अमेरिकी डॉलर के अवमूल्यन पर व्हाइट हाउस का बेफिक्र अंदाज; क्या यह 'अमेरिका फर्स्ट' की नई रणनीति है?

वॉशिंगटन/आयोवा: दुनिया की सबसे शक्तिशाली मुद्रा, अमेरिकी डॉलर, इस समय एक ऐतिहासिक उतार-चढ़ाव के दौर से गुजर रही है। मंगलवार को अंतरराष्ट्रीय बाजार में डॉलर का सूचकांक (DXY) लुढ़ककर पिछले 4 वर्षों के सबसे निचले स्तर 95.566 पर आ गया। यह फरवरी 2022 के बाद की सबसे बड़ी गिरावट है। हालांकि, इस आर्थिक उथल-पुथल के बीच राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक ऐसा बयान दिया है जिसने अर्थशास्त्रियों और निवेशकों को चौंका दिया है। आयोवा में पत्रकारों से बात करते हुए ट्रंप ने डॉलर की इस स्थिति को 'शानदार' (Great) करार दिया।

क्या है पूरा मामला?

आयोवा में एक आर्थिक रैली से पहले जब पत्रकारों ने राष्ट्रपति ट्रंप से पूछा कि क्या डॉलर की कीमत में बहुत अधिक गिरावट आई है, तो उन्होंने आत्मविश्वास के साथ जवाब दिया, "नहीं, मुझे लगता है कि यह बहुत अच्छा है। डॉलर का मूल्य... डॉलर बहुत अच्छा कर रहा है।" राष्ट्रपति के इस बयान के तुरंत बाद वैश्विक बाजारों में डॉलर की बिकवाली और तेज हो गई। वित्तीय विश्लेषकों का मानना है कि ट्रंप का यह रुख निर्यात को बढ़ावा देने और व्यापार घाटे को कम करने की एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा हो सकता है।

डॉलर की गिरावट के प्रमुख कारण

विशेषज्ञों के अनुसार, डॉलर के इस स्तर तक गिरने के पीछे 'परफेक्ट स्टॉर्म' जैसी स्थितियां जिम्मेदार हैं:

  • फेडरल रिजर्व पर दबाव: राष्ट्रपति ट्रंप ने आगामी दिनों में फेडरल रिजर्व के नए प्रमुख के नाम की घोषणा करने का संकेत दिया है, जिससे ब्याज दरों में कटौती की संभावनाएं प्रबल हो गई हैं।
  • जापानी येन का हस्तक्षेप: ऐसी अटकलें हैं कि अमेरिका और जापान मिलकर येन को मजबूत करने के लिए मुद्रा बाजार में हस्तक्षेप (Currency Intervention) कर सकते हैं।
  • राजकोषीय घाटा और नीतिगत अस्थिरता: बढ़ते बजटीय घाटे और व्यापारिक शुल्कों (Tariffs) की अनिश्चितता ने निवेशकों के भरोसे को कमजोर किया है।
  • सुरक्षित ठिकानों की ओर पलायन: डॉलर के कमजोर होने से निवेशकों ने सोने ($5,200 प्रति औंस से ऊपर) और चांदी की ओर रुख किया है।

आधिकारिक रुख और कानूनी पक्ष

ट्रंप ने साफ किया कि वे चीन और जापान जैसी अर्थव्यवस्थाओं की तरह मुद्रा के कृत्रिम अवमूल्यन (Devaluation) के पक्ष में नहीं हैं, बल्कि वे चाहते हैं कि डॉलर "अपना स्तर खुद तलाशे"। हालांकि, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) और वैश्विक व्यापार संगठन (WTO) की नीतियों के तहत, किसी भी देश द्वारा जानबूझकर अपनी मुद्रा को कमजोर करना 'करेंसी मैनिपुलेशन' के दायरे में आ सकता है, जिससे भविष्य में व्यापारिक विवाद बढ़ सकते हैं।

वैश्विक अर्थव्यवस्था पर दूरगामी प्रभाव

डॉलर का 4 साल के निचले स्तर पर पहुंचना और राष्ट्रपति का इसे 'शानदार' कहना इस बात का संकेत है कि अमेरिका अब एक 'कमजोर डॉलर' वाली अर्थव्यवस्था की ओर बढ़ रहा है। यह कदम अमेरिकी निर्यातकों के लिए वरदान साबित हो सकता है, लेकिन यह वैश्विक मुद्रास्फीति (Inflation) को भी बढ़ा सकता है। आने वाले महीनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या डॉलर अपनी खोई हुई साख वापस पाता है या 'अमेरिका फर्स्ट' की यह नई आर्थिक दिशा दुनिया के वित्तीय मानचित्र को हमेशा के लिए बदल देती है।

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