British era liquor auction Sultanpur history : ब्रिटिश राज को लेकर अक्सर यह धारणा बनी रहती है कि उस दौर में प्रशासनिक व्यवस्था सख्त और गुणवत्ता नियंत्रण निर्विवाद था। लेकिन शराब के कारोबार पर नजर डालें तो तस्वीर बिल्कुल उलटी दिखती है। देसी शराब में मिलावट, कम असर होने की शिकायतें और अवैध धंधे का फैलाव—ये सब अंग्रेजों के दौर में ही शुरू हो चुका था। सुल्तानपुर, अमेठी और आसपास के जिलों के अभिलेख इस काले सच को विस्तार से उजागर करते हैं।

उन्नीसवीं सदी की शुरुआत में जब शराब में मिलावट की शिकायतें बढ़ने लगीं, तब प्रशासन ने पहली बार बोतलों की सीलबंदी अनिवार्य की। सुल्तानपुर के पास रायबरेली रोड स्थित डिस्टिलरी महुए और शीरे से बनी देसी शराब का उत्पादन करती थी, जिसमें 30 भट्ठियां सक्रिय थीं। उत्पादन पहले ही कम था, ऊपर से अक्टूबर 1900 में पड़ोसी प्रतापगढ़ की डिस्टिलरी बंद हो जाने के बाद वहां की जरूरत भी यहीं से पूरी की जाने लगी। मांग बढ़ी, आपूर्ति कम हुई और इसी अंतर ने मिलावटखोरों को नया अवसर प्रदान कर दिया।

जब शिकायतें बढ़ीं तो अंग्रेजों ने रोकथाम की शुरुआत की। पहले चरण में निकासी के समय कुल स्टॉक के छठवें हिस्से की बोतलों की सीलबंदी का नियम लागू किया गया, हालांकि संसाधनों के अभाव में पूरे स्टॉक पर ऐसी निगरानी संभव नहीं हो पाई।

British era liquor auction Sultanpur history

उन्नीसवीं सदी के अंतिम दशक में देसी शराब के ठेकों की नीलामी शुरू हुई, जिसे सरकारी राजस्व बढ़ाने का बड़ा साधन माना गया। 1901 में डिस्टिलरी हेड ड्यूटी से 63,000 रुपये की आमदनी हुई, जबकि पूरे जिले के 179 ठेकों की नीलामी से केवल 26,000 रुपये ही प्राप्त हुए। शहर की सबसे महंगी दुकान 1,900 रुपये में नीलाम हुई। अमेठी का रायपुर ठेका 1,000 रुपये में मिला, और गौरीगंज का 760 रुपये में। मुसाफिरखाना और शुकुल बाजार बेहतर राजस्व देते थे। इसके उलट कादीपुर तहसील अंग्रेजों के लिए निराशाजनक रही, जहां कुल दुकानों से सालाना मुश्किल से 1,000 रुपये निकल पाते थे। कादीपुर मुख्यालय की दुकान तो बारह रुपये से ऊपर कभी नहीं उठी। ताड़ी भी राजस्व का स्रोत थी, जिससे लगभग 450 रुपये हासिल होते थे।

नशे की श्रेणियों में बंटवारा जाति और मजहब के आधार पर भी नजर आता है। 1903 में प्रकाशित सुल्तानपुर गजेटियर में एच.आर. नेविल्स ने लिखा कि देसी शराब मुख्य रूप से पासियों और छोटी जातियों में लोकप्रिय थी, जबकि गांजा उच्च व मजबूत जातियों, विशेषकर ठाकुर और यादव समुदाय में प्रचलित था। मुसलमानों में अफीम का चलन था, हालांकि उपयोगकर्ता अपेक्षाकृत कम थे। चरस का सेवन कमजोर वर्गों में देखा गया। दिलचस्प यह है कि आने वाले दशकों में इन नशों को लेकर जाति-मजहब की ये सीमाएँ धीरे-धीरे मिटती चली गईं।

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अवैध शराब का कारोबार भी उस समय मौजूद था। नेविल्स के अनुसार अमेठी और गौरीगंज के पासी इसमें अधिक सक्रिय थे, हालांकि राजस्व के लिए वे बड़ी चुनौती नहीं थे। मुसाफिरखाना तहसील के कुछ इलाकों में अफीम की खेती भी की जाती थी। अंग्रेज इसे बढ़ावा देते थे, क्योंकि मिट्टी-जलवायु इसे उपयुक्त बनाती थी और एडवांस भुगतान किसानों को आकर्षित करता था।

बीसवीं सदी की शुरुआत में महुए की प्रचुरता थी, पर ताल्लुकदारों द्वारा प्रति पेड़ दो आने कर वसूले जाने से लोग परेशान रहते थे। थोड़ी बहुत तंबाकू की खेती भी होती थी, जो मुख्यतः शहर के नजदीक क्षेत्रों में सीमित थी।

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अंग्रेजी शासन की शराब नीति आजादी के बाद भी लंबे समय तक सरकारी राजस्व की रीढ़ बनी रही। उन्नीस सौ एक में सुल्तानपुर की आबादी 10,83,904 थी। 2011 की जनगणना के अनुसार मौजूदा जिले की आबादी 22,49,036 है, और इस पूरे क्षेत्र में देसी-विदेशी शराब, बीयर और भांग से होने वाली कमाई आज भी सरकारी खजाने में महत्वपूर्ण योगदान दे रही है। यह तथ्य बताता है कि अंग्रेजों द्वारा शुरू की गई ठेका व्यवस्था आज भी भारत की वित्तीय संरचना पर गहरा प्रभाव डालती है।

Ashiti Joil

Ashiti Joil

यह प्रातःकाल में कंटेंट रायटर अँड एडिटर के पद पर कार्यरत हैं। यह गए 3 सालों से पत्रकारिता और डिजिटल मीडिया में सक्रिय हैं। इन्होंने लोकसत्ता, टाईम महाराष्ट्र, PR और हैट मीडिया में सोशल मीडिया कंटेंट रायटर के तौर पर काम किया है। इन्होंने मराठी साहित्य में मास्टर डिग्री पूर्ण कि है और अभी ये यूनिवर्सिटी के गरवारे इंस्टीट्यूड में PGDMM (Marthi Journalism) कर रही है। यह अब राजकरण, बिजनेस , टेक्नोलॉजी , मनोरंजन और क्रीड़ा इनके समाचार बनती हैं।

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