नई दिल्ली: भारतीय वित्तीय बाजार में इस समय एक बड़ा ढांचागत बदलाव देखा जा रहा है, जहां अमेरिकी डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपया अपने सबसे निचले स्तर पर पहुंच गया है। वैश्विक आर्थिक समीकरणों और घरेलू बाजार के अत्यधिक ऊंचे मूल्यांकन के कारण विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक भारतीय इक्विटी बाजार से तेजी से अपना पैसा निकाल रहे हैं। वित्तीय विश्लेषकों के अनुसार, अमेरिकी डॉलर के मुकाबले विनिमय दर जो वर्ष 2025 की शुरुआत में 85.8 रुपये प्रति डॉलर थी, वह वर्ष 2026 की शुरुआत तक गिरकर 90 रुपये हो गई और हाल ही में यह रिकॉर्ड गिरावट दर्ज करते हुए लगभग 97 रुपये के ऐतिहासिक निचले स्तर को छू गई है। इस तीव्र अवमूल्यन का मुख्य कारण भारतीय शेयर बाजार का अन्य उभरते देशों की तुलना में काफी महंगा होना माना जा रहा है।

बाजार के आंकड़ों का विश्लेषण करने पर स्पष्ट होता है कि पिछले 18 महीनों की अवधि में विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPI) ने भारतीय शेयर बाजारों से करीब 53 अरब डॉलर की विशाल पूंजी वापस निकाली है। भारतीय बाजार का प्राइस-टू-अर्निंग (P/E) अनुपात वर्तमान में ट्रेलिंग आधार पर 22.5 और आगामी वित्तीय वर्ष के अग्रिम अनुमानों के अनुसार 18.8 पर बना हुआ है, जबकि इसके विपरीत वैश्विक उभरते बाजारों का औसत पी/ई अनुपात महज 15 से 16 के बीच है। तुलनात्मक रूप से चीन का पी/ई अनुपात 12-14, दक्षिण कोरिया का 10-12 और ब्राजील का 8-10 है। इसका सीधा अर्थ यह है कि भारतीय इक्विटी बाजार अन्य उभरते बाजारों की तुलना में 40 से 150 प्रतिशत तक के भारी प्रीमियम पर कारोबार कर रहे हैं, जिससे विदेशी संस्थागत निवेशकों को ऊंचे दाम पर मुनाफावसूली करने का स्पष्ट अवसर मिल गया है।

विदेशी निवेशकों द्वारा की जा रही इस अभूतपूर्व बिकवाली के बावजूद भारतीय शेयर बाजार को देश के मध्यम वर्ग ने पूरी तरह बिखरने से बचा लिया है। घरेलू खुदरा निवेशकों द्वारा सिस्टेमैटिक इन्वेस्टमेंट प्लान (SIP) के माध्यम से बाजार में निरंतर निवेश किया जा रहा है। वर्ष 2025 के प्रारंभ में जहां मासिक एसआईपी प्रवाह 20,000 करोड़ रुपये था, वहीं मार्च 2026 तक यह बढ़कर 32,087 करोड़ रुपये के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया है। इस मजबूत घरेलू संस्थागत निवेश के कारण ही सेंसेक्स, जो वर्ष की शुरुआत में 85,444 अंक पर था, वह घटकर 75,415 अंक पर आया है। विदेशी पूंजी के भारी बहिर्वाह को देखते हुए यह गिरावट अन्य वैश्विक बाजारों की तुलना में काफी नियंत्रित और सीमित मानी जा रही है।

चिंता का विषय यह है कि पूंजी निकासी का यह रुझान अब प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) तक विस्तृत हो गया है। भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की वार्षिक रिपोर्ट 2024-25 के अनुसार, देश में सकल एफडीआई 81 अरब डॉलर होने के बावजूद शुद्ध एफडीआई का प्रवाह एक अरब डॉलर से भी कम रहा था। वहीं, केंद्रीय बैंक के मई बुलेटिन के आंकड़ों के अनुसार, वित्तीय वर्ष 2026 में सकल एफडीआई प्रवाह बढ़कर 95 अरब डॉलर तक पहुंच गया, परंतु मुनाफे की वापसी और पूंजी निकासी के कारण शुद्ध प्रवाह केवल 7.7 अरब डॉलर ही शेष रहा। भारतीय कंपनियों द्वारा विदेशों में किया जाने वाला आउटवर्ड एफडीआई निवेश भी बढ़ा है, जो वर्ष 2020-21 के 11 अरब डॉलर से बढ़कर वर्ष 2026 में 33 अरब डॉलर हो गया है, लेकिन इसके समानांतर विदेशी कंपनियों द्वारा हिस्सेदारी बेचकर की जाने वाली निकासी भी बढ़कर 53 अरब डॉलर के नए रिकॉर्ड पर पहुंच गई है।

वर्तमान में कई बहुराष्ट्रीय कंपनियां (MNC) और प्राइवेट इक्विटी या वेंचर कैपिटल फंड भारतीय शेयर बाजार के ऊंचे मूल्यांकन का लाभ उठाकर अपनी हिस्सेदारी बेच रहे हैं, जिसका एक प्रमुख उदाहरण हुंडई इंडिया का भारी-भरकम आईपीओ रहा है। इसके अतिरिक्त, पश्चिम एशिया में जारी ईरान युद्ध के कारण कच्चे तेल और वैश्विक वस्तुओं की कीमतें तेजी से बढ़ रही हैं, जिससे भारत का चालू खाता घाटा (CAD) सकल घरेलू उत्पाद (GDP) के 0.9 प्रतिशत से बढ़कर लगभग 2.5 प्रतिशत तक पहुंचने की आशंका है। यद्यपि भारतीय रिजर्व बैंक अपने मजबूत विदेशी मुद्रा भंडार और करेंसी स्वैप सुविधाओं के माध्यम से रुपये को स्थिरता प्रदान करने के निरंतर प्रयास कर रहा है, परंतु जब तक भू-राजनीतिक तनाव और नीतिगत मोर्चे पर गहरे व्यापारिक सुधार धरातल पर नहीं उतरते, तब तक भारतीय मुद्रा पर बाह्य दबाव बने रहने का अनुमान है।

Lalita Rajput

Lalita Rajput

इन्हें लेखन क्षेत्र में लगभग 5 वर्षों का अनुभव है। इस दौरान इन्होंने फाइनेंस, कैलेंडर और बिज़नेस न्यूज़ को गहराई से कवर किया है। इनकी शैक्षणिक पृष्ठभूमि वित्त से जुड़ी है—इन्होंने एमबीए (फाइनेंस) किया है और वर्तमान में फाइनेंस में पीएचडी कर रही हैं। जनवरी 2026 से ये दै. प्रातःकाल में कार्यरत हैं, जहाँ बिज़नेस, फाइनेंस, मौसम और भारतीय सीमाओं से जुड़े समाचार सरल, सटीक और व्यवस्थित ढंग से प्रस्तुत करती हैं।

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