भारत की अर्थव्यवस्था ने अप्रैल-जून तिमाही में 7.8 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की है। यह तेज आर्थिक विकास का संकेत है, लेकिन इसके साथ एक बड़ा सवाल भी खड़ा होता है। अगर देश की अर्थव्यवस्था इतनी तेजी से बढ़ रही है, तो फिर लाखों लोगों को अच्छी, स्थायी और औपचारिक नौकरियां क्यों नहीं मिल रही हैं? यही सवाल भारत में आर्थिक विकास और रोजगार के बीच संबंध को लेकर बहस का केंद्र बना हुआ है।

अर्थशास्त्री स्वामीनाथन एस. अंकलेसरिया अय्यर के अनुसार, जीडीपी के नए आंकड़ों को समझने के लिए कई तकनीकी मुद्दों पर चर्चा हो रही है। इनमें डबल डिफ्लेशन, प्रोड्यूसर प्राइस इंडेक्स, डिनॉमिनेटर इफेक्ट और बेंचमार्क-इंडिकेटर मेथड जैसे विषय शामिल हैं। हालांकि, आम लोगों के लिए इन तकनीकी बहसों से ज्यादा जरूरी यह समझना है कि तेज आर्थिक विकास का रोजगार पर कितना असर पड़ रहा है।

विश्व बैंक और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष जैसे अंतरराष्ट्रीय संस्थानों ने जीडीपी के इन आंकड़ों पर कोई आपत्ति नहीं जताई है। सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय ने जीडीपी की नई सीरीज में कई तकनीकी सुधार भी किए हैं। इनमें बेहतर प्रोड्यूसर प्राइस इंडेक्स, ज्यादा विस्तृत डिफ्लेटर और उत्पादन तथा इनपुट दोनों के लिए डबल डिफ्लेशन जैसी व्यवस्थाएं शामिल हैं। इन बदलावों की सिफारिश अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं लंबे समय से करती रही हैं।

नई व्यवस्था में बदलाव के दौरान कुछ समस्याएं सामने आना स्वाभाविक है। पूर्व मुख्य सांख्यिकीविद् प्रणब सेन ने आंकड़ों में इस्तेमाल होने वाले मूल कीमत संबंधी डेटा की गुणवत्ता को लेकर सवाल उठाए हैं। सरकार के लिए यह जरूरी है कि वह मूल डेटा, उसके वेट और गणना की पूरी प्रक्रिया को सार्वजनिक करे। इससे आंकड़ों की पारदर्शिता और विश्वसनीयता बढ़ेगी। हालांकि, अभी ऐसा कोई सबूत नहीं है कि सरकार जीडीपी के आंकड़ों में हेरफेर कर रही है। तकनीकी कमियों या सवालों को सीधे आंकड़ों की फर्जीवाड़े से जोड़ना सही नहीं होगा।

एक और बात समझना जरूरी है कि जीडीपी का पहली अग्रिम अनुमान अंतिम आंकड़ा नहीं होता। समय के साथ इसमें कई बार संशोधन किया जाता है। इसके बाद दूसरा अग्रिम अनुमान, प्रोविजनल अनुमान, पहला संशोधित अनुमान और दूसरा संशोधित अनुमान जारी होता है। इन बदलावों के दौरान वृद्धि दर में एक प्रतिशत या उससे ज्यादा का अंतर भी आ सकता है। इसलिए आज की 7.8 प्रतिशत की वृद्धि आगे चलकर 6.8 प्रतिशत या 8.8 प्रतिशत भी हो सकती है।

इसी बीच भारतीय रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन ने रोजगार को लेकर एक महत्वपूर्ण सवाल उठाया है। अगर भारतीय अर्थव्यवस्था लगातार करीब 7 प्रतिशत की दर से बढ़ रही है और नई तिमाही में वृद्धि 7.8 प्रतिशत रही है, तो फिर निजी निवेश में जोरदार बढ़ोतरी, विदेशी निवेश और बड़ी संख्या में अच्छी नौकरियां क्यों दिखाई नहीं दे रही हैं? यह सवाल आर्थिक विकास की गुणवत्ता को समझने के लिए महत्वपूर्ण है। हालांकि, रोजगार से जुड़ी समस्या अपने आप यह साबित नहीं करती कि जीडीपी का नया अनुमान गलत है।

