुझानों के अनुसार, फरवरी 2026 में सऊदी अरब भारत का शीर्ष तेल आपूर्तिकर्ता (Top Supplier) बन गया है, जिसके बाद रूस और इराक का नंबर आता है।

क्यों बदल रहे हैं हालात? (प्रमुख कारण)

इस बदलाव के पीछे केवल कीमत ही नहीं, बल्कि कई गहरे कारण हैं:

  • कड़े प्रतिबंध: अमेरिका और यूरोपीय संघ (EU) द्वारा रूसी निर्यातकों पर लगाए गए नए प्रतिबंधों के कारण रूसी तेल की खरीद अब पहले जितनी आसान नहीं रही।
  • अनुपालन और कागजी कार्रवाई: अंतरराष्ट्रीय नियमों और 'कंपलायंस' के कारण अब शुद्ध मुनाफे के बजाय सुरक्षा और नियमों को प्राथमिकता दी जा रही है।
  • अमेरिका-भारत समझ: रिपोर्ट्स के अनुसार, भारत और अमेरिका के बीच एक व्यावहारिक समझ बनी है, जिसके तहत भारत अपनी जरूरत भर का रूसी तेल तो खरीदेगा, लेकिन इसे एक सीमा से ज्यादा नहीं बढ़ाएगा।
  • लॉजिस्टिक्स और शिपिंग: लाल सागर के संकट और अंतरराष्ट्रीय शिपिंग बाधाओं ने भी रूसी तेल की ढुलाई को थोड़ा महंगा और जटिल बना दिया है।

गुजरात की वाडिनार रिफाइनरी का संकट

रूसी तेल के आयात में एक बड़ा केंद्र गुजरात की वाडिनार रिफाइनरी है। इस रिफाइनरी में रूस की कंपनी 'रोजनेफ्ट' की बड़ी हिस्सेदारी है। यूरोपीय संघ के प्रतिबंधों के कारण इस यूनिट को अन्य आपूर्तिकर्ताओं से तेल मिलना बंद हो गया है, इसलिए यह पूरी तरह से रूसी कच्चे तेल पर निर्भर है। रिफाइनरी के संचालन को जारी रखने के लिए रूसी तेल का एक निश्चित हिस्सा भारत आता रहेगा।

क्या होगा आपकी जेब पर असर?

मार्केट एक्सपर्ट सुमित रितोलिया (Kpler) के अनुसार, रूस से तेल कम करने और मिडिल ईस्ट से ज्यादा तेल खरीदने पर कच्चे तेल की लागत $2 से $3 प्रति बैरल बढ़ सकती है। हालांकि, भारत अब वेनेजुएला जैसे देशों से सस्ता तेल खरीदकर इस घाटे को कम करने की कोशिश कर रहा है, लेकिन वेनेजुएला की अपनी उत्पादन सीमाएं और लॉजिस्टिक समस्याएं हैं।

भारत अब 'एक देश' पर निर्भर रहने के बजाय अपनी तेल आपूर्ति के स्रोतों में विविधता ला रहा है। रूस का तेल अभी भी भारत के लिए महत्वपूर्ण है, लेकिन अब सऊदी अरब और अन्य खाड़ी देशों के साथ पुराने रिश्तों को फिर से मजबूती दी जा रही है। यह रणनीति न केवल भारत की ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करती है, बल्कि अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत की निष्पक्ष आर्थिक नीति को भी दर्शाती है।

डिस्क्लेमर: यह खबर केवल सामान्य जानकारी है, वित्तीय सलाह नहीं; बाजार के उतार-चढ़ाव और जोखिमों को देखते हुए निवेश का निर्णय अपने सर्टिफाइड एक्सपर्ट की सलाह पर ही लें।

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