ऐतिहासिक गिरावट: डॉलर के मुकाबले 95.80 के रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंचा भारतीय रुपया
अमेरिका-ईरान युद्ध के बीच भारतीय रुपया 95.80 के ऐतिहासिक निचले स्तर पर गिरा। कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों और विदेशी निवेशकों के पलायन से अर्थव्यवस्था पर संकट के बादल।

एक व्यक्ति के हाथों में भारतीय रुपये और अमेरिकी डॉलर के नोट, जो वैश्विक बाजार में डॉलर के मुकाबले रुपये की गिरती स्थिति को दर्शाते हैं।
Indian Rupee record low 95.80 dollar : वैश्विक अर्थव्यवस्था के अशांत समुद्र में भारतीय मुद्रा की स्थिति डगमगाती नजर आ रही है। बुधवार को भारतीय रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 95.80 के सर्वकालिक निचले स्तर पर गिर गया, जिसने आर्थिक गलियारों में चिंता की लहर पैदा कर दी है। इस ऐतिहासिक गिरावट के पीछे मुख्य कारण फरवरी 2026 के उत्तरार्ध में भड़का अमेरिका-ईरान युद्ध है, जिसने न केवल भू-राजनीतिक तनाव को चरम पर पहुँचा दिया है, बल्कि वैश्विक ऊर्जा बाजार को भी झकझोर कर रख दिया है। युद्ध के कारण कच्चे तेल की कीमतें 110 डॉलर प्रति बैरल के पार चली गई हैं, जिसका सीधा और प्रतिकूल प्रभाव भारत जैसी उभरती अर्थव्यवस्था पर पड़ा है, जो अपनी कच्चे तेल की जरूरतों के लिए 88 प्रतिशत विदेशी आयात पर निर्भर है। तेल की इन आसमान छूती कीमतों ने भारत के आयात बिल को अनियंत्रित रूप से बढ़ा दिया है, जिससे घरेलू मुद्रा पर दबाव निरंतर गहराता जा रहा है।
रुपये की इस कमजोरी के पीछे केवल बाहरी युद्ध ही एकमात्र कारक नहीं है, बल्कि वैश्विक निवेश की बदलती दिशा भी एक बड़ी भूमिका निभा रही है। इस वर्ष विदेशी निवेशकों ने भारतीय शेयर बाजार से लगभग 17-18 बिलियन डॉलर की भारी निकासी की है। अमेरिकी टैरिफ और 98 के करीब पहुँच चुके मजबूत डॉलर इंडेक्स ने निवेशकों को सुरक्षित ठिकानों की तलाश करने पर मजबूर कर दिया है। घरेलू राजनीति में भी इस मुद्दे पर घमासान शुरू हो गया है; विपक्षी नेता मनीष तिवारी जैसे दिग्गज आंकड़े पेश कर रहे हैं कि 2014 में जो रुपया 59 के स्तर पर था, वह अब आर्थिक कुप्रबंधन के कारण इस चिंताजनक मोड़ पर आ खड़ा हुआ है। दूसरी ओर, सरकार और केंद्रीय बैंक के समर्थक भारत की आर्थिक लचीलापन का हवाला देते हुए 690 बिलियन डॉलर के विशाल विदेशी मुद्रा भंडार, कम चालू खाता घाटे और 6.5 से 6.9 प्रतिशत के बीच अनुमानित विकास दर को एक सुरक्षा कवच के रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं।
वर्तमान संकट की गंभीरता को देखते हुए भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने बाजार में सक्रिय रूप से हस्तक्षेप करना शुरू कर दिया है। रुपये की गिरावट को थामने के लिए केंद्रीय बैंक लगातार डॉलर की बिक्री कर रहा है, ताकि बाजार में तरलता बनी रहे और मुद्रा के मूल्य में भारी उतार-चढ़ाव को रोका जा सके। हालांकि, इस वृहद आर्थिक उथल-पुथल का असर आम भारतीय परिवारों की रसोई तक पहुँच चुका है। ईंधन और खाद्य कीमतों में हो रही वृद्धि ने मध्यम और निम्न आय वर्ग के सामने महंगाई की एक नई चुनौती पेश कर दी है। यह घटनाक्रम केवल एक सांख्यिकीय गिरावट नहीं है, बल्कि यह इस बात का संकेत है कि वैश्विक संघर्ष किस तरह एक उभरती हुई शक्ति की आर्थिक स्थिरता को प्रभावित कर सकते हैं। आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि वैश्विक भू-राजनीतिक स्थिति और आरबीआई के हस्तक्षेप से भारतीय रुपया कितनी जल्दी अपनी खोई हुई जमीन वापस हासिल कर पाता है।

Ashiti Joil
यह प्रातःकाल में कंटेंट रायटर अँड एडिटर के पद पर कार्यरत हैं। यह गए 3 सालों से पत्रकारिता और डिजिटल मीडिया में सक्रिय हैं। इन्होंने लोकसत्ता, टाईम महाराष्ट्र, PR और हैट मीडिया में सोशल मीडिया कंटेंट रायटर के तौर पर काम किया है। इन्होंने मराठी साहित्य में मास्टर डिग्री पूर्ण कि है और अभी ये यूनिवर्सिटी के गरवारे इंस्टीट्यूड में PGDMM (Marthi Journalism) कर रही है। यह अब राजकरण, बिजनेस , टेक्नोलॉजी , मनोरंजन और क्रीड़ा इनके समाचार बनती हैं।