निवेश के आंकड़ों को देखें तो तस्वीर पूरी तरह कमजोर नहीं है। वास्तविक ग्रॉस फिक्स्ड कैपिटल फॉर्मेशन यानी GFCF में नवीनतम तिमाही में 11.9 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। यह जीडीपी की वृद्धि दर से भी ज्यादा है। कुल जीडीपी में इसका हिस्सा एक साल पहले के 31.4 प्रतिशत से बढ़कर 34.3 प्रतिशत हो गया है। कई वर्षों तक यह अनुपात करीब 30 प्रतिशत के आसपास रहा था, लेकिन अब इसमें बढ़ोतरी देखने को मिल रही है।

CMIE के अनुसार, पहली तिमाही में निजी कंपनियों के नए निवेश में 97 प्रतिशत की बड़ी वृद्धि हुई। यह वृद्धि ऐसे समय में हुई जब डोनाल्ड ट्रंप के टैरिफ और ईरान युद्ध से जुड़ी अनिश्चितताएं बनी हुई थीं। औद्योगिक विकास में कैपिटल गुड्स क्षेत्र की भी बड़ी भूमिका रही। नवीनतम तिमाही में इस क्षेत्र की वृद्धि दर करीब 15 प्रतिशत रही। इसका मतलब यह है कि निवेश में सिर्फ सरकारी इंफ्रास्ट्रक्चर खर्च की भूमिका नहीं है, बल्कि निजी कंपनियां भी निवेश कर रही हैं।

FDI यानी प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की तस्वीर भी पूरी तरह खराब नहीं है। पिछले दो वर्षों में नेट FDI क्रमशः 7.65 अरब डॉलर और 0.96 अरब डॉलर रहा। इसके पीछे विदेशी कंपनियों द्वारा भारत से पूंजी निकालना और भारतीय कंपनियों द्वारा विदेशों में निवेश करना जैसे कारण रहे। लेकिन अगर ग्रॉस FDI को देखा जाए तो तस्वीर बेहतर नजर आती है। 2025-26 में भारत में ग्रॉस FDI बढ़कर 94.53 अरब डॉलर हो गया, जबकि एक साल पहले यह 80.62 अरब डॉलर था।

हालांकि, भारत में विदेशी निवेश बढ़ाने के रास्ते में कुछ पुरानी बाधाएं भी हैं। इनमें लालफीताशाही, नीतियों और कानूनों में मनमाने या पिछली तारीख से लागू किए जाने वाले बदलाव और चीन से FDI को हतोत्साहित करने जैसी बातें शामिल हैं। इसलिए निवेश में सुधार के बावजूद अभी काफी गुंजाइश बनी हुई है।

अब रोजगार की बात करें तो यहां तस्वीर कुछ अलग है। पीरियॉडिक लेबर फोर्स सर्वे यानी PLFS के अनुसार, भारत की बेरोजगारी दर 2017-18 के 6 प्रतिशत से घटकर 2023-24 में 3.2 प्रतिशत हो गई। यह गिरावट सिर्फ इसलिए नहीं हुई कि लोगों ने नौकरी तलाशना बंद कर दिया। इसी अवधि में श्रम बल भागीदारी दर 49.8 प्रतिशत से बढ़कर 60.1 प्रतिशत हो गई। वर्कर-पॉपुलेशन रेशियो भी 46.8 प्रतिशत से बढ़कर 58.2 प्रतिशत हो गया।

फिर भी इन आंकड़ों को देखकर तुरंत यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि भारत में पर्याप्त अच्छी नौकरियां पैदा हो रही हैं। PLFS यह बताता है कि किसी व्यक्ति के पास काम है या नहीं, लेकिन यह नहीं बताता कि वह काम कितना अच्छा है, उसकी आय कितनी है या उसमें कितनी सामाजिक सुरक्षा उपलब्ध है।

उदाहरण के लिए, परिवार के खेत में काम करने वाली महिला को रोजगार प्राप्त व्यक्ति माना जा सकता है। इसी तरह कम आय में गुजारा करने वाला स्ट्रीट वेंडर भी रोजगार में शामिल होता है। भारत में पैदा होने वाले बहुत से नए काम स्वरोजगार या कम उत्पादकता वाले क्षेत्रों में हैं। इसलिए रोजगार की संख्या बढ़ने के बावजूद अच्छी और नियमित नौकरियों की कमी बनी रह सकती है।

इस समस्या की एक बड़ी वजह कंपनियों के लिए नियमित कर्मचारियों की लागत और कॉन्ट्रैक्ट कर्मचारियों की लागत के बीच का बड़ा अंतर है। अगर किसी कॉन्ट्रैक्ट कर्मचारी को नियमित कर्मचारी बनाया जाता है, तो कंपनी को PF, ESI, पेंशन योगदान, पेड लीव, छुट्टियां, बोनस, लीव ट्रैवल अलाउंस, ग्रेच्युटी और दूसरी सुविधाओं पर खर्च करना पड़ सकता है। इसके कारण कर्मचारी की कुल लागत करीब 50 प्रतिशत तक बढ़ सकती है।

