ब्रिक्स के डिजिटल भविष्य पर भारत की बड़ी चाल: RBI ने सरकार को सौंपा 'डिजिटल मुद्रा' का मास्टरप्लान
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने सरकार से ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के मुख्य एजेंडे में 'डिजिटल मुद्रा' (CBDC) को शामिल करने की सिफारिश की है। डॉलर पर निर्भरता कम करने और सीमा पार भुगतान को आसान बनाने के लिए भारत की यह पहल वैश्विक बैंकिंग व्यवस्था में बड़ा बदलाव ला सकती है। जानिए आरबीआई के इस मास्टरप्लान के मुख्य बिंदु और इसका वैश्विक असर।

क्या वैश्विक अर्थव्यवस्था का नया केंद्र अब पारंपरिक डॉलर की जगह 'बिट्स और बाइट्स' में सिमटने वाला है? भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने सरकार को एक ऐसा प्रस्ताव भेजा है जो न केवल ब्रिक्स (BRICS) देशों के व्यापारिक समीकरण बदल सकता है, बल्कि वैश्विक मुद्रा बाजार में भारत के वर्चस्व की नई इबारत लिख सकता है।"
अर्थव्यवस्था की नई बिसात: डिजिटल रुपया और ब्रिक्स एजेंडा
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने भारत सरकार से एक महत्वपूर्ण और रणनीतिक सिफारिश की है, जिसमें आगामी ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के एजेंडे में 'सेंट्रल बैंक डिजिटल करेंसी' (CBDC) या डिजिटल मुद्रा के मुद्दे को प्राथमिकता से शामिल करने का आग्रह किया गया है। केंद्रीय बैंक का मानना है कि 2026 की बदलती आर्थिक परिस्थितियों में ब्रिक्स देशों के बीच एक साझा डिजिटल भुगतान नेटवर्क समय की मांग है।
यह प्रस्ताव उस समय आया है जब दुनिया भर की अर्थव्यवस्थाएं 'डी-डॉलराइजेशन' (डॉलर पर निर्भरता कम करने) की ओर कदम बढ़ा रही हैं। आरबीआई ने स्पष्ट किया है कि भारत का 'ई-रुपया' इस दिशा में एक गेम-चेंजर साबित हो सकता है।
मुख्य सिफारिशें और रणनीतिक बिंदु
आरबीआई द्वारा सरकार को भेजे गए इस प्रस्ताव में कई गंभीर पहलुओं को रेखांकित किया गया है, जो भारत को ब्रिक्स समूह के भीतर एक तकनीकी मार्गदर्शक के रूप में स्थापित करते हैं:
- सीमा पार भुगतान (Cross-border Payments): वर्तमान में अंतरराष्ट्रीय लेनदेन में लगने वाले समय और भारी शुल्क को कम करने के लिए ब्रिक्स देशों के बीच डिजिटल मुद्रा के सीधे हस्तांतरण का प्रस्ताव।
- स्वदेशी भुगतान तंत्र: स्विफ्ट (SWIFT) जैसे पश्चिमी प्रणालियों पर निर्भरता कम करने के लिए एक वैकल्पिक 'ब्रिक्स-पे' (BRICS-Pay) बुनियादी ढांचे का विकास, जिसमें भारत का यूपीआई और सीबीडीसी मॉडल केंद्र में हो।
- इंसुलिन जैसी तरलता: व्यापारिक सुगमता के लिए डिजिटल मुद्रा का उपयोग करके सदस्य देशों (ब्राजील, रूस, भारत, चीन, दक्षिण अफ्रीका और नए सदस्य) के बीच तत्काल सेटलमेंट सुनिश्चित करना।
- तकनीकी मानक: डिजिटल मुद्राओं के लिए एक साझा सुरक्षा प्रोटोकॉल और कानूनी ढांचा तैयार करना ताकि साइबर खतरों से निपटा जा सके।
आधिकारिक और नीतिगत दृष्टिकोण
सरकारी सूत्रों के अनुसार, वित्त मंत्रालय आरबीआई के इस प्रस्ताव का बारीकी से विश्लेषण कर रहा है। कानून विशेषज्ञों का मानना है कि यदि ब्रिक्स एजेंडे में डिजिटल मुद्रा को शामिल किया जाता है, तो इसके लिए 'फेमा' (FEMA) और अन्य बैंकिंग नियमों में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर संशोधन की आवश्यकता हो सकती है।
आरबीआई गवर्नर ने हालिया ब्रीफिंग में संकेत दिया था कि डिजिटल मुद्रा केवल एक प्रयोग नहीं, बल्कि भविष्य की संप्रभुता का प्रतीक है। ब्रिक्स देशों के पास वैश्विक जनसंख्या का बड़ा हिस्सा है, और यदि ये देश डिजिटल मुद्रा पर सहमत होते हैं, तो यह वैश्विक वित्तीय व्यवस्था के इतिहास का सबसे बड़ा मोड़ होगा।
एक नए युग की आहट
ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में डिजिटल मुद्रा का मुद्दा शामिल होना केवल एक तकनीकी बदलाव नहीं, बल्कि एक कूटनीतिक जीत की शुरुआत होगी। यदि भारत अपने डिजिटल रुपये के मॉडल को इस मंच पर सफलतापूर्वक प्रस्तुत करता है, तो यह न केवल भारतीय मुद्रा की ताकत बढ़ाएगा, बल्कि विकासशील देशों के लिए एक नया और स्वतंत्र आर्थिक मार्ग भी प्रशस्त करेगा। आने वाले महीने यह तय करेंगे कि क्या ब्रिक्स देश मिलकर एक 'डिजिटल आर्थिक सुरक्षा चक्र' बनाने में सफल होते हैं।

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