वैश्विक आर्थिक परिदृश्य में अपनी धाक जमाने के लिए भारत ने अपनी व्यापारिक नीतियों में एक युगांतरकारी परिवर्तन की नींव रखी है। देश के विनिर्माण क्षेत्र का विस्तार करने, निजी क्षेत्र के पूंजीगत निवेश को गति देने और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में गहराई से जुड़ने के लिए भारत सरकार ने हाल के दिनों में कई महत्वपूर्ण मुक्त व्यापार समझौते यानी फ्री ट्रेड एग्रीमेंट निष्पादित किए हैं। इन समझौतों को भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए एक बड़े उत्प्रेरक के रूप में देखा जा रहा है, जिससे विशेष रूप से इलेक्ट्रॉनिक्स, फार्मास्यूटिकल्स, इंजीनियरिंग और मशीनरी उद्योगों से जुड़ी कंपनियों को बड़े पैमाने पर लाभ मिलने की उम्मीद है। हालांकि, आर्थिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि घरेलू स्तर पर मौजूद ढांचागत कमियों को समय रहते दूर नहीं किया गया, तो अंतरराष्ट्रीय व्यापार को बढ़ावा देने का यह महत्वाकांक्षी दांव उल्टा भी पड़ सकता है।

प्रतिष्ठित वित्तीय फर्म यस सिक्योरिटीज द्वारा जारी की गई एक व्यापक शोध रिपोर्ट के अनुसार, इन नए वैश्विक समझौतों के साथ-साथ सरकार की उत्पादन लिंक्ड प्रोत्साहन यानी पीएलआई योजना और दुनिया भर में चल रहे 'चीन प्लस वन' विविधीकरण मॉडल के संयोजन से भारत के पास ऐतिहासिक अवसर पैदा हुआ है। इस रणनीतिक तालमेल के माध्यम से देश वर्ष 2030 तक एक ट्रिलियन डॉलर का मर्चेंडाइज एक्सपोर्ट यानी सामान का निर्यात हासिल करने के अपने दीर्घकालिक लक्ष्य को सुगमता से प्राप्त कर सकता है। रिपोर्ट में रेखांकित किया गया है कि हालिया एफटीए केवल आयात-निर्यात शुल्क में कटौती करने तक सीमित नहीं हैं, बल्कि ये आने वाले कई दशकों तक चलने वाले औद्योगिक और निर्यात-आधारित विकास चक्र की सुदृढ़ आधारशिला रख रहे हैं। भारत द्वारा संयुक्त अरब अमीरात, ऑस्ट्रेलिया, ब्रिटेन, ओमान, न्यूजीलैंड और यूरोपीय संघ जैसे प्रमुख बाजारों के साथ किए जा रहे समझौतों को केवल कागजों तक सीमित न रखकर नए इंडस्ट्रियल कॉरिडोर, पोर्ट अपग्रेडेशन और सप्लाई-चेन के स्थानीयकरण के साथ धरातल पर उतारा जा रहा है।

इस बड़े आर्थिक घटनाक्रम के वित्तीय और रणनीतिक पहलुओं का विश्लेषण करने पर यह स्पष्ट होता है कि भारत इस समय दुनिया की उन चुनिंदा अर्थव्यवस्थाओं में शामिल हो चुका है, जिसके पास बड़े पैमाने पर विनिर्माण को स्थानांतरित करने की क्षमता, विशाल कुशल कार्यबल और एक विशाल घरेलू बाजार मौजूद है। वर्तमान में भारतीय विनिर्माण कंपनियों का क्षमता उपयोग लगभग पचहत्तर प्रतिशत के स्तर पर अटका हुआ है, जिसके कारण निजी क्षेत्र नए और बड़े पूंजीगत निवेश यानी कैपेक्स को लेकर पूरी तरह आश्वस्त नहीं हो पा रहा था। ऐसे में इन मुक्त व्यापार समझौतों के माध्यम से मिलने वाली निरंतर विदेशी मांग कंपनियों को बड़े पैमाने पर उत्पादन करने की सुविधा प्रदान करेगी, जिससे अंततः देश के भीतर निजी निवेश चक्र को पुनः जीवित करने में मदद मिलेगी। यह मॉडल काफी हद तक पूर्वी एशियाई देशों की उस सफल आर्थिक यात्रा जैसा ही है, जहां निर्यात ने बड़े पैमाने पर विनिर्माण के विस्तार और पूंजी निर्माण को बढ़ावा दिया था।