उदाहरण के तौर पर अगर किसी कॉन्ट्रैक्ट कर्मचारी पर कंपनी अभी 20,000 रुपये खर्च कर रही है, तो उसे नियमित कर्मचारी बनाने के बाद कुल लागत करीब 30,000 रुपये तक पहुंच सकती है। ऐसी स्थिति में कंपनियों के पास नियमित कर्मचारियों की संख्या सीमित रखने और कॉन्ट्रैक्ट या अनौपचारिक कर्मचारियों पर ज्यादा निर्भर रहने का आर्थिक कारण होता है।

इसी संदर्भ में भारत में ‘लेबर एरिस्टोक्रेसी’ यानी संगठित और अपेक्षाकृत सुरक्षित श्रमिकों के एक विशेष वर्ग की चर्चा होती है। नियमित कर्मचारियों को पेंशन, स्वास्थ्य बीमा, पेड लीव और ग्रेच्युटी जैसी सुविधाएं मिलती हैं। ये सुविधाएं अपने आप में अच्छी हैं, लेकिन जब नियमित कर्मचारियों की कुल लागत दूसरे विकल्पों की तुलना में बहुत अधिक हो जाती है, तो कंपनियां ऑटोमेशन, आउटसोर्सिंग और कॉन्ट्रैक्ट कर्मचारियों का रास्ता चुन सकती हैं।

इसका असर यह होता है कि तेज जीडीपी वृद्धि के बावजूद बड़ी संख्या में अनौपचारिक काम पैदा होते हैं, जबकि नियमित वेतन और सामाजिक सुरक्षा वाली नौकरियां अपेक्षाकृत कम बनती हैं। इसलिए केवल आर्थिक वृद्धि की दर बढ़ाना रोजगार की समस्या का पूरा समाधान नहीं है।

अगर अर्थव्यवस्था 5 प्रतिशत की बजाय 8 प्रतिशत की दर से बढ़ती है, तो कंपनियां निश्चित रूप से ज्यादा लोगों को रोजगार दे सकती हैं। लेकिन जब तक नियमित और कॉन्ट्रैक्ट कर्मचारियों की लागत के बीच बड़ा अंतर बना रहेगा, रोजगार का एक बड़ा हिस्सा अनौपचारिक या कम उत्पादकता वाले कामों में जाने की संभावना बनी रहेगी।

सवाल यह भी है कि इस लागत अंतर को कम क्यों नहीं किया जाता। देश की प्रमुख ट्रेड यूनियनों में भारतीय मजदूर संघ यानी BMS और कांग्रेस से जुड़ी INTUC भी संगठित क्षेत्र के कर्मचारियों के हितों की पैरवी करती हैं। चिंता यह है कि संगठित क्षेत्र के कर्मचारियों की सुरक्षा और सुविधाओं के साथ-साथ उन बड़ी संख्या में अनौपचारिक श्रमिकों के हितों पर भी ध्यान देना जरूरी है, जो बेहतर रोजगार की तलाश में हैं।

इसलिए भारत के सामने चुनौती सिर्फ तेज जीडीपी वृद्धि हासिल करने की नहीं है। असली चुनौती ऐसी आर्थिक वृद्धि सुनिश्चित करना है, जिससे ज्यादा लोगों को नियमित, बेहतर वेतन वाली और सामाजिक सुरक्षा से जुड़ी नौकरियां मिलें। 7.8 प्रतिशत की जीडीपी वृद्धि मजबूत आर्थिक गतिविधि का संकेत हो सकती है, लेकिन रोजगार की गुणवत्ता में सुधार के बिना इसका लाभ हर वर्ग तक समान रूप से पहुंचना मुश्किल रहेगा।

Lalita Rajput

Lalita Rajput

इन्हें लेखन क्षेत्र में लगभग 5 वर्षों का अनुभव है। इस दौरान इन्होंने फाइनेंस, कैलेंडर और बिज़नेस न्यूज़ को गहराई से कवर किया है। इनकी शैक्षणिक पृष्ठभूमि वित्त से जुड़ी है—इन्होंने एमबीए (फाइनेंस) किया है और वर्तमान में फाइनेंस में पीएचडी कर रही हैं। जनवरी 2026 से ये दै. प्रातःकाल में कार्यरत हैं, जहाँ बिज़नेस, फाइनेंस, मौसम और भारतीय सीमाओं से जुड़े समाचार सरल, सटीक और व्यवस्थित ढंग से प्रस्तुत करती हैं।

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