आधिकारिक लक्ष्यों के संदर्भ में देखें तो भारत का अंतिम उद्देश्य साल 2030 तक कुल दो ट्रिलियन डॉलर का निर्यात हासिल करना है, जिसमें वस्तुओं और सेवाओं दोनों का बराबर योगदान सुनिश्चित करने की योजना बनाई गई है। ब्रिटेन और यूरोपीय संघ के साथ होने वाले आगामी समझौतों से भारत की सूचना प्रौद्योगिकी सेवाओं, कंसल्टिंग, इंजीनियरिंग रिसर्च एंड डेवलपमेंट और वित्तीय सेवाओं के लिए नए विदेशी बाजारों तक पहुंच काफी आसान हो जाएगी, जिससे उच्च कौशल और तकनीकी क्षेत्र में भारत की स्थिति और मजबूत होगी। इसके विपरीत, यस सिक्योरिटीज ने एक गंभीर नीतिगत चेतावनी भी साझा की है। ब्रोकरेज फर्म का कहना है कि अंतरराष्ट्रीय बाजारों तक पहुंच बनाना ही एकमात्र समाधान नहीं है, क्योंकि भारत की मुख्य चुनौती विदेशी बाजारों की उपलब्धता नहीं बल्कि घरेलू स्तर पर लागत के मोर्चे पर प्रतिस्पर्धा करने की क्षमता की कमी है।

ऐतिहासिक आंकड़ों पर गौर करें तो वर्ष 2015 से 2025 के दशक के दौरान भारत के मर्चेंडाइज एक्सपोर्ट में केवल साढ़े तीन प्रतिशत की कंपाउंड एनुअल ग्रोथ रेट यानी सीएजीआर दर्ज की गई है। इसके पीछे देश में मौजूद ऊंची लॉजिस्टिक लागत, महंगी बिजली दरें, अनुपालन की जटिल कानूनी प्रक्रियाएं और अपेक्षाकृत कम श्रम उत्पादकता जैसी गंभीर संरचनात्मक बाधाएं मुख्य कारण रही हैं। अंतरराष्ट्रीय व्यापार नियमों और कानूनी पहलुओं के मद्देनजर, यदि भारत इन घरेलू विसंगतियों को समय रहते ठीक किए बिना अपने बाजारों को विदेशी वस्तुओं के लिए पूरी तरह खोल देता है, तो देश का आयात हमारे निर्यात की तुलना में कहीं अधिक तीव्र गति से बढ़ सकता है। ऐसी स्थिति में, ये मुक्त व्यापार समझौते फायदे के बजाय देश के व्यापार घाटे को और अधिक बढ़ाकर राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था पर विपरीत दबाव डाल सकते हैं।

Lalita Rajput

Lalita Rajput

इन्हें लेखन क्षेत्र में लगभग 5 वर्षों का अनुभव है। इस दौरान इन्होंने फाइनेंस, कैलेंडर और बिज़नेस न्यूज़ को गहराई से कवर किया है। इनकी शैक्षणिक पृष्ठभूमि वित्त से जुड़ी है—इन्होंने एमबीए (फाइनेंस) किया है और वर्तमान में फाइनेंस में पीएचडी कर रही हैं। जनवरी 2026 से ये दै. प्रातःकाल में कार्यरत हैं, जहाँ बिज़नेस, फाइनेंस, मौसम और भारतीय सीमाओं से जुड़े समाचार सरल, सटीक और व्यवस्थित ढंग से प्रस्तुत करती हैं।

